सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

गाँव और शहर का फ़र्क़: एक आत्मीय यात्रा





गाँव और शहर का फ़र्क़: एक आत्मीय यात्रा

मैं पिछले दस वर्षों से शहर में रह रहा हूँ, लेकिन मेरी आत्मा अभी भी गाँव की मिट्टी में बसी है। हर सुबह जब शहर की भागदौड़ में निकलता हूँ, तो मन में गाँव की वो सुबह याद आती है - मोर की आवाज़, खेतों से आती ताज़ी हवा, और माँ की चूल्हे पर बनती रोटियों की खुशबू।

पिछले हफ्ते एक पारिवारिक समारोह में मुझे अपने पैतृक गाँव जाना हुआ। शहर छोड़ते ही जैसे मन हल्का हो गया। सड़क के किनारे लहलहाते खेत, दूर तक फैली हरियाली, और आसमान में उड़ते पंछी - सब कुछ वैसा ही था जैसा बचपन में देखा था।

चाचा के घर पहुँचते ही पहली मुलाक़ात चाची से हुई। उनकी आँखों में वही पुराना प्यार था। "बेटा, कितना दुबला हो गया है, शहर में खाना-पीना ठीक से नहीं होता क्या?" उनकी इस मामूली सी चिंता में कितना प्यार छिपा था। चाय के साथ चाची ने ताज़ा मक्खन और गुड़ परोसा। कहने लगीं, "बेटा, शहर में तो ये सब मिलता नहीं होगा।"

इस बार गाँव में कुछ अलग था। धार्मिक आयोजन में शहर से कई मेहमान आए थे। उनका व्यवहार देखकर मन में एक टीस उठी। वे चाचा के परिवार को जैसे एक सेवक की तरह देख रहे थे। "अरे भाई साहब, पानी गरम क्यों नहीं है?", "चाय में इतनी शक्कर क्यों है?", "कमरे में पंखा तेज़ करो" - ऐसी छोटी-छोटी बातें जो दिल को छू जाती थीं।

चाचा का परिवार, जो खुद सीमित संसाधनों में जीवन बिता रहा है, हर मेहमान की हर छोटी ज़रूरत का ख्याल रख रहा था। चाची सुबह चार बजे से रात दस बजे तक किचन में व्यस्त थीं। चाचा हर मेहमान के लिए चाय-नाश्ते से लेकर सोने के इंतज़ाम तक में लगे रहते। उनका बेटा राजू, जो दिन भर खेत में काम करता है, वह भी रात को मेहमानों के लिए दूध लेने जाता।

एक शाम मैं चाचा के साथ बैठा था। वे कह रहे थे, "बेटा, आज के ज़माने में रिश्ते बदल गए हैं। पहले जब कोई मेहमान आता था, तो घर में खुशी का माहौल होता था। आज लोग होटल की तरह व्यवहार करते हैं।" उनकी आँखों में दर्द था, लेकिन चेहरे पर मुस्कान थी।

मैंने अपने आप से सवाल किया - क्या हम शहर वाले कभी ऐसा कर पाते हैं? जब चाचा या उनका परिवार शहर आता है, तो क्या हम उन्हें वही प्यार दे पाते हैं? शहर की व्यस्त जीवनशैली ने हमें कहीं खोखला कर दिया है। हमारे पास समय नहीं है, जगह की कमी है, या फिर हम इतने व्यस्त हैं कि किसी के लिए रुक नहीं पाते।

गाँव में एक और चीज़ देखी जो दिल को छू गई। राजू की बेटी पढ़ाई में बहुत अच्छी है। वह डॉक्टर बनना चाहती है। चाचा ने अपनी सारी जमा पूँजी उसकी पढ़ाई में लगा दी है। जब मैंने उनसे इस बारे में पूछा, तो बोले, "बेटा, पैसा तो आता-जाता रहेगा, लेकिन बच्चों का भविष्य सबसे ज़रूरी है।"

एक हफ्ते के इस प्रवास ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। गाँव की सादगी में छिपी गहराई, रिश्तों का निःस्वार्थ प्यार, और परिवार के लिए त्याग की भावना - ये सब शहर में कहीं खो गई है। हम अपनी सफलता के पैमाने बैंक बैलेंस से नापते हैं, जबकि असली समृद्धि रिश्तों की गरमाहट में छिपी है।



आज जब मैं शहर लौट आया हूँ, तो मन में एक संकल्प है। मैं अपने रिश्तों को वही गरमाहट देना चाहता हूँ जो गाँव में देखी। चाहे वह समय की कमी हो या जगह की, लेकिन अपनों के लिए थोड़ा रुकना सीखना होगा। क्योंकि आखिरकार जीवन का असली सुख अपनों के साथ बिताए पलों में है, न कि बैंक बैलेंस में।

गाँव की यह यात्रा मेरे लिए सिर्फ एक यात्रा नहीं थी। यह एक आत्म-खोज थी, जहाँ मैंने अपनी जड़ों से फिर से जुड़ने का प्रयास किया। शहर की चकाचौंध में खोई हुई मानवीयता को फिर से खोजने का प्रयास।

आज भी जब मैं सोचता हूँ, तो चाची की वो ममता भरी डाँट, चाचा का वो निःस्वार्थ प्यार, और गाँव का वो सरल जीवन आँखों के सामने आ जाता है। शायद यही वजह है कि गाँव से शहर आ चुका हूँ, लेकिन गाँव अभी भी मेरे भीतर जीवित है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मेरी दादी - मेरी आदर्श !!!

