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मेरा गाँव मुझसे पूछता है....!



गाँव वही है , गाँव वाले वही है , नल वही है , नौला वही है ,
घर भी वही , घरवाले वही , जंगल वही , हरियाली वही ,

फिर क्यों सब शून्य सा लगता है ,
                                  क्यों मन एक हारा हुआ योद्धा सा लगता है ,
सब रिश्ते खंडहर हो चले है ,
                                  और प्यार अब सिर्फ  बन गया है व्यापार,

क्या यही सपने देखे थे इस गाँव ने ,
                               क्या यही है आधुनिकता का संसार ?

अब कब आएगी इस गाँव मैं ख़ुशी ,
                                      कब आएगी इसमें बहार ?

इसी उम्मीद मैं मन बूढा हो चला है ,
                                    धूमिल सा लगता है सब संसार.

ऐ इस गाँव के बेटो ,
                      क्या इसलिए ही बसाया था ये संसार ?

जहा मैं तेरा नहीं  और तू मेरा नहीं ,
                         बस द्वेष, घृणा और  है भ्रष्ट्राचार,

बस अब बहुत  हुआ , थक चूका हु मैं i
                       लौटाओ मेरा प्यार बसाओ मेरा घर संसार

यही अब हर गाँव कहता है ,
                                और यही ख्वाइश रखता है ..!

                                       

टिप्पणियाँ

  1. शानदार!!!आप तो पूरे कवि हो गये हैं..

    बात पे बात कहता है,
    आपके अंदर भी आपका गॉव रहता है।

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  2. धन्यवाद ..किशोर भाई ...आपकी तरह है मेरे दिल मैं ये बसता है , इसका दर्द पता नहीं क्या क्या बनाएगा हमें.....लेकिन गाँव यह जरुर कहता है ..कम से कम इंसान तो बन जाओ...!

    जवाब देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. aaj kal paise hi growth ka parameter ho gaya he bisht ji....any way nice line.....chaukhutiya gewad ke parsson joshi ho aap..

    जवाब देंहटाएं
  5. हहहः ये कुछ ज्यादा ही हो गया शंकर भाई ...!

    जवाब देंहटाएं
  6. जज्बातों को सुन्दर अल्फाजों से सजाया है.....बहुत खूब...

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  7. जज्बातों को सुन्दर अल्फाजों से सजाया है.....बहुत खूब...

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