मेरे आंगन के पत्थर : मेरे जीवन की पाठशाला ।
इन पत्थरों पर मेरी गुजरी हुई पीढ़ी के निशान है , पीढ़ियां जरूर जवान और बूढ़ी हुई पर ये पत्थर बिना शिकन के आज भी मेरे आंगन को सवार रहे है । इन्होने अपने ऊपर बहुतों को खिलाया, दौड़ाया और चलाया , मेरे आंगन के ये पत्थर बहुतों की जिंदगी मैं मील के पत्थर बने , और कुछ आज भी इनपर खेलकर बड़े और जवान हो रहे हैं।
बचपन मैं जब मैं चल नहीं पाता था इन्हीं के सहारे मैंने अपने पांवों पर उठना सीखा ,फिर चलना सीखा और फिर दौड़ना सीखा , मेरे कमजोर पांवों को इन्होंने सहारा देकर मुझे चलना सिखाया, बहुत बार गिरा इनपर कभी चोट भी लगी फिर भी न मैने चलना छोड़ा और न इन्होंने सहारा देना छोड़ा ।
बहुत पीढ़ियां मेरी इस आंगन मैं जवान हुई और काबिल बनी , कुछ यहां रही कुछ इसे छोड़ आगे गई पर हर पीढ़ी के जो लोग इस आंगन मैं पैदा हुए उसे इन पत्थरों ने बैठने ,उठने और चलने की तालीम दी , इस तालीम ने उन्हें उम्र भर इस काबिल बनाया कि वह जीवन मैं वह सब हासिल कर ले जो उन्हें चाहिए। वर्षों बाद आज जब मैं वापस इस आंगन मैं आया हु तो लगता है जैसे बचपन वापस आ गया है , इनके बीच बैठकर बचपन दुबारा जिंदा हो चला है , सीमेंट और संगमरमर से उम्र मैं बहुत बड़े ये पत्थर मेरे उस दौर के हमसफर है जब यह दुनिया और यह जहां मेरे लिए बिल्कुल नया था ।
पत्थरों मैं दौड़कर खेलना , कभी इनके ऊपर मिट्टी से कुछ लाइन खींचकर अपने दोस्तों के साथ लंगड़ी टांग खेलना और कपड़े की बाल बनाकर पिट्ठू खेलना यह सब इन आंगन के पत्थरों से ही संभव हो पाया । गर्मी की तपिश इन्हें इतना गरम कर देती थी कि सूखा अनाज मेरी मां और दादी इनपर सुखा कर उसे भकार मैं रखती जिस से उस अनाज पर न कोई कीड़ा लगे और न उसे नमी परेशान करे , एक बार गर्मी जब मुझ पर माता निकली तो मेरी आमा ने मेरा गरम बिस्तर जून की दोपहरी मैं इन पत्थरों पर लगाया और मुझे उसपर लिटा दिया और ऊपर से दो मोटे कंबल मुझे उड़ा दिए और इन पत्थरों की गर्मी ने उस माता को ऐसा भगाया की वह दुबारा कभी मुझे जीवन मैं छू न पाई ।
इन्हीं आंगन के पत्थरों के साथ एक ओखली भी हर आंगन मैं होती है ,और आंगन बिना इस ओखली और मुंडेर के बिना कभी पूरा नहीं होता ,इस ओखली मैं हम मूसल के सहारे धान कूटते थे इस ओखली मैं हम धान, मंडूवा और अन्य प्रकार का सूखा अनाज कूटते थे । बिजली जब तक मेरे गांव नहीं पहुंची थी तब तक इस ओखली ने अनाज को खाने योग्य बनाने मैं मेरी पीढ़ी की खूब सहायता की ।
मुंडेर बचपन मैं बहुत ऊंची लगती थी ,जब तक इस पर बैठने लायक नहीं हो पाया था ,तब तक इस मुंडेर ने सहारा दिया जिस से मैं ठीक तरह बिना सहारे के अपने पांवों पर खड़ा हो सकू ।और जब एक बार बड़ा हुआ तो इस मुंडेर ने समाज मैं कैसे बैठा जाता है उसकी अकल दी ।
आंगन : जीवन की नींव
यह आंगन, ये पत्थर, यह ओखली और मुंडेर - ये सब कुछ मेरे लिए केवल वास्तुकला नहीं, बल्कि मेरी आत्मा का एक हिस्सा हैं। हर पत्थर में मेरी स्मृतियाँ बसी हैं, हर कोने में मेरे जीवन के संघर्ष और सफलताएँ छिपी हैं।
जब मैं अपने कमजोर पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रहा था, तब ये पत्थर मेरे पहले गुरु बने। हर गिरने और उठने में, इन्होंने मुझे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाया - कभी हार नहीं मानना। मेरी हर लड़खड़ाहट, हर गिरना, और फिर से उठना - यह सब इन्हीं पत्थरों पर सीखा।
भावनाओं का संसार
इन पत्थरों ने मुझे सिर्फ चलना नहीं, बल्कि जीवन जीना सिखाया। हर दरार में, हर कोने में मेरी पीढ़ियों की कहानियाँ छिपी हैं। ये पत्थर मौन साक्षी हैं मेरे परिवार के संघर्षों, खुशियों, और आंसुओं के।
मेरा परिवर्तन: एक कृतज्ञ व्यक्ति
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि यह आंगन ने मुझे एक पूर्ण व्यक्ति बनाया। इसने मुझे सिखाया:
धैर्य का महत्व
संघर्ष में दृढ़ रहना
परिवार और परंपरा का सम्मान
प्रकृति के साथ तालमेल
जीवन की सादगी में छिपी गहराई
क्षमताओं का विकास
ओखली ने मुझे परिश्रम सिखाया, मुंडेर ने संतुलन, और पत्थरों ने जीवन जीने की कला। मेरी हर उपलब्धि, मेरा हर सपना - ये सब इन्हीं पत्थरों पर पनपे।
भावनाओं की अभिव्यक्ति
मेरा आंगन सिर्फ एक भौतिक स्थान नहीं, बल्कि एक जीवंत संस्मरण है। हर पत्थर मेरे लिए एक पत्र है, जो मुझे याद दिलाता है कि मैं कहाँ से आया हूँ और किन मूल्यों ने मुझे आकार दिया।
कृतज्ञता का संदेश
आज मैं इन पत्थरों के प्रति गहरी कृतज्ञता महसूस करता हूँ। ये मेरे जीवन के वास्तविक शिक्षक रहे हैं। उन्होंने मुझे सिर्फ जीना नहीं, बल्कि जीवन को पूरी तरह जीना सिखाया।
मेरा आंगन, मेरी मुंडेर, मेरी ओखली - ये सब मेरी जीवन यात्रा के साक्षी रहे हैं। आज मैं गर्व से कह सकता हूँ - मेरा आंगन मेरा सबसे बड़ा गुरु था, जिसने मुझे एक बेहतर इंसान बनने की कला सिखाई। इन पत्थरों ने मुझे सिखाया है कि सच्ची शिक्षा केवल किताबों में नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों में छिपी होती है।




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