भारत और पाकिस्तान का विभाजन एक ऐसा घाव है जो आज भी ताज़ा है। लाखों लोग अपने घरों से बेघर हो गए, रिश्ते टूट गए और देश में नफ़रत का ऐसा माहौल पैदा हुआ जिसका असर आज तक हमारे समाज पर दिखता है।
"उम्मीद" नाटक प्रज्ञा आर्ट्स थिएटर ग्रुप की एक कोशिश है जो इस दर्द को फिर से जीवंत करने के साथ-साथ उसमें से उम्मीद की किरण भी दिखाता है। यह नाटक डॉ. सत्यदानंद जोशी की कहानियों पर आधारित है, जो विभाजन के समय अपनी आँखों से देखे गए दर्द और पीड़ा को बयान करते हैं।
नाटक की कहानी एक ऐसे परिवार की है जो विभाजन के दंश से तबाह हो जाता है। हिन्दू, मुस्लिम और सिख जो आजादी से पहले साथ-साथ और प्यार से रहते थे, विभाजन ने उन्हें गहरी चोट दी। डॉ. भंडारी (पीतांबर सिंह चौहान द्वारा अभिनीत) , श्रीमती भंडारी (कुसुम चौहान द्वारा अभिनीत) और उनका परिवार अपने पड़ोसी शौकत (अनमोल भट्ट द्वारा अभिनीत) के साथ जीवन के हर पल का सुख ले रहे थे। एक प्रेम कहानी जो अभी जवान हो रही थी, ज़ीनत (प्रज्ञा सिंह रावत द्वारा अभिनीत) और कुलवंत (विक्रांत शर्मा द्वारा अभिनीत) के बीच, उसका भी हश्र बहुत दर्दनाक रहा।
यह नाटक विभाजन के समय महिलाओं के साथ हुए शारीरिक उत्पीड़न को भी दर्शाता है। नाटक में गौरी की कहानी एक ऐसी महिला की है, जिसे विभाजन के दौरान अमानवीय व्यवहार का शिकार होना पड़ता है। उसकी पीड़ा, उसके दर्द, और उसकी उम्मीद - ये सब नाटक में जीवंत रूप से प्रस्तुत किए गए हैं।
यह नाटक हमें विभाजन के दर्द को समझने में मदद करता है, लेकिन साथ ही, हमें इस दर्द से उबरने की उम्मीद भी दिखाता है।
नाटक में कई अन्य कलाकारों का भी अद्भुत प्रदर्शन देखने को मिला। अवतार (अवतार जगमोहन सिंह बुगाना द्वारा अभिनीत) अपनी भूमिका में एक कठोर और निष्ठावान व्यक्ति का किरदार निभाते हैं, जो अपने परिवार के लिए जीवन से लड़ने को तैयार है। बाबली (बाबली अधिकारी द्वारा अभिनीत), शौकत (अनमोल भट्ट द्वारा अभिनीत), फ़राह (मीनाक्षी पोखरियाल द्वारा अभिनीत), कुलवंत (विक्रांत शर्मा द्वारा अभिनीत), ज़ीनत ( प्रज्ञा सिंह रावत द्वारा अभिनीत), सलीम (नवीन कुमार द्वारा अभिनीत), अनीश ( दिशा नेगी द्वारा अभिनीत), अनिल (अनिल गौरी पोखरियाल द्वारा अभिनीत), खालिद (खालिद भारत बिष्ट द्वारा अभिनीत), राफ़ीक ( सुमित सिंह बिष्ट द्वारा अभिनीत), बांटो चाची (रीना रतुदी द्वारा अभिनीत), और फ़कीर (फ़कीर महेंद्र सिंह लटवाल द्वारा अभिनीत) सभी कलाकारों ने अपनी भूमिका को बहुत ही सुंदर और प्रभावशाली ढंग से निभाते हैं।
"उम्मीद" नाटक सिर्फ़ एक कहानी नहीं है, यह एक अनुभव है। यह नाटक हमें विभाजन के दौरान होने वाले दर्द और पीड़ा को समझने में मदद करता है, लेकिन साथ ही हमें उस दर्द से उबरने की उम्मीद भी दिखाता है। यह नाटक हमें याद दिलाता है कि जीवन में कठिन समय भी आते हैं, लेकिन हमें उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।
निर्देशक के रूप में लक्ष्मी रावत की छाप पूरे मंच में दिखती है। उनके अनुभव ने नाटक को बिल्कुल जीवंत सा कर दिया था और ऐसा लग रहा था कि जैसे यह सब आपके आस-पास ही घटित हो रहा है। प्रज्ञा आर्ट्स का यह सफर दिन प्रतिदिन एक थिएटर ग्रुप के रूप में गहरा होता जा रहा है और इस नाटक को विभाजन पर बने उन कुछ नाटकों में लाकर खड़ा कर दिया है जिनहे बार-बार देखकर दर्शक विभाजन की त्रासदी को दुबारा दुहराना नहीं चाहते।
"उम्मीद" एक नाटक है जो दर्द को उजागर करता है, लेकिन साथ ही हमें उम्मीद भी देता है। यह एक ऐसा नाटक है जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगा।
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