गाँव फिर से अब रोज रोज सपने मैं आने लगा है , दिल्ली फिर गर्म होने लगी है ,गर्मी का यह पसीना रह रह कर रामगंगा के पानी की शीतलता की याद दिलाने लगा है , और फिर अष्टमी कौतिक की हो रही तैयारी की वीडियो भी कभी कभी व्हाट्स एप्प पर लोग डाल रहे है , रामगंगा के किनारे का अग्नेरी मंदिर , सदियों पुराना वो बड़ का पेड़ अभी भी उतना जवान लगता है जितना लगभग चालीस वर्ष पहले था, इसकी जटा दार टहनियों पर बहुत झूले झूले है और इसके तने पर आइस पाइस और धप्पा खेले है।
अष्टमी कौतिक अब और लगभग 40 वर्ष पहले मैं जरूर बहुत अंतर आया है, यह मेला अब एक हफ्ते का हो गया है , पहले यह सिर्फ एक दिन का होता था, दूसरा सबसे महत्वपूर्ण बदलाव अब इसमें जतिये की बलि प्रथा नहीं होती, उस ज़माने में बचपन के समय का कौतिक हम बच्चों के लिए सबसे बड़ी खुशी का त्यौहार होता था । गेवाड़ घाटी का यह सबसे बड़ा कौतिक था और जातिया लाने का कार्य ग्रामसभा के हिसाब से होता था , कभी धौन से कभी भटकोट से , कभी सोनगांव से कभी उड़ली खान से , झला से और इनके अलावा भी कई ग्राम सभाओं से जतीया लाया जाता था ।
मुझे याद है एक बार पार के उडली खान से जतिया आया था , उसको चारो तरफ से रस्सी से बस मैं कर रखा था , गाँव के जवान उसे रस्सी पकड़ कर उसे मंदिर की और ले जा रहे थे , अचानक वह उन सब को खींच कर तेजी से भागा और गाँव की और भागने लगा , सब गाँव वाले उसके चारों तरफ भागने लगे , कुछ उसे पकड़ने और कुछ उसके डर से इधर उधर दौड़ने लगे , तभी पार उडली खान के जमन सिंह मनराल "जमनी दा" ने उसे सुपरमैन की तरह रस्सी से अपने बस मैं किया और अकेले खींच कर अग्नेरी तक ले गए , जमन दा का मैं तबसे फैन बन गया था । ऐसा था कौतिक , जलेबी , मिठाई , रायता , चना गुड़ , टॉफ़ी गुब्बारे, और पी पी वगेरा बगैरा के साथ , और साथ मैं होते थे जसी, परी, रेनू, गोपिया चाचा, दिनेश आनंद, बिरेन्दु मेहन्देर ...
बस अष्टमी फिर बुला रही है इस बार , पता नहीं जाना होता ...पर अग्नेरी माता आप जरूर कृपा बनाये रखे ।
उत्तराखंड में पंचायत चुनाव: गांव के विकास की धड़कन पंचायत चुनाव, या पंचायत चुनाव , भारत में ग्रामीण लोकतंत्र की नींव हैं, जो गांवों को उनके भविष्य को संवारने का अधिकार देते हैं। उत्तराखंड में, हिमालय की गोद में बसे गांवों के लिए ये चुनाव विशेष महत्व रखते हैं। जुलाई 2025 में होने वाले उत्तराखंड पंचायत चुनाव की सरगर्मी शुरू हो चुकी है। प्रधानों (ग्राम प्रमुख) से लेकर समग्र विकास तक, ये चुनाव ग्रामीण उत्तराखंड के लिए गेम-चेंजर हैं। आइए जानें कि पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं, ये गांवों के विकास को कैसे बढ़ावा देते हैं, और 2025 के चुनावों से जुड़े कुछ रोचक किस्से जो उत्तराखंड के गांवों की भावना को दर्शाते हैं। पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं पंचायत चुनाव भारत की विकेंद्रित शासन व्यवस्था की रीढ़ हैं, जो 1993 के 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) को संवैधानिक दर्जा देता है। उत्तराखंड, जहां 7,485 ग्राम पंचायतें, 95 ब्लॉक, और 13 जिला पंचायतें हैं, में ये चुनाव ग्रामीण समुदायों के लिए जीवन रेखा हैं। ये गांव वालों को प्रधान , उप-प्रधान और सदस्यों जैसे नेताओं ...
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें