(फोटो आभार चौखुटिया गेवाड विकास परिषद्)
यह बात उन दिनों की है जब मैं चौखुटिया इन्टर कॉलेज मैं छठी कक्षा का छात्र था, सोनगांव स्कूल से पांचवी पास करके चौखुटिया इन्टर कॉलेज मैं प्रवेश लिया था, चौखुटिया मुझ गाँव के स्कूल से पढ़े के लिए बिलकुल शहर सा था, सोनगांव के स्कूल के आस पास कोई दुकान थी , और न ही कुछ खाने को मिलता था, परन्तु चौखुटिया इसके विपरीत एक बड़ा सा बाजार था, उस ज़माने मैं फ़ास्ट फ़ूड के तौर पे आलू- मटर सबसे हिट डिश थी, आलू-मटर संग रायता मेरा पसंदीदा डिश थी , अब पापा दिल्ली रहते थे, और गाँव मैं अम्मा जी घर देखती थी, और तब जेब -खर्ची नाम की कोई भी खर्ची नहीं होती थी, सिर्फ दाल-भात खाओ या फिर मदुए की रोटी और साग, बस यही सब कुछ खाना पड़ता था !
बाजार मैं स्कूल जाते वक़्त रोज आलू-मटर अपनी ओर बुलाते थे, परन्तु पैसे न होने के कारण मैं मन मसोस कर रह जाता था, लेकिन इस समस्या का हल भी जल्दी निकल गया , मेरे कक्षा के कुछ साथी मेरे मित्र बन गए जिन्होंने मुझे अपनी इस प्यारी डिश को खिलाया , दिल बाग-बाग हो गया आलू- मटर खा कर , उन्होंने मुझे दो , चार बार खिलाया, और हर बार पैसे उन्होंने ही दिए, और अब वो चाहते थे की मैं भी उन्हें आलू-मटर खिलाऊ , अब दोस्ती मैं तो ऐसा ही होने वाला ठेरा , पर मेरे तो पास तो पैसे कभी होते नहीं थे, आमा कहने वाली ठेरी , "हमारे घर मैं बिस्कुट है, नमकीन है ,चने है ,मूंगफली है फिर पैसे किस लिए चाहिए" इसलिए आमा से कभी पैसे नहीं मिले !
.अब दोस्तों को लगने लगा कि उन्होंने मेरे अलूम मटर पर जो पैसे खर्च किये है वो डूब गए , न मेरे पास कभी पैसे होंगे , न हीं और कभी वो मेरे पैसो के अलूम मटर का मजा उठा पाएंगे , धीरे धीरे वह मुझसे दूरी बनाने लगे , अगला महीना शुरू हुआ , देखा तो एक दिन अचानक फीस का दिन आया ,उनमे से एक ने मुझसे कहा " देबिया, फीस लाया है क्या ? " मैंने जवाब दिया ," हा फीस तो लाया हु ," मित्र ने कहा यार मैं तो फीस कल दूंगा , तू भी कल दे देना , आज हाफ टाइम मैं बाजार भी चलेंगे , बड़े दिन हो गए आलू -मटर भी नहीं खाए ,"
अब फीस का डर सताने लगा , की फीस कहा से दी जाएगी , अम्मा से मांग नहीं सकता था , पिटाई का डर था और इधर स्कूल मैं रोज कैलाश चंदर मास साब रोज फीस का कहने लगे, अब मन मैं एक तरकीब आई और सोचा स्कूल न जाकर रस्ते मैं कही छुप जाता हु, न अम्मा को पता चलेगा न स्कूल, अब रोज यही रूटीन फॉलो करने लगा, घर से तैयार होकर स्कूल के लिए निकलना और बाजार मैं पहुच कर स्कूल न जाना, अब स्कूल के समय पर मैं पास के गाँव धुधालिया मैं लोगो की गाय-भैस चराता था , और कापी के पन्नो से हवाई जहाज बनाता था , और समय रह गया तो रामगंगा मैं कुड़ी बनता था, उस ज़माने मैं न तो आज की तरह पेरेंट्स टीचर मीटिंग होती थी और न ही रिपोर्ट कार्ड, और धीरे धीरे समय कटने लगा, अब आने वाले महीनो की भी फीस मटर मैं उड़ गयी, क्योकि डर था अगर मास्टर के पास गया तो पिछले महीने की फीस भी मांगेगा !
