जब से हमारे गाँव मैं विकास की धारा बही है उसका सबसे ज्यादा फायदा मेरे गाँव के बन्दर उठा रहे है , ये इक्कसवी सदी के बन्दर काफी विश्वास से भरे हुए है , इनके व्यवहार से कही नहीं लगता की ये कभी स्कूल नहीं गए होंगे , इनका आत्मविश्वास देखते ही बनता है , अपने फर्ज के आगे इन्ही किसी प्रकार का भय नहीं लगता , एक समय था जब इनकी शक्त महीने या साल मैं एक दो बार दिखती थी , अब यह कभी भी कही भी दिख जाते है , और आपका रास्ता तक रोक कर खड़े हो जाते है , आपके हाथ से आपके खाने का सामान , आपका चश्मा और पता नहीं क्या क्या लेकर ये चम्पंत हो जाते है , आप सिर्फ इनको खड़े होकर देखने के अलावा कुछ नहीं कर सकते ! पुरे गाँव के दौरे पर जब इनका दल निकलता है तो गाँव वाले सिर्फ दर के मारे घरो मैं छिप जाते है कुछ नहीं कर पाते है ! खेत की फसल और पेड़ के फल की तो फिर खैर नहीं !
एक जमाना था जब हमें डर लगती थी तो लोग हनुमान चालीसा का पाठ करके अपना डर दूर करते थे , परन्तु अब उन्हें यह दर खाता है की कही हनुमान चालीसा सुनकर सचमुच अगर हमुन्मन जी अपना गेंग लेकर प्रकट हो गए तो फिर उनसे छुटकारा कौन दिलवाएगा , अब इन बंदरो के कारण हनुमान जी की भी फेन फोल्लोविंग काफी कब हो रही है , क्योको काल्पनिक हनुमान से ज्यादा लोगो को असली बंदरो से डर है ! यही कारण है बन्दर प्रभावित जगहों मैं दुसरे देवताओ का बोलबाला है परन्तु हनुमान जी की लोकप्रियता दिन प्रतिदिन कम हो रही है ! लोगो को बदरं की इस समस्या का समाधान दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा है !
आज बन्दर वही सब गाँव मैं कर रहा है जो अक्सर इस राज्य के नेता लोग जनता के साथ करते आये है ! जनता के पैसे पर ठाठ -बात उदाना , हमारे विधायक लोग यह काम देहरादून मैं कर रहे है , जनता के दुःख दर्द से दूर , देहरादून की चमकीली नगरी मैं सब ऐसे आराम उपलबढ़ है , अब कौन पहाड़ी ३०० /४०० किल्मीटर दूर से अपने पानी पीने की शिकायत लेकर आएगा ! जनता फिर भी अपने इन दुखो से समझोता कर लेती है परन्तु अब नेताओ के इन पर्याय्वाची बंदरो ने अब यहाँ के लोगो को गाँव का भी नहीं छोड़ा ! इनको भी सब आदते इनके आगको की है , बिना पूछे जाछे सब दूसरो के माल को चट कर जाना और आम जनता सिर्फ खड़े होकर अपने घर को जलते हुए देखती रहती है , क्योकि बंदर को किसी प्रकार की आप हानि नहीं पंहुचा सकते , क्योकि कानून मैं इंसान की जिन्दगी से ज्यादा कीमती बन्दर की जिंदगी है , और यह हम कैसे सलमान खान साहब को भूल सकते है , कैसे चिंकारा अभी भी उनके छोड़ नहीं रहा है , कुछ समय तो उसके कारण उन्हें जेल मैं भी रहना पड़ा , और जब सलमान खान एक्शन हीरो होने के बावजूद चिनकर के चक्कर मैं जेल चले गए तो हमारा तो कुछ भी हो सकता है !
