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**गाँव और कस: क्या यह एक ऐसी प्रथा है जो रिश्तों को तोड़ती है?**

  **गाँव और कस: क्या यह एक ऐसी प्रथा है जो रिश्तों को तोड़ती है?**   कुछ दिन पहले मैं अपने गाँव गया था। वहाँ जाकर मैंने महसूस किया कि गाँव में बहुत कुछ बदल गया है। पहले जहाँ गाँव में जीवन की गतिविधियाँ चहल-पहल से भरी रहती थीं, आज वहाँ एक सूनापन सा छाया हुआ है। रोजगार की कमी और बेरोजगारी की वजह से गाँव के लोग शहरों की ओर पलायन कर गए हैं। जो लोग बचे हैं, उनमें भी आपसी सामंजस्य और एकता की कमी नजर आती है।   मेरे गाँव में आज बहुत कम परिवार बचे हैं। लेकिन इन थोड़े से परिवारों के बीच भी प्यार और विश्वास की कमी एक गंभीर समस्या बन गई है। एक परिवार का दूसरे परिवार के प्रति अविश्वास और दूरी इतनी बढ़ गई है कि यह चिंता का विषय बन गया है। गाँव में रोजगार और अस्पताल की कमी तो है ही, लेकिन मुझे लगता है कि सबसे बड़ी समस्या है **अविश्वास और अंधविश्वास**। यही वजह है कि हमारे पहाड़ों का अस्तित्व खतरे में पड़ता जा रहा है।   गाँव में ऐसे कई वाकये हुए हैं, जहाँ एक इंसान या परिवार का दूसरे इंसान या परिवार के प्रति अविश्वास इतना गहरा हो गया है कि उनके बीच का रिश्ता ही टूट गया ...