लेख : चारु तिवारी
हमारे मित्र और बड़े भाई मुकेश बहुगुणा ‘निठल्ला चिंतन’ करते रहते हैं। उनके इस चिंतन से हमें बहुत सारी चीजें मिल जाती हैं। इस बार के प्रातः स्नान से जो ‘ब्राह्मण मंत्र’ निकला वह नारा बन गया। यह मंत्र है- ‘हर-हर दारू, घर-घर दारू।’ सबसे पहले बहुगुणा जी को बधाई कि उन्होंने ऐसे समय में यह नारा दिया जब पहाड़ की महिलायें शराब के खिलाफ सड़कों पर हैं और संस्कृति के ठेकेदार, धर्म के पहरेदार, गंगा के खेवनहार, राष्ट्रभक्ति के सबसे बड़े प्रवक्ता, गौ माता के भक्त पहाड़ में किसी भी कीमत पर शराब बेचने के पक्ष में खड़े हैं। यहां तक कि शराब बेचने के लिये उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्गो का नाम जिला मार्ग तक रखने के कुचक्र रच दिये हैं। ऐसे में ठीक ही है- ‘हर-हर दारू, घर-घर दारू।’ जनादेश की धौंस से अब भाजपा सरकार जो उनके ‘सचरित्र’ संघ के इशारे पर चल रही है ने शराब को पहाड़ की अर्थव्यवस्था के लिये महत्वपूर्ण मान लिया है। उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद जब हाई-वे से शराब की दुकानें हटनी लगी तो सरकार ने उसे बस्तियों में खोलना शुरू कर दिया। यहीं से जनांदोलन की शुरुआत भी हो गई। अब एक बार फिर उत्तराखंड की सर्द हवाओं को शराबबंदी आंदोलन ने गर्म कर दिया है। अस्सी के दशक के नारे फिर गूंजने लगे हैं- ‘नशे का प्रतिकार न होगा, पर्वत का उद्धार न होगा’।
उत्तराखंड में शराब के खिलाफ चलाई जा रही यह मुहिम नई नहीं है। यह समय-समय पर चलती रहती है। राजनीतिज्ञ और माफिया गठजोड़ शराबबंदी के अभियान को हमेशा दादागिरी के बल पर दबाने की कोशिश करता रहा है। इस बार भी यही हुआ। बहुप्रचारित ‘संघी’ मुख्यमंत्री ने अपने पूर्ववर्तीं ‘जमीन से जुड़े’ हरीश रावत से चार कदम आगे बढ़कर शराब को बढ़ाने की ओर कदम बढ़ा दिये हैं। हरीश रावत ने तो सिर्फ इतना ही किया था कि कुमाऊं विश्वविद्यालय के अल्मोड़ा स्थित होटल मैनेजमेंट संस्थान को अस्सी के दशक के सुरा के व्यवसायी के नाम किया। अब नये मुख्यमंत्री ने और आगे चलकर सड़कों का नाम बदलकर शराब को खुला करने की ‘राष्ट्रभक्ति’ दिखा दी है।
शराब के पक्ष में राजनीतिक दलों और सरकारों का यह उपक्रम नया नहीं है। अस्सी के दशक में जब नशे के प्रतिकार के लिये जनता उठी तो उस समय भी सत्ताधारी दल ने अपने गुंड़ों के माध्यम से जनता को डराने-धमकाने का काम किया था। उस समय एक नारा दिया गया- ‘दो बोतल देती सरकार, गुंडे पाले कई हजार।’ आज भी यही स्थिति है। इस सरकार के पास तो धमकाने के लिये कांग्रेस से भी बड़ा तंत्र है। संघी मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत जहां एक ओर ‘बंदेमातरम’ और राष्ट्रगान’ को जरूरी करने का नारा दे रहे हैं, वहीं वे यह इंतजाम भी कर रहे हैं कि बिना शराब के राष्ट्रभक्ति कहीं बेकार न चली जाये। आखिर भाजपा को सत्ता में इन्हीं लोगों न पहुंचाया है। इतिहास गवाह है कि है कि व्यवस्था में शामिल लोगों ने साजिशन शराब को पहाड़ में अपने स्वार्थों के लिये फैलाया। ब्रिटिशकाल तक यहां शराब का प्रचलन नहीं था। 1815 तक इस क्षेत्र में शराब आम जनता के प्रचलन में नहीं थी। अंग्रेजों ने 1880 में यहां शराब की दुकानें खोलनी शुरू की।