बन्दर के अलावा एक और प्राणी है जिसका डर आजकल मेरे गाँव वालो को सता रहा है और वह है गुलदार का , और गुलदार मेरे गाँव के जंगलो मैं बहुत बात देखा गया है , और हद तो तब हो गयी जब एक गुलदार चौखुटिया बाजार मैं आ या , अभी कुछ समय पहले की बात है जब यह गुलदार चौखुटिया के नजदीक खेतो मैं नजर आया सुबह का समय था और लोग इस नए प्राणी को देखकर खासा परेशान हो गए , इसने अपने हमले सो कुछ लोगो को घायल भी कर दिया था, वो तो अच्छा हुआ की गुलदार बाजार मैं एक दूकान मैं घुस गया और समझदार लोगो ने उसे उस दूकान मैं अपनी समझदारी से बंद कर दिया , आप इन वन्य जानवरों पर किसी प्रकार का जानलेवा हमला नहीं कर सकते क्योकि वन्य जीवन एक्ट मैं उनके अपने अधिकार है और अगर आपने अगर गलती से इनको मार दिया तो आपके ऊपर भी मुक़दमा दर्ज किया जायेगा और आपको सजा हो सकती है , इसलिए इन लोगो ने इस गुलदार की खबर वन विभाग अल्मोड़ा को दी और जिसके बाद वन विभाग वाले इस गुलदार को वह से ले गए !
आज खेती के नाम पर जमीन का प्रतिशत दिन प्रति दिन कम होता जा रहा है और जिसके कारण लोगो का खेती के प्रति रुझान काफी कम हो गया है , शाक -शब्जी और फलो का गाँव मैं न उगना भी एक कारण है जिसके कारण ये बन्दर और बाग़ अक्सर आपको गाँव और उसके इर्द गिर्द घुमाते नजर आते है और गुलदार अक्सर गाँव वासियों को घायल करके और उनका शिकार कर के निकल जाते है , गुलदारो का इस प्रकार के हमले गाँव मैं बढ़ते जा रहे है और जो उनकी चिंता का एक बड़ा कारण बने हुए है , बन्दर और गुलदार और उसके जंगली सुवर गाँव के बची हुई खेती के सबसे बड़े दुश्मन है और इनके द्वारा नष्ट की गयी खेइत को किसी प्रकार का मुआवजा भी नहीं मिलता और अभी इस बार फसल नष्ट होने पर सरकार ने ५०० रुपये का मुआवजा किसानो को दिया था ,आप इस से अंदाजा लगा सकते है की किसान की एक सीजन की खेती का मूल्य सिर्फ ५०० रुपये रह गया है तो फिर क्यों वह पलायन नहीं करेगा ! खेती के नाम पर जमीन काफी कम है पहाड़ मैं इसलिए कभी भी पूरी तरह से खेती पर निर्भर रहना अब एक बहुत बड़ी मुर्खता होगी और यही कारण है लोगो का पहाड़ से मोह बिलकुल ख़तम सा हो गया है ,अब पहाड़ मैं कुछ समय के बाद सिर्फ वही परिवार रह जायेंगे जिनके पास अपना एक आय का जरिया है और या फिर वो इतने असहाय है की वो पहाड़ के बिना कही नहीं जा सकते , पहाड़ को आबाद करने का सबसे अच्छा तरीका सिर्फ रोजगार है , पहाड़ मैं जितने अधिक रोजगार के अवसर होंगे उतना ही पहाड़ी पहाड़ से कम निकलेगा ! आज खेती , फल और छोटे जानवर न होने के कारण बन्दर और बाग़ भी मजबूर है जंगल से बहार निकलने को और उनका इस तरह से जंगल छोड़ कर आबादी वाली जगह मैं आना आम जनता के लिए एक बहुत बड़ी चिंता का विषय है जिसमे खेती से ले कर के शरीर का बचाव भी कारण बन गए है !
इन सबसे निजात पाने का सिर्फ एक तरीका है और वो है सामाजिक एकता , इस समस्या का हल न तो सरकार के पास है और न एक आदमी के पास , इस विकराल होती समस्या का निवारण सिर्फ समाज के पास है और आपस मैं मिल कर इन सब समस्याओ पर विजय पायी जा सकती है , पर क्या समाज उत्तराखंड मैं बचा है , वह अब सबसे बड़ी चिंता का कारण बनता जा रहा है , जब तक समाज इकठ्ठा नहीं होता तब तक गुलदार और बन्दर मौजं लेते रहेगें !
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