पहाड़ के बच्चो का जीवन अकसर अपनी माता जी या  दादी जी के आँचल मैं पलता और  बड़ा  होता है , क्योकि पुरुष अधिकतर समय गाव से  बाहर रहकर रोटी कमाने की दौड़  मैं  लगे  होते है ! माना की आज पहाड़ बहुत बदल चुका है परन्तु पहाड़ मैं रहने वाले बच्चो के लिए अभी भी  यही सच है ! समय काफी आगे निकल गया है आज मैं जिनके  बारे मैं लिखने जा रहा हु वो अब हमारे बीच मैं नहीं है , पर उनकी याद सदा दिल मैं रहती है और उनके मेरे जीवन पर  बहुत एहसान  है ,  इतना बड़ा परिवार है तो उसका कारण सिर्फ वो है , उन्होंने एक पक्की नीव की तरह हम सब के  जीवन को सहारा दिया है ! आज पिताजी की उम्र ७५ साल की हो गयी है और उनसे लगभग बीस साल पहले आमा जन्म कुमाऊ के द्वाराहट स्थित किरौला गाँव मैं हुआ था , मैंने यह गांव कभी नहीं देखा पर सुना जरुर है इस गाँव के बारे मैं ! लगभग १९२० के समय उनका जन्म इस गाँव मैं हुआ होगा ! उनके बचपन के बारे मैं कभी बात नहीं  हुई , पर यह जरुर पता है की लगभग १२ वर्ष की उम्र मैं उनकी शादी मेरे दादा जी के साथ हो गयी थी ! १२ वर्ष आज के ज़मा...

धराली की त्रासदी , जब प्रकृति ने सब्र खो दिया !!

  परिचय: जब प्रकृति ने अपना सब्र खो दिया 5 अगस्त 2025। यह तारीख उत्तराखंड के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है। इस दिन से पहले, उत्तरकाशी जिले में गंगा (भागीरथी) के किनारे बसा खूबसूरत गाँव 'धराली' अपनी सेब के बागानों, शांत वातावरण और हरियाली के लिए जाना जाता था। यह एक ऐसी जगह थी जहाँ लोग शहर के शोर से दूर सुकून के पल बिताने आते थे। लेकिन उस रात, प्रकृति ने अपना वो रौद्र रूप दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। कुछ ही घंटों में, हँसता-खेलता धराली गाँव जलमग्न हो गया, और अपने पीछे छोड़ गया सिर्फ तबाही, खामोशी और अनगिनत सवाल। आज हम उस विनाशलीला को याद करेंगे, उसके कारणों की गहराई में जाएँगे और समझने की कोशिश करेंगे कि धराली की इस जल समाधि से इंसान क्या सबक सीख सकता है। आपदा के पीछे के विस्तृत कारण: यह सिर्फ बादल फटना नहीं था अक्सर ऐसी घटनाओं को केवल "बादल फटने" ( Cloudburst ) का नाम देकर एक प्राकृतिक आपदा मान लिया जाता है। लेकिन धराली की त्रासदी कई वर्षों से की जा रही मानवीय गलतियों और प्रकृति की चेतावनियों को नजरअंदाज करने का एक भयानक परिणाम थी। इसक...

आलू मटर ने पहुचाया दिल्ली !

                               (फोटो आभार   चौखुटिया गेवाड विकास परिषद्) यह बात उन दिनों की है जब मैं चौखुटिया इन्टर कॉलेज मैं छठी कक्षा का छात्र था, सोनगांव स्कूल से पांचवी पास करके चौखुटिया इन्टर कॉलेज मैं प्रवेश लिया था, चौखुटिया मुझ गाँव के स्कूल से पढ़े के लिए बिलकुल शहर सा था, सोनगांव के स्कूल के आस पास कोई दुकान थी , और न ही कुछ खाने को मिलता था, परन्तु चौखुटिया इसके विपरीत एक बड़ा सा बाजार था, उस ज़माने मैं फ़ास्ट फ़ूड के तौर पे आलू- मटर सबसे हिट डिश थी, आलू-मटर  संग रायता मेरा पसंदीदा डिश थी , अब पापा दिल्ली रहते थे, और गाँव मैं अम्मा जी घर देखती थी, और तब जेब -खर्ची नाम की कोई भी खर्ची नहीं होती थी, सिर्फ दाल-भात खाओ या फिर मदुए की रोटी और साग, बस यही सब कुछ खाना पड़ता था !  बाजार मैं स्कूल जाते वक़्त रोज आलू-मटर अपनी ओर बुलाते थे, परन्तु पैसे न होने के कारण मैं मन मसोस कर रह जाता था, लेकिन इस समस्या का हल भी जल्दी निकल गया , मेरे कक्षा के कुछ साथी मेरे मित्र बन गए जिन्होंने मुझे अपन...