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बदलता समाज !!



यूँ ही बहुत समय बाद इस ब्लॉग पर आया हु , इन कागजो पर भी काफी समय से मिटटी लग रही थी , सोच रहा था क्या लिखू , राजनीती और रोटी के चक्कर मैं पढ़ कर कलम कागज़ से आप अपने आप दूर चले जाते हो और ऐसा ही कुछ मेरा साथ पिछले कुछ समय से हुआ , परन्तु आज सोचा कुछ समय है क्यों न कुछ लिखा जाय , मन मैं विचार "समाज " विषय का आया क्यों न इस विषय पर कुछ लिखा जाय , और हम जिसे समाज  समझते है क्या समाज इसी प्रकार व्यवहार करता है ?या फिर हमें इस शब्द और इस प्रक्रिया और और ढंग से समझना चाहिए.
आज का विषय यही है और काफी समय से चल रहे इस दिमागी द्वंध को कुछ शब्दों के द्वारा मैं और समझना चाहता हु, मैं भी अपने आप को समाज का आदमी कहता हु , इसे कहलाने मैं फक्र महसूस करता हु, पर क्या मैं सचमुच निस्वार्थ ढंग से समाज के साथ चल रहा  हु ? बिना लालच , इनाम व बिना  किसी पारितोषक के !

समाज से जुड़े लगभग चार वर्ष हो चले है , अपने समाज से बचपन से अब तक मैं दूरी बनाये हुए था , कभी मन मैं नहीं आया की समाज  भी कोई शब्द होता है , परन्तु जब दिल्ली मैं निर्भया काण्ड हुआ , उस घटना ने इतना झकजोर कर दिया की , घर से बाहर पूरी दिल्ली निकल चुकी थी ,इतने वीभत्स काण्ड के बाद यह जरुर लगा की अगर अब आवाज नहीं उठायी तो , फिर कभी इस देश मैं महिलाये और बच्चिया सुरक्षित नहीं रह पाएंगी , और यही कारण था सब लोग इस बलात्कार और हत्या के विरुद्ध सडको पर निकले ! हम भी इन साथ हो लिए , कुछ समय आन्दोलन करने के बाद , हत्यारों को पकड़ लिया गया और केस फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट मैं चला गया , आन्दोलन को अपनी मंजिल मिल गयी और सब फिर से शांत हो गया ! इसी दौरान बल्कि इससे पहले इसी प्रकार का जघन्य अपराध व उसके बाद हत्या , उत्तराखंड की बेटी की हुई थी , परन्तु उस केस मैं क्योकी जनता और मीडिया का ध्यान न था इसलिए वह केस कछुए की चाल से चल रहा था , लगभग एक वर्ष हो चला था परन्तु किसी भी प्रकार का निर्णय उस केस मैं नहीं आया था , इसी दौरान जंतर मंतर पर इस केस पर अपनी आवाज उठा रहे लोगो से मुलाकात हुई जिनमे उस लड़की के पिता भी थे , वह दिन भर वह लोग खड़े रहते थे और आते जाते लोगो को वो इस केस के बारे मैं बताते थे , कुछ समय लगा और हम जैसे उत्तराखंड समाज के लोग एकत्रित हुए और फिर हर तारीख पर द्वारका कोर्ट मैं गुनाहगारो को फांसी दिलवाने के लिए प्रदर्शन होते थे , यह कुछ समय चला और फिर समाज की जीत हुई और निचली अदालत ने अपराधियों को फांसी की सजा दी !
इस घटना के बाद मुझे दिल्ली के  अपने समाज के लोगो से मिलने का मौका मिला , इसमें सभी प्रकार के लोग थे , कुछ लोग उत्तराखंड आन्दोलन कारी थे , जिन्होंने उत्तराखंड राज्य आन्दोलन मैं अग्रणी भूमिका निभायी , कुछ सामाजिक संस्थाओ से जुड़े लोग थे , और कुछ मुझ जैसे लोग जो पहली बार समाज के लिए घर से बाहर निकले थे , अपने लोग , अपनी बोली , भाषा और अपनी संस्कृति के सहभागियों से मिलकर एक अलग प्रकार का आनंद मिला , पहाड़ सदा से दिल मैं था , क्योंकि बचपन गुजरा तो , पहाड़ के लिए दिल मैं इज्जत और प्यार सदा रहा , जो सामाजिक मित्र मिले उनका और हमारा मकसद एक ही था , पहाड़ को समृद्ध करना और दिल्ली मैं अपने समाज को मजबूत करना , इसी लक्ष्य को लेकर अब मैं सामाजिक जीवन मैं आगे बढ़ने लगा !
वर्ष २०१४ मैं चुनाव के दौरान " उत्तराखंड एकता मंच " का गठन हुआ , जिसमे उत्तराखंड के लोगो को राजनीतिक हिस्सेदारी दिलवाने के लिए एक मंच का गठन किया गया , जिसका उद्देश्य सिर्फ सामाजिक स्तर पर अपने लोगो को जागरूक करना था और उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी पक्की करनी थी , यह आयोजन भी सफल हुआ और समाज के लोग जागरूक होने लगे और सांस्कृतिक कार्यक्रम तक सीमित न रहकर अब लोग उत्तराखंड और दिल्ली दोनों जगह समृद्ध समाज की बात करने लगे.
कुछ समय शांत रहने के बाद रामलीला मैदान मैं उत्तराखंड एकता मंच का एक भव्य आयोजन रामलीला मैदान मैं हुआ , जिसमे बहुत लोगो ने भाग लिया और पहली बार ऐसा लगा की अब वास्तव मैं हमारा समाज परिपक्व बन रहा है और अपनी हर प्रकार की भागेदारी मागने के लिए तैयार है !
इसके बाद नगर निगम के चुनाव मैं बीजेपी और आम आदमी पार्टी ने उत्तराखंड मूल के लोगो को टिकट दिया और हमारे समाज के सात पार्षद भी बने ! यह एक सुनहरा अध्याय था हमारे समाज के लिए , अब राजनीतिक स्तर पर हम लोग सक्रिय हो रहे है !
पर इसका एक पक्ष यह भी है , आपसी खीचातानी , अविश्वास व अहम् , अभी भी साफ़ तरीके से इन सामाजिक आयोजनो मैं नजर आता है ,लोग  बटे हुए नजर आते है , बहुत आयोजन तो अब ऐसे होने लगे है जो सिर्फ द्वेष और दुसरे को नीचा दिखाने के लिए किये जाते है , इन सबके बारे मैं सोच कर जरूर बुरा लगता है , और समाज मैं बहुत से ऐसे लोग भी है जो अक्सर अपने आपको अच्छा दिखाने मैं व्यस्त रहते है , बस कर्म करने से दूर रहते है , क्या यह हमारे समाज का पतन का समय नजदीक है , या फिर कुछ उम्मीद बची है ?

