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दामाद ...एक अटूट रिश्ता !

दामाद शब्द काफी चर्चा मैं है आजकल दुबारा से , आईपीएल के कारण एक ससुर की दुबारा जान पे बन आई है , लेकिन क्योकि हम एक लोकत्रंत्र मैं रहते है इसलिए मोरालिटी कभी इस्तीफे का कारन नही बनी है भारतीय राजनीती मैं , क्यों की तब लोग , 'कानून अपना काम करेगा" का ढोल पीटने लग जाते है, और यही हो रहा है ससुर और दामाद के प्रकरण मैं, श्रीनिवासन साहब ने सही कहा आज प्रेस कांफ्रेंस मैं सबसे पहले की वो एक बाप भी है और एक ससुर भी है , इसलिए शायद वो ससुर और बाप होने का फ़र्ज़ तो निभा रहे है परन्तु BCCI प्रेजिडेंट होने का नहि. अगर वो कुर्सी ही छोड़ देंगे तो फिर उन्हें कौन पूछेगा , अब कांग्रेस वाले क्या बोके इस प्रकरण मैं , लेकिन दबे मुह से मोरालिटी के बारे मैं बोल जरुर रहे है लेकिन जब उनकी पार्टी का दामाद पुरे देश पे भारी पद गया था उस वक़्त ये उपदेश और मोरालिटी कहा चली गयी थी,औरकानून के हाथ इतने लम्बे है की उन्होंने दिन और रात लगाकर जब तक दामाद साहब को ईमानदारी का सर्टिफिकेट नहीं दिलवा दिया तब तक वो चैन से नहीं बैठे …. और हम कहते है की यहाँ तारिक पे तारिक ...तारिक पे तारिक के अलवा कुछ नहीं मिल्त….पर देखो इन मेहनतकश कांग्रेस वालो को कितनी जल्दी वो इन दामाद के लिए इनाम्दारी का सर्टिफिकेट ले आये…। यहाँ तो …पर एक बात सच है राजनीती की परिपेक्ष मैं मोरालिटी सिर्फ दूसरो के लिए है अपने ऊपर आती है तब कुर्सी तभी छोड़ेंगे जब कोर्ट कहेगा ...नहीं तो कभी नहि…।वह रे इंडिया !

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