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देवभूमि की डायरी: आस्था और विवेक का संगम

  देवभूमि की डायरी: आस्था और विवेक का संगम पहाड़ों की जिंदगी में विज्ञान और आस्था का अजीब सा रिश्ता है। जहाँ एक तरफ लोग स्मार्टफोन पर मौसम का हाल देख कर खेती करते हैं, वहीं दूसरी तरफ फसल की रक्षा के लिए देवी-देवताओं से गुहार भी लगाते हैं। मैं इस दोनों के बीच का साक्षी रहा हूं। हमारे पहाड़ी समाज में यह दोनों धाराएं समानांतर बहती हैं, कभी एक-दूसरे को काटती हैं, तो कभी एक-दूसरे को समृद्ध करती हैं। मेरा बचपन पहाड़ की एक छोटी सी घाटी में बीता, जहाँ हर सुबह देवी के मंदिर की घंटी से शुरू होती थी। याद है, दादी कहती थीं कि जब तक देवी का आशीर्वाद न ले लो, दिन की शुरुआत अधूरी है। उन्हीं दिनों टेलीविजन पर कृषि दर्शन भी देखा करते थे, और पिताजी नई-नई खेती की तकनीकों को अपनाने की कोशिश करते। यह विरोधाभास नहीं था, बल्कि एक संतुलन था जो हमारे जीवन का हिस्सा था। बचपन से ही देखता आया हूं कि हमारे यहाँ हर पहाड़ की अपनी कहानी है, हर गाँव का अपना देवता। इन देवताओं से हमारा नाता सिर्फ मंदिर तक सीमित नहीं - यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं। खेत में बीज बोने से पहले आशीर्वाद, बच्चे की पहली पढ़ाई,...

"गांव में रहकर अपने सपनों को सच करने की प्रेरक कहानी: मनिषा की सफलता की राह"

  "गांव में रहकर अपने सपनों को सच करने की प्रेरक कहानी: मनिषा की सफलता की राह" आज के समय में जब दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है, तो ऐसा कोई भी काम नहीं है, जो हम घर बैठे न कर सकें। चाहे हम "गांव में रहकर अपने सपनों को सच करने की प्रेरक कहानी: मनिषा की सफलता की राह"किसी भी जगह रहते हों, अगर हमारे पास सही दिशा और साधन हो, तो हम अपनी ज़िन्दगी को बेहतर बना सकते हैं। इस पोस्ट में हम एक ऐसी प्रेरणादायक कहानी साझा कर रहे हैं, जो हमें यह सिखाती है कि किस तरह एक गाँव में रहने वाली लड़की, कठिनाइयों के बावजूद, अपने सपनों को पूरा कर सकती है और अपने जीवन को समृद्ध बना सकती है। मनिषा की कहानी: एक बदलाव की शुरुआत मनिषा एक छोटे से गाँव में अपने गरीब परिवार के साथ रहती थी। उसके परिवार के पास बहुत कम संसाधन थे, लेकिन उसकी आँखों में बड़े सपने थे। मनिषा को यह अच्छी तरह से समझ में आया कि अगर उसे अपने और अपने परिवार के जीवन को बेहतर बनाना है, तो उसे अपनी पढ़ाई पूरी करनी होगी और नए अवसरों का लाभ उठाना होगा। मनिषा ने अपने सपनों को पूरा करने के लिए खुद ही रास्ता निकाला। उसने अपने गाँव के बच...

मेरे गाँव के नए पडोसी ---- बन्दर और गुलदार !

जब से हमारे गाँव मैं विकास की धारा बही है उसका सबसे ज्यादा फायदा मेरे गाँव के बन्दर उठा रहे है , ये इक्कसवी सदी के बन्दर काफी विश्वास से भरे हुए है , इनके व्यवहार से कही नहीं लगता की ये कभी स्कूल नहीं गए होंगे , इनका आत्मविश्वास देखते ही बनता है , अपने फर्ज के आगे इन्ही किसी प्रकार का भय नहीं लगता , एक समय था जब इनकी शक्त महीने या साल मैं एक दो बार दिखती थी , अब यह कभी भी कही भी दिख जाते है , और आपका रास्ता तक रोक कर खड़े हो जाते है , आपके हाथ से आपके खाने का सामान , आपका चश्मा और पता नहीं क्या क्या लेकर ये चम्पंत हो जाते है , आप सिर्फ इनको खड़े होकर देखने के अलावा कुछ नहीं कर सकते ! पुरे गाँव के दौरे पर जब इनका दल निकलता है तो गाँव वाले सिर्फ दर के मारे घरो मैं छिप जाते है कुछ नहीं कर पाते है ! खेत की फसल और पेड़ के फल की तो फिर खैर नहीं !  एक जमाना था जब हमें डर लगती थी तो लोग हनुमान चालीसा का पाठ करके अपना डर दूर करते थे , परन्तु अब उन्हें यह दर खाता है की कही हनुमान चालीसा सुनकर सचमुच अगर हमुन्मन जी अपना गेंग लेकर प्रकट हो गए तो फिर उनसे छुटकारा कौन दि...