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"जय हो आलू-मटर की!"

  "जय हो आलू-मटर की!" यह किस्सा उन दिनों का है, जब मैं चौखुटिया इंटर कॉलेज में छठी कक्षा का एक मासूम (या कहें भूखा) छात्र था। सोनगांव स्कूल से पाँचवीं पास कर जैसे ही चौखुटिया पहुँचा, तो लगा जैसे गाँव से सीधे मेट्रो सिटी आ गया हूँ। सोनगांव में जहाँ चारों तरफ खेत और गायें ही दिखती थीं, वहाँ चौखुटिया में बाजार था, चहल-पहल थी और... हाँ, सबसे ज़रूरी बात, "आलू-मटर" था! सोनगांव में स्कूल के आस-पास तो न दुकान, न समोसा, न जलेबी — बस टीचर और उनकी डंडियाँ। लेकिन चौखुटिया में तो लगता था जैसे पढ़ाई से ज़्यादा खान-पान का उत्सव हो रहा हो! और उस ज़माने का 'फास्ट फूड' अगर कोई था, तो वो था — गरमागरम आलू-मटर संग रायता! बस दिक्कत एक ही थी... जेब में पैसे नहीं थे। पापा दिल्ली में नौकरी करते थे, और गाँव में अम्मा जी घर-गृहस्थी सँभालती थीं। जेब-खर्च जैसी कोई कल्पना नहीं थी — अम्मा का मंत्र था, "घर में दाल-भात, साग-रोटी है, और क्या चाहिए?" अब समझो, आलू-मटर का सपना देखो और घर में मदुए की रोटी चबाओ! पर कहते हैं न, दोस्ती हर दुख का इलाज होती है। कुछ महानुभाव साथी बने...