गैरसैण का महत्व सबके लिए अलग - अलग है , इसका महत्त्व समय - समय पर बदलता भी रहता है ! राज्य बन ने से पहले , राज्य बन ने के बाद, सरकार बन ने से पहले , सरकार बन ने के बाद, चुनाव जीनते से पहले और चुनाव जीतने के बाद ! जैसे समय के साथआदमी के हाथ मैं रेखाए बदलती है ,वैसे ही गैरसैण की तकदीर बदलती है ! मुद्दे को कब उठाना है , कब बिठाना है यह हमारे नेताओ से अच्छा कौन जान सकता है !किसी नेता को आज गैरसैण अच्छा लगता है , क्योकि उसे अचानक लोगो की भावनाओ का ख्याल आ गया है , क्योंकि चुनाव नजदीक आ रहे है ,और किसी को यह मुद्दा भावनात्मक लगता है क्योंकि वह अब पांच साल के लिए गद्दी मैं बैठकर देव तुल्य हो गया है , इसलिए उसे अब जनता के मुद्दों से क्या लेना ! गैरसैण के बारे मैं जब भी कोई बयान आता है , वो अपने आप ऐतिहासिक हो जाता है , वैसे भी नेता गैरसैण की कोई बात सिर्फ पांच साल मैं एक दो बार करते है ! गैरसैंण मुद्दा जरुर बन सकता है , परन्तु राजधानी कभी नहीं बन सकती , अब क्यों ? चलो आपको बता ही देता हु , की गैरसैण राजधानी क्यों नहीं बन सकती ?
मेरी दिव्य दृष्टि ने जो मुझे बताया वो सुने , उसने कहा भाई देख , देहरादून आधुनिक शहर है जिसे विरासत मैं सुन्दरता मिली है और फिर इसे पूंजीपति लोगो ने संवारा है , सदियों से शिक्षा का सबसे बड़ा हब है ,और लेटेस्ट फेशन यहाँ सीधा बॉलीवुड से उड़ कर आता है , सब सुख सुविधाओ से लबरेज है , विद्यार्थी सीधा पढ़ कर विदेशो मैं नौकरी पाते है ,या बॉलीवुड मैं हीरोइन , हीरो बनकर नाम कमाते है . सौन्दर्य है , चमक - धमक है , लोगो के ठाट- बाट है , अपने आप मैं एक hep शहर है , इसमें मुझे वो सब दीखता है जो एक आधुनिक नारी मैं है , fashion है स्टाइल है , एक अनूठा अंदाज है ,सबकी पसंद है , इलीट पोलिटिकल क्लास , बिल्डर्स इन सबने इसकी सुन्दरता को चार चाँद लगाए है , अब इससे नजर हटकर कही जाती ही नहीं है , और
वही गैरसैण , खाली सूखे पहाड़ , नीरस खड़े पहाड़ जिनमे न कोई सुन्दरता है न ही किसी प्रकार का रस ,मस्त करने की कोई अदा नहीं , खेत तो है पर अनाज नहीं , न कोई बाजार है न कोई चमक धमक है , जर्जर सड़क है , पर यहाँ आना कौन चाहता है , वैसे भी पहाड़ मैं सिर्फ सड़क वन वे होती है ,जो सिर्फ पहाड़ी को ले जाती है , वापस तभी लाती है जबी देवता बुलाता है , कुछ तो पहाड़ी भाई तो देवता का भी टिकट कटवा कर भी ले गए है , न कोई रेल मार्ग न कोई हवाई अड्डा , पर गड्ढे जरुर है , संकरी सड़क , न कोई तड़क न कोई भड़क , सिर्फ बन्दर और सूवर , फिर इसे नजर देखे तो क्यों देखे !
अब कुछ देर के लिए सोचो , गबरू जवान लड़का जो लखनऊ मैं पला बड़ा , अब उसे इन दोनों मैं से चुनाव करना था , एक शहर की छोरी और दूसरी गाँव की गोरी , एक सर्व गुण संपन्न दूसरी मैं दूर दूर तक कोई गुण नहीं , लड़का समझदार था दूरदृष्टि वाला था , उसने दिल्ली वाले पापा को मना लिया और उनसे कहा कहा जब तक गाँव की छोरी को आप मेरे लायक नहीं बनाते तब तक मैं शहर की छोरी के साथ रहता हु , और तब से वो दिन है और आज का , इस गबरू ने उस शहर की छोरी का साथ नहीं छोड़ा है , पर यह जरुर है दो चार साल मैं जरुर गाँव की गोरी के दौरे चक्कर लगा लेता है , उसके पास जाकर वाह वाही लुटा लेता है पर उसे शादी हरगिज नहीं करता , वो बेचारी कंवारी तब से इसकी बाट देख रही है , पर ये है की देहरादून मैं मस्त है ,अब जब भाई को लिव इन रिलेशनशिप मैं शादी के मजे मिल रहे है तो फिर शादी की क्या जरुरत !
पर हम ग्याडू, तब से हाथ ठुड्डी पर लगाकर बैठे है की अब आएगा , अब आएगा पर कहा , उसने तो वह परमानेंट घर बनाने की तयारी भी शुरू कर दी है , भई ठीक ही तो कर रहा है इतनी मुश्किल से तो जिंदगी बनी है कम से कम अब भविष्य भी तो सही रहे !
अब ये मुन्ना तो चला है अपना भविष्य बनाने , पहाड़ की भविष्य की चिंता तू कर ग्याडू , चल निकल यहाँ से आया गैरसैण राजधानी बनाने , ये तो बन गया देहरादून वाला , देखता हु कैसे गैरसैण लाता है तू इसको !!
यह भी एक सच है , बना बनाया शहर , सब सहूलियतो से भरपूर , अब इसे छोड़ कर कौन जायेगा , नेता तो बिलकुल नहीं , अब नेता और व्यवस्था सब यही है तो पहाड़ किसलिए , जो शहीद हुए वो तो नादान थे असली समझदार तो देहरादून वाले है , आखिर भावनाओ से कब शहर बनते है , इसलिए मित्रो गैरसैण भूल जाओ ,
नहीं तो ,अगर दम है तो आगे आओ , फिर आन्दोलन बनाओ , और गैरसैण को उसका असली हक़ दिलवाओ , एक बार जोर से अपना भरपूर दम दिखाओ और गैरसैंण को राजधानी बनाओ , बाकी तब तक मिलते है काला दिवस को जन्तर मंतर पर , फिर नारे लगते है !!
यह मेरे अपने विचार है ..कृपया इस लेख को अन्यथा न ले ...मैं भी एक उत्तराखंडी हु जो सब के सम्मान मैं विश्वास करता हु...राजनीती से परे होकर इसका आनंद ले...!
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