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मोहन की कहानी: सपनों की डगर पर

मोहन की कहानी: सपनों की डगर पर बरसात की एक शाम थी। मोहन अपने कच्चे मकान की छत से टपकते पानी को देख रहा था। हर बूंद के साथ उसके दिल में एक टीस उठती - उसकी माँ को इस बरसात में भी बर्तन माँजने पड़ते, क्योंकि घर में टीन की छत लगवाने के पैसे नहीं थे। "बेटा, चाय पी ले," माँ की आवाज ने उसके विचारों को तोड़ा। मोहन ने देखा - माँ के हाथ काँप रहे थे। गठिया का दर्द बढ़ रहा था, लेकिन दवाई के पैसे नहीं थे। पिताजी भी खेत में काम करते-करते थक गए थे, उम्र का बोझ उन पर भी दिखने लगा था। एक कठोर निर्णय उस रात मोहन सो नहीं पाया। सुबह होते ही उसने निर्णय ले लिया। "माँ, मैं दिल्ली जा रहा हूँ।" माँ की आँखों में आँसू आ गए। "लेकिन बेटा, वहाँ कौन है अपना?" मोहन ने मुस्कुराते हुए कहा, "आपका आशीर्वाद है न, वही काफी है।" पिताजी चुप थे। शाम को वे मोहन के कमरे में आए। "बेटा, ये ले," उन्होंने अपनी पुरानी घड़ी निकालकर दी, "तेरे दादाजी ने दी थी। कहते थे - समय की कीमत समझो, वही सबसे बड़ी पूंजी है।" महानगर का पहला धक्का दिल्ली स्टेशन पर उतरते ही मोहन की जे...