यादों का सफर: गाँव से महानगर तक
लिफ्ट से बाहर निकलते हुए, कार की ड्राइविंग सीट से बैठकर देवली गाँव के ट्रैफिक को देखते हुए, मेट्रो की बड़ी खिड़की से यमुना का नजारा देखते हुए, मोदी जी के एक्सप्रेसवे पर गाड़ी चलाते हुए, मोबाइल की स्क्रीन पर मस्त मस्त रील देखते हुए... जब दिल को फिर भी चैन नहीं आता तो... कुछ पलों के लिए यादों में गाँव पहुँच जाता हूँ... फिर खो जाता हूँ बचपन और पहाड़ की उन यादों में... उन्हीं यादों को कुरेदने का निर्णय लिया है और सोचा लिखकर उन्हें फिर याद किया जाए और एक ऐसी जगह लिख दिया जाए जहाँ जब मन करे उन्हें पढ़ लिया जाए, उन्हें याद कर लिया जाए। इसलिए सोचा इनको इस ब्लॉग में लिख दिया जाए जिससे ये कुछ समय के लिए ही सही, ये अमर हो जाएं। प्रयास करता हूँ इन्हें एक जगह लिखने की और साथ ही जरूरी नहीं कि सब एक साथ लिख पाऊँ, जब समय लगेगा, जब याद आएगी तब लिखूँगा अपनी और अपने साथ वालों की कहानी... जो शुरू मेरे गाँव से होगी... अब पहुँचेगी कहाँ, वह समय बताएगा... चलो शुरुआत करते हैं...
बिलकुल! यह कहानी मेरे बचपन के उन वर्षों की है जब मैंने अपने गाँव उडलिखान में जन्म लिया, चलना और बोलना सीखा। उडलिखान उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र का एक छोटा सा गाँव है, जो अल्मोड़ा जिले की चौखुटिया तहसील का हिस्सा है, जो पहले रानीखेत तहसील में आता था। यह उस समय की बात है जब न मोबाइल था, न टीवी, और न ही गाड़ियाँ। बस एक राम सिंह का ट्रक होता था, और जब वह चौखुटिया से आता था, तो पूरे गाँव में उसके चलने की आवाज़ सुनाई देती थी।
गाँव में उस वक्त मेरी उम्र के और भी बच्चे थे। मैं अपने इजा-बाज्यू का सबसे बड़ा लड़का था। घर में आमा थी, इजा थी और बाबू थे। बाबू तल्ल यानी दिल्ली रहते थे। आमा और इजा के साथ मैं गाँव में रहता था। गाँव में मेरे और भी साथी थे जिनके साथ मैंने खेलना शुरू किया था, लेकिन अभी स्कूल जाना शुरू नहीं किया था। गाँव में मेरे साथ जो बच्चे थे उनमें जसी, परी, रेनू, हीरा, खश्ती, भग, हेमा, महेश, गणेश, दिनेश, चंदन, बिशन, पुष्कर, बीना थे। और बड़े में गोपिया चाचा, दानी चाचा, उमराव सिंह, तारा सिंह, खुशाल सिंह, खेमिया और छोटे में हिमतुवा, जगत, चंदन, कुंदन थे। दिनेश और आनंद भी छोटे थे, वीरेंद्र सिंह साथ के थे और महिंदर छोटा था।
उस समय 19 परिवार रहते थे। गाँव में आदमी लोगों की ड्यूटी होती थी नौकरी करना और जो लोग नौकरी नहीं कर रहे थे, वो खेती करते थे। गाँव की औरतें खेती करती थीं। खेत को बंजर रखना एक प्रकार का अभिशाप माना जाता था। महिलाएँ खेती का काम करती थीं और पुरुष हल चलाने से लेकर लकड़ी काटने और बाज़ार से सामान लाने का काम करते थे। बाज़ार चौखुटिया था जो 2 किलोमीटर था, जाने के लिए सिर्फ पैदल जाना होता था, कार, बस, स्कूटर, बाइक और साइकिल भी लोगों के पास नहीं थी।
मेरे गाँव का पुराना नाम ग्वालिचोरा भी है, उदलिखान पार का भी है और साथ ही हमारी ग्राम सभा में हुलांग, चमडगैर और कुर्मान भी हैं। ग्राम सभा में इन सभी गाँवों में हम लोगों का निमंत्रण चलता था। गाँव खिलाने का मतलब इन सभी गाँवों के निमंत्रण देना होता था। सोनगाँव और घनश्याल गाँव भी हमारे नजदीक गाँवों में थे। हुलांग जबकि सोनगाँव में आता था पर नजदीक होने की वजह से यहाँ भी निमंत्रण चलता था।
गाँव के ऊपर धार का जंगल था जिसमें बाज के पेड़ ज्यादा थे, लाटूगैर का गधेरा हमारे गाँव के ऊपर था, धार में जाने के लिए लालुपाती से जाना पड़ता था और गोरु और बाल्ड को जंगल हम सौल्डयानी गध्यार से पाट्या और पार पाट्या से सिमार ले जाते थे। सिमार में पानी हुआ करता था इसलिए पूरे दिन हम बच्चे वहाँ रहते थे और खेलते भी थे। सिमार से आगे भैसिकोट का जंगल था और ऊपर होते हुए हम लखनपुर भी चलते जाते थे। पाट्या में हमने एक बड़ी छापरी भी बना रखी थी जिसमें हम सब बच्चे खेलते थे और गोपिया चाचा ने उस छापरी को बनाया भी और कई बार सजाया भी। पूरे दिन भर जिन दिनों हम गोरु चराते थे, तो हम अपने घरों से थोड़ा चावल और दाल भी ले जाते थे और उसी छापरी में आग जलाकर खिचड़ी बनाते थे।
गर्मी, सर्दी और बरसात के मुख्य मौसम हुआ करते थे। बारिश बहुत प्रकार की होती थी, जिसमें झड़ लगते थे तो बारिश पूरे हफ्ते से महीने तक भी कभी चलती थी। गाड़ गधेरा आते थे। मैंने अपने गाँव लाटुगैर का गधेरा एक बार ही आते देखा था, बाकी तो सोल्ड्यानी गध्यार और करू रौल भी कभी-कभी आ जाता था। रामगंगा बहुत आती थी और माई थान के भीत कई बार बग जाते थे। चौखुटिया जाने का सिर्फ रास्ता माई थान मंदिर के सामने की भीतों से था, वो भी कई बार बग जाते थे इसलिए इखार के रास्ते चौखुटिया जाते थे।......to be continued..!!



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