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गाँव का बरगद: अनकही यादों का संगम

  गाँव का बरगद: अनकही यादों का संगम जीवन की भागदौड़ में कभी-कभी ऐसे पल आते हैं जब समय थम सा जाता है। कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ जब वर्षों बाद अपने गाँव के उस पुराने बरगद से फिर मुलाकात हुई। वह बरगद, जिसकी छाया में मेरा बचपन बीता था, आज भी वैसे ही खड़ा था - मजबूत, विशाल और अपनी कहानियों से भरा हुआ। एक अनोखी मुलाकात सुबह की धुंध अभी छंटी ही थी। मैं अपने शहर के जीवन से कुछ दिनों की छुट्टी लेकर गाँव पहुंचा था। गाँव में प्रवेश करते ही मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। क्या वह अभी भी वहाँ होगा? क्या वह मुझे पहचानेगा? सवालों के बीच, मेरे पैर अपने आप उस पगडंडी पर चलने लगे जो गाँव के बीचोंबीच उस विशाल बरगद तक जाती थी। दूर से ही उसकी विशाल आकृति दिखाई दी। उसकी हवा में लहराती शाखाएँ जैसे मुझे बुला रही थीं। पास पहुँचते ही लगा जैसे समय ने अपनी चाल धीमी कर दी हो। बरगद की छाया में पहुँचते ही अनायास ही मेरे होंठों पर मुस्कान आ गई। यह मुस्कान थी एक पुराने दोस्त से मिलने की खुशी की। "कैसे हो बरगद काका?" मैंने पूछा, अपने बचपन की तरह ही। हवा का एक झोंका आया और बरगद की पत्तियाँ सरसरा उठीं। मुझे लगा जैसे वह ...