इस विषय पर काफी सोच विचार किया , और उसके बाद इस निष्कर्ष पर पंहुचा हु की , हर समाज की यही हालत है और , हर समाज मैं इस प्रकार की गुटबाजी , अहम् की लडाई चलती रहती है परन्तु जब बड़ी समस्या और बड़ी दुर्घटना से निपटना होता है तो समाज एक साथ आ जाता है बड़े दुश्मन से लोहा लेता है और विजयी होता है , जो हमने अतीत मैं देखा है , इसलिए यह चिंता का विषय बिलकुल भी नहीं है , पिछले वर्ष और इस वर्ष ऐसे बहुत से आयोजन हुए है जो समाज के लिए प्रेरणा श्रोत बन गए है , और उम्मीद है आगे भी ऐसा होता रहेगा , बहुत संस्थाए ऐसा कार्य कर रही है जो काबिले तारीफ है और भविष्य मैं और ऐसा होगा , रोज नयी संस्थाए बन रही है पुरानी टूट रही है , और इस प्रतिस्पर्धा मैं बहुत कुछ अच्छा भी देखने को मिल रहा है , इन सबको मैं सकारात्मक भाव से देखता हू और इसे परिवर्तन का एक नियम है समझ कर छोड़ देता हु !

बस यह जरुर अंत मैं कहना चाहूँगा , कि कर्म करने पर लगे रहे , अच्छा , बुरा एक ही सिक्के के दो पहलु है , कभी अच्छा होगा , कभी बुरा होगा , परन्तु कर्म करने की नीयत साफ़ होनी चाहिए , हम अंत मैं जरुर सफल होंगे , और इसी प्रकार का सामाजिक चिंतन चलता रहेगा !
जय उत्तराखंड !!!

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