अपराधी कौन ?
अभी दो दिन पहले दिल्ली के एक बड़े अस्पताल के ट्रामा सेण्टर मैं घर के एक बीमार सदस्य के साथ जाना हुआ , रविवार की शाम थी परन्तु यहाँ की मरीजो के भीड़ देखकर कही यह नहीं लग रहा था की आज रविवार है , मरीजो का ताँता लगा हुआ था , हर दो दो मिनट का बाद एम्बुलेंस , पुलिस की गाडी घटना मैं घायल मरीजो को लेकर आ रही थी . अस्पताल मैं बहुत भीड़ थी , डॉक्टर , नर्स , सहायक कार्यकर्त्ता सब अपने काम मैं व्यस्त थे , पर एक चीज जो बार बार सबका ध्यान खीच रही थी , वह कभी भी जोर से चीखने की , झगड़ने की , वो धक्का मुक्की की , यह अक्सर हर दस पंद्रह मिनट के अन्तराल पर आ रही थी , ध्यान से देखने पर मालूम हुआ की यह आवाज ट्रामा सेण्टर के गेट से आ रही थी , जब भी कोइ नया मरीज यहाँ आता तो , उसके साथ उसके घर वाले या जान पहचान के लोग उसके साथ ट्रामा सेण्टर के अन्दर घुसना चाहते थे , जबकि वास्तव मैं कानून यह है की एक मरीज के साथ सिर्फ एक सहायक ट्रामा सेण्टर मैं प्रवेश कर सकता है , और अधिक लोगो को अन्दर न जाने और उनको गेट पर रोकने के दौरान अक्सर ये झगडे भड़क जाते थे , फिर सुरक्षा कर्मी उनको समझाते और डांटते तब वह समझ पाते , और इस प्रक्रिया मैं मरीज भी काफी वक़्त तक वही गेट पर रुके रहता है !
यह अक्सर सभी अस्पतालों की इमरजेंसी मैं देखा गया है , भारतीय लोग है ,एक आदमी को रेल या हवाई जहाज पर छोड़ने पूरा कुनबा चल निकलता है और यहाँ तो दुर्घटना का सवाल है ! अगर एक मरीज के साथ इतने सहायक घुस जायेंगे तो अस्पताल का क्या हाल होगा !
इसका अब एक दूसरा कारन जो मुझे नजर आता है वह यह है की , हमारे दिल मैं इन सुरक्षा कर्मियों के लिए कोई इज्जत नहीं रहती जिसके कारन लोग इनकी बातो पर बिलकुल ध्यान नहीं देते , और अपनी मनमानी , झगड़े और हाथापाई पर उतर आते है , और हमें यही लगता है अंत मैं की हिंसा ही सबका समाधान है और हिंसा से हम इन्हें डरा देंगे और अन्दर घुस जायेंगे ! इस प्रकार की बहुत घटनाये हमें अक्सर सुनने को मिलती है , और देश के नेता वर्ग के लोग भी अक्सर इसमें लिप्त प्पये जाते है !सब देख लेंगे , इस प्रकार की सोच मन मैं लिए हम इस व्यवस्था से निपटते है और कानून , व्यवस्था और दूसरो की सहूलियत का बिलकुल भी ध्यान नहीं रखते !
इसी ट्रामा सेण्टर मैं मुझे दो स्तर की सुरक्षा दिखाई दी , पहले सुरक्षा कर्मी और अगर उनसे कोई मामला नहीं संभालता है तो उनके ऊपर बाउंसर रखे हुए है , और फिर वह झगडे को निपटाते है ! बाउंसर को रखने का एक दूसरा भी कारन था , मरीज के रिश्तेदारों ने डॉक्टर्स पर भी हमला कर दिया था , इसलिए अब हर अस्पताल मैं बाउंसर भी सुरक्षा घेरे का अंग है ! यह सुरक्षा कर्मी इसलिए लगाये गए है जिस से की लोग मरीज के इलाज मैं बाधा न डाल सके ! परन्तु यहाँ सुनने वाला कौन है , ये लोग तो अपनी आँखों के सामने डॉक्टर से ऑपरेशन, घाव सिलने और पट्टी होता हुआ देखना चाहते है तभी वह संतुष्ट होंगे , पर क्या यह संभव है ? इस ओर कभी कोई ध्यान नही देता !
अब आपका ध्यान दूसरी ओर ले जाना चाहता हु , अभी दो दिन पहले सोनीपत के नजदीक एक रेलवे के फाटक पर रात लगभग बारह से एक बजे के बीच एक बड़ी दर्दनाक घटना हुई , इसमें रेलवे के गार्ड ने फाटक बंद कर रखा था . क्योंकि कुछ देर मैं एक ट्रेन वहा से गुजरने वाली थी , तभी तीन बायक सवार गार्ड रूम पहुचे और गार्ड से फाटक खोलने के लिए कहने लगे, गार्ड ने उन्हें साफ़ मन कर दिया , परन्तु वो लोग नहीं माने और उन्होंने गुस्से मैं रेलवे गार्ड के धार दार हतियार से हाथ काट दिए , वो तो अच्छा हुआ एक राहगीर वह से गुजर रहा था उसने गार्ड को कराहते देख लिया और गार्ड को अस्पताल पंहुचा दिया , अन्यथा एक जीवन और पृथ्वी से उठ जाता , उस गार्ड ने उन्ही की सुरक्षा के लिए वह फाटक नहीं खोला , अगर फाटक खुला होता तो शायद वह और अन्य लोग दुर्घटना का शिकार हो सकते थे , परन्तु इन नासमझ लोगो ने उसी पर हमला कर घायल कर दिया जो वास्तव मैं उनकी सुरक्षा के लिए खड़ा था ! इस प्रकार के घटना और सड़क पर होने वाले झगडे मैं कोई ज्यादा अंतर नहीं है , गुस्से मैं हम लोग आप खो देते है और फिर जीवन भर पछताने के लिए मजबूर हो जाते है !
तीसरी घटना आजकल सोशल मीडिया मैं काफी वायरल हो रही है , इसमें एक नौजवान एक लड़की को बुरी तरीके से मार रहा है , उसने लड़की के बाल पकड़ कर थप्पड़ मारा और फिर जोर से एक लात उसके पेट मैं मारकर गिरा दिया वह लड़की दर्द से कराह रही है , पर जो लड़का है वह रुकने का नाम नहीं ले रहा है ! इस विडियो के वायरल होने के बाद अब इस लड़के के विरुद्ध कार्यवाही हो रही है , इस केस मैं यह पता चला है की इस घटना को दिखाकर वह अपनी गर्ल फ्रेंड को शादी के लिए मनाना चाहता था , और यह लड़के के पिताजी दिल्ली पुलिस मैं कार्यरत है , शायद उसको विश्वास था की उसको बचा लिया जाएगा इसलिए वह बे खौफ इस प्रकार की हरकत कर रहा था !
यह सभी घटनाये नाकाम व्यवस्था के कारन तो होती ही है परन्तु समाज का इनके प्रति उदासीन रवैया , इनको और बढ़ने मैं सहायता करता है , समय है इन सब पर गंभीरता से सोचने का , अन्यथा हम इसी प्रकार समाज मैं हिंसा को बढ़ावा देते रहेंगे ! समाज और व्यवस्था के ताल मेल से ही इन सब पर पार पाया जा सकता है !
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