उत्तराखंड में क्रमिक रूप से शराब को सुनियोजित ढंग से आगे बढ़ाया गया। यहां स्थित सैनिक छावनियां, हिल स्टेशनों की स्थापना कर जहर के व्यापार की शुरुआत करने के प्रमुख कारण रहे। बावजूद इसके यहां गांवों में शराब नहीं पहुंची। सन् 1822-23 से 1882 के बीच यहां शराब का प्रचलन बढ़ने लगा। 1822 में शराब, अफीम और दवाओं का जो राजस्व 534 रुपया था वह 1882 आते-आते 29,013 रुपए तक पहुंच गया। इस राजस्व की अप्रत्याशित वृद्धि ने यहां नशे की आहट के प्रति लोगों को सचेत किया। 1925 तक इसका प्रचलन इतना बढ़ गया कि कुमाऊं केसरी बदरीदत्त पांडे को लिखना पड़ा कि यहां 90 प्रतिशत लोग नशे की गिरफ्त में आ गये हैं। उन्होंने इसके खिलाफ मुहिम भी चलाई। उन्होंने कहा कि राजस्व के लिये नशीले पेयों और दवाओं पर रोक लगनी चाहिये। राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में यहां शराब के खिलाफ आंदोलन चले। जगह-जगह शराब की भट्टियों को आग के हवाले किया गया।
आजादी के बाद धीरे-धीरे राजनीतिक दल पहाड़ को नशे में धकेलने लगे। सत्तर का दशक आते-आते उत्तराखंड को शराब की सबसे बड़ी मंड़ी के रूप में जाना जाने लगा। शराब के गिरफ्त में आ चुके पहाड़ में महिलाएं सबसे अधिक प्रभावित होने लगीं। पुरुषों में शराब की लत ने यहां की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया। यहां जगह-जगह टुकड़ों में इसका प्रतिकार भी शुरू होने लगा। अस्सी का दशक आते-आते इस क्षेत्र में शराब माफिया के हाथ इतने मजबूत हो गये थे कि उसने खुलेआम राजनीतिक संरक्षण में शराब बेचना शुरू कर दिया।
नशे के खिलाफ 1 फरवरी 1984 को शुरू हुआ ‘नशा नहीं, रोजगार दो’ आंदोलन भी रातो-रात खड़ा नहीं हुआ। इसके पीछे प्रदेश सरकार की आबकारी नीति और पहाड़ को नशे की गिरफ्त में डालने का कुचक्र था। 1969-70 में उत्तरकाशी, चमोली, टिहरी, पौड़ी और पिथौरागढ़ में शराबबंदी लागू की गई। 1 अप्रैल 1972 को सरकार को एक और शराबबंदी अध्यादेश निकालना पड़ा। इसका कारण था कि 1969-70 में शराबबंदी के खिलाफ शराब व्यापारी अपने पक्ष में उच्च न्यायालय से फैसला ले आये। लेकिन जनता के भारी आक्रोश के कारण यह लागू नहीं हो पाया। शराबबंदी और आबकारी नीति की खामियों के चलते यहां प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं लेकिन अन्य माध्यमों से मादक द्रव्यों का व्यापार स्थापित होने लगा। इससे सामाजिक वातावरण लगातार प्रदूषित होने लगा।
सत्तर के दशक में देश की राजनीति ने नई अंगडाई ली। 1977 में देश में पहली बार राजनीतिक विकल्प के रूप में जनता पार्टी की सरकार आई। अल्मोड़ा, नैनीताल, देहरादून सहित पांच मैदानी जिलों में शराबबंदी लागू कर दी गई। सरकार द्वारा की गई शराबबंदी का इस क्षेत्र में प्रभाव नहीं पड़ा। इसका कारण था कि यहां सुरा-लिक्विड दवाओं के रूप में पहाड़ में फैल चुकी थी। गांव-गांव, घर-घर में इसे तस्करों के माध्यम से पहुंचा दिया गया था। हालात यह हो गये कि लोग इस शराबबंदी को अभिशाप समझने लगे। व्यवस्था में शामिल लोगों के लिये ऐसा वातावरण हमेशा अच्छा होता है। 1980 में फिर कांग्रेस की सरकार आई। बिना किसी हिचकिचाहट के पहाड़ के तीन जिलों से शराबबंदी पूरी तरह हटा ली गई और दो जिलों में परमिट पर शराब बेचने की इजाजत दे दी गई। इसके साथ ही वहां शराबरूपी जहर खुलेआम बिकने लगा। झोलों में सुरा-लिक्विड बेचने वाले रातों-रात लखपति बन गये। पहाड़ में ट्रकों से शराब पहुंचने लगी। शराब के इस तंत्र से जुड़े लोगों को सांसदों-मंत्रियों का संरक्षण मिलने लगा। अल्मोड़ा जनपद के एक प्रमुख ने सांसद (जो बाद में प्रदेश के मुखिया भी बने) के संरक्षण में न केवल शराब को खुलेआम व्यापार किया, बