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भगवान् यहाँ मिलते है !!


लेख चारु तिवारी जी

बहुत पहले जब मैं अपने कार्यालय जाता तो रास्ते में एक दुकान पर नजर पडती। लिखा था- 'यहां भगवान के नाक, मुंह, सिर और बाल भी मिलते हैं।' बहुत दिनों तक सोचता रहा, इसका क्या मतलब होगा! एक दिन जिज्ञासावश दुकानदार से पूछ ही लिया तो उसने बताया कि उसका मतलब मुखौटों से है। वह लोगों की जरूरत के मुताबिक भगवानों की आकृति बनाता है। आज वह बोर्ड याद आया तो आज की परिस्थितियों पर कुछ पंक्तियां उतर आई-

दुकान में बोर्ड लगा था-
यहां भगवान के कपड़े मिलते हैं
धोती, कुर्ता, साड़ी और पटका
लिखा था-
यहां भगवान के
नाक, कान, मुंह
और बाल भी मिलते हैं
बताया गया-
भगवान को सजाने के लिये
माला, कुंडल, कड़े और शीशफुल हैं
दुकानदार का दावा है-
यहां भगवान गढ़े जाते हैं
किस्म-किस्म के
बनाये जाते हैं अपनी तरह के
अपनी फितरत के
अपनी जरूरत के

यह गढ़ा जाना नया नहीं है
बहुत पुराना है-
सदियों का, कई कालखंडों का
अब नई दुकान है, बोर्ड भी नया
नई जरूरत के मुताबिक
नये नारों के साथ
फिर गढ़े जा रहे हैं भगवान
फिर लौट रहा है, गढ़ने का युग
सबकुछ दांव पर लगाकर
सबकुछ जानते-समझते
उन्हें चाहिये एक भगवान-
उसे वे दुकान से खरीद सकते हैं
पहना सकते हैं कपड़े, तरह-तरह के
उसका नाक, कान, मुंह, बाल
सब खरीद सकते हैं
उसे सजा सकते हैं-
उसके मुताबिक गहनों से

गढ़ने के लिये इतना ही तो चाहिए-
एक दुकान और कुछ सामान।
अब फिर गढ़ा जा रहा है एक भगवान
उसी दुकान से खरीदी चीजों से
जो दावा करता है, भगवान गढ़ने का
अब उसे राष्ट्र के रैपर पर लपेटकर
सजाया गया है, धर्म की दुकान पर
उतारा गया है राजनीति के मैदान में
असहाय-निरीह जनता से
गढ़े भगवान बजवाने लगे हैं-
ताली और थाली
अंधेरा करवाकर फिर जलवा रहे हैं दीप
उनके कष्टों को बदल रहे हैं अपनी खुशी में
सवाल नहीं पूछना है-
कि आखिर हमारे उजाले छीने किसने?
गढ़े भगवानों से सवाल नहीं करते
क्योंकि उनके पास जवाब नहीं होते।

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