अब एक न एक दिन तो चोरी पकड़ी जानी थी और वो पकड़ी गयी, स्कूल से मेसेज आया की मैं स्कूल नहीं जा रहा हु, अब हमारे गाँव मैं सबसे अच्छी चीज है देवता वो सबको बचा लेता है, और मेरे साथ भी ऐसा हुआ , अम्मा- और माँ का सबसे लाडला होने के कारन उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा न डाटा, सीधा मान लिया की लगता है इस पर कोई देवता लग गया है जिसके कारण यह स्कूल नहीं जा रहा है, वो तो मुझे मालूम था की मेरे स्कूल न जाने मैं देवता का नहीं आलू-मटर का हाथ है, परन्तु भोली अम्मा- और इजा को कहा मालूम, अगले दिन ही मेरी दूर वाली इजा की बुआ का पता निकाला गया और सीधा सुबह नाहा कर मुझे वहा ले जाया गया मैंने सोचा लगता है कोई स्ट्रिक्ट आदमी होगा , और हो सकता है पिटाई भी हो सकती है परन्तु जब वह पंहुचा तो पता चला की इजा मुझे वहा भभूत लगाने लायी है , आप सब जानते है भभूत क्या होता है, उन्होंने भभूत लगाया और मेरे सब खून माफ हो गए, इजा मुझे वहा से सीधा स्कूल ले गयी और ६ महीने की बकाया फीस एक साथ भर दी, और पता चला की अगले महीने वार्षिक परीक्षा है, अब पढाई की तयारी शुरू हो गयी, लेकिन कुछ आता तभी पास होता, वो तो मैं शुक्र गुजार हु अपने पी टी सर का जिन्होंने मुझे पास लायक समझा , बाकी सब ने मुझे फ़ैल कर दिया, लेकिन वो भी कम अचीवमेंट नहीं था ७ सब्जेक्ट मैं से कम से कम पी टी मैं तो पास हुआ, जैसे ही रिजल्ट घर पंहुचा पिता जी ने एक लात मारी आप समझ ही सकते है कहा मारी होगी और सीधा ...दिल्ली ले आये ...बाकी की जिंदगी आप देख ही रहे है....जय हो आलू- मटर जिनके कारण मैं दिल्ली जैसे शहर को देख पाया...जय हो..!
यह बात उन दिनों की है जब मैं चौखुटिया इन्टर कॉलेज मैं छठी कक्षा का छात्र था, सोनगांव स्कूल से पांचवी पास करके चौखुटिया इन्टर कॉलेज मैं प्रवेश लिया था, चौखुटिया मुझ गाँव के स्कूल से पढ़े के लिए बिलकुल शहर सा था, सोनगांव के स्कूल के आस पास कोई दुकान थी , और न ही कुछ खाने को मिलता था, परन्तु चौखुटिया इसके विपरीत एक बड़ा सा बाजार था, उस ज़माने मैं फ़ास्ट फ़ूड के तौर पे आलू- मटर सबसे हिट डिश थी, आलू-मटर संग रायता मेरा पसंदीदा डिश थी , अब पापा दिल्ली रहते थे, और गाँव मैं अम्मा जी घर देखती थी, और तब जेब -खर्ची नाम की कोई भी खर्ची नहीं होती थी, सिर्फ दाल-भात खाओ या फिर मदुए की रोटी और साग, बस यही सब कुछ खाना पड़ता था !
बाजार मैं स्कूल जाते वक़्त रोज आलू-मटर अपनी ओर बुलाते थे, परन्तु पैसे न होने के कारण मैं मन मसोस कर रह जाता था, लेकिन इस समस्या का हल भी जल्दी निकल गया , मेरे कक्षा के कुछ साथी मेरे मित्र बन गए जिन्होंने मुझे अपनी इस प्यारी डिश को खिलाया , दिल बाग-बाग हो गया आलू- मटर खा कर , उन्होंने मुझे दो , चार बार खिलाया, और हर बार पैसे उन्होंने ही दिए, और अब वो चाहते थे की मैं भी उन्हें आलू-मटर खिलाऊ , अब दोस्ती मैं तो ऐसा ही होने वाला ठेरा , पर मेरे तो पास तो पैसे कभी होते नहीं थे, आमा कहने वाली ठेरी , "हमारे घर मैं बिस्कुट है, नमकीन है ,चने है ,मूंगफली है फिर पैसे किस लिए चाहिए" इसलिए आमा से कभी पैसे नहीं मिले !
.अब दोस्तों को लगने लगा कि उन्होंने मेरे अलूम मटर पर जो पैसे खर्च किये है वो डूब गए , न मेरे पास कभी पैसे होंगे , न हीं और कभी वो मेरे पैसो के अलूम मटर का मजा उठा पाएंगे , धीरे धीरे वह मुझसे दूरी बनाने लगे , अगला महीना शुरू हुआ , देखा तो एक दिन अचानक फीस का दिन आया ,उनमे से एक ने मुझसे कहा " देबिया, फीस लाया है क्या ? " मैंने जवाब दिया ," हा फीस तो लाया हु ," मित्र ने कहा यार मैं तो फीस कल दूंगा , तू भी कल दे देना , आज हाफ टाइम मैं बाजार भी चलेंगे , बड़े दिन हो गए आलू -मटर भी नहीं खाए ,"
आलू मटर का इतने दिनों बाद नाम सुनकर मुह मैं पानी आ गया , और जैसे ही घंटी बजी मैं और मेरे दोनों साथी सीधा बाजार चनरी दा की दुकान पर आलू मटर खाने पहुच गए , आलू मटर बहुत बढ़िया बनाते थे चनरी दा इसलिए सदा उनकी दूकान पर भीड़ रहती थी , कुछ देर के बाद नंबर आ गया और फिर खूब मजे से अलूम मटर खाने लगा , मैं सबसे कोने पर बैठा था जैसे ही आलू मटर ख़तम हुए दोनों दोस्त पानी पीने के बहाने उठ कर चल दिए , मैंने आलू मटर खूब मजे लेकर खाए और प्लेट भी चाट कर बिलकुल साफ़ कर दी , पर दोस्तों का पता ही नहीं , मैंने थोडा इन्तजार किया ,कि अब पैसे देने आयेंगे , अब आयेंगे और उधर से चनरी दा मुझे टक टकी लगा कर देखने लगे जैसे पूछ रहे हो " पैसे दो तीन प्लेट आलू मटर के " , मुझे पसीना आने लग गया डर के मारे क्योंकि ऐसा कभी हुआ नहीं था , मैं सोचने लगा अगर दोस्त नहीं आये तो क्या होगा ? तभी जेबी मैं हाथ दल्ला तो takiउनका इन्तजार किया थोड़ी देर अब अलूम मटर खाने का मौका मेरे पास कभी पैसे नहीं होंगे , तो वो मुझे हाफ टाइम मैं बाजार भी नहीं ले जाते न ही कुछ खिलाते, आखिर दोस्त किसके थे, उनके मन मैं एक तरकीब आई, फीस वाला दिन था मैं फीस के पैसे लेकर आया था , उन्होंने कहा यार चल फीस के पैसे कल दे देना बाजार चलते है, मैं बड़ा खुश हुआ आज फिर आलू-मटर खाने को मिलेंगे, उन्होंने आलू-मटर आर्डर किया और मैंने बड़े चाव से खाया , पर जैसे ही बिल देने का समय आया दोस्तों ने यह कह कर पीछा छुड़ाया की आज उनके पास पैसे नहीं है, हारकर मुझे फीस के पैसे आलू मटर वाले भैया को देने पड़े.
अब फीस का डर सताने लगा , की फीस कहा से दी जाएगी , अम्मा से मांग नहीं सकता था , पिटाई का डर था और इधर स्कूल मैं रोज कैलाश चंदर मास साब रोज फीस का कहने लगे, अब मन मैं एक तरकीब आई और सोचा स्कूल न जाकर रस्ते मैं कही छुप जाता हु, न अम्मा को पता चलेगा न स्कूल, अब रोज यही रूटीन फॉलो करने लगा, घर से तैयार होकर स्कूल के लिए निकलना और बाजार मैं पहुच कर स्कूल न जाना, अब स्कूल के समय पर मैं पास के गाँव धुधालिया मैं लोगो की गाय-भैस चराता था , और कापी के पन्नो से हवाई जहाज बनाता था , और समय रह गया तो रामगंगा मैं कुड़ी बनता था, उस ज़माने मैं न तो आज की तरह पेरेंट्स टीचर मीटिंग होती थी और न ही रिपोर्ट कार्ड, और धीरे धीरे समय कटने लगा, अब आने वाले महीनो की भी फीस मटर मैं उड़ गयी, क्योकि डर था अगर मास्टर के पास गया तो पिछले महीने की फीस भी मांगेगा !
अब एक न एक दिन तो चोरी पकड़ी जानी थी और वो पकड़ी गयी, स्कूल से मेसेज आया की मैं स्कूल नहीं जा रहा हु, अब हमारे गाँव मैं सबसे अच्छी चीज है देवता वो सबको बचा लेता है, और मेरे साथ भी ऐसा हुआ , अम्मा- और माँ का सबसे लाडला होने के कारन उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा न डाटा, सीधा मान लिया की लगता है इस पर कोई देवता लग गया है जिसके कारण यह स्कूल नहीं जा रहा है, वो तो मुझे मालूम था की मेरे स्कूल न जाने मैं देवता का नहीं आलू-मटर का हाथ है, परन्तु भोली अम्मा- और इजा को कहा मालूम, अगले दिन ही मेरी दूर वाली इजा की बुआ का पता निकाला गया और सीधा सुबह नाहा कर मुझे वहा ले जाया गया मैंने सोचा लगता है कोई स्ट्रिक्ट आदमी होगा , और हो सकता है पिटाई भी हो सकती है परन्तु जब वह पंहुचा तो पता चला की इजा मुझे वहा भभूत लगाने लायी है , आप सब जानते है भभूत क्या होता है, उन्होंने भभूत लगाया और मेरे सब खून माफ हो गए, इजा मुझे वहा से सीधा स्कूल ले गयी और ६ महीने की बकाया फीस एक साथ भर दी, और पता चला की अगले महीने वार्षिक परीक्षा है, अब पढाई की तयारी शुरू हो गयी, लेकिन कुछ आता तभी पास होता, वो तो मैं शुक्र गुजार हु अपने पी टी सर का जिन्होंने मुझे पास लायक समझा , बाकी सब ने मुझे फ़ैल कर दिया, लेकिन वो भी कम अचीवमेंट नहीं था ७ सब्जेक्ट मैं से कम से कम पी टी मैं तो पास हुआ, जैसे ही रिजल्ट घर पंहुचा पिता जी ने एक लात मारी आप समझ ही सकते है कहा मारी होगी और सीधा ...दिल्ली ले आये ...बाकी की जिंदगी आप देख ही रहे है....जय हो आलू- मटर जिनके कारण मैं दिल्ली जैसे शहर को देख पाया...जय हो..!

Nice article bisht ji....dil se likha he
जवाब देंहटाएंDhanywad शंकर भाई ...सही दिल की आवाज सचमुच अलग होती है ...अपने आप दिखती है ..!
जवाब देंहटाएंbahut khoob.. likhte rahiye
जवाब देंहटाएंDhanywaad Pant Ji ...!
जवाब देंहटाएंwow,bhai ji badi interesting story hai
जवाब देंहटाएंधन्यवाद ध्यानी जी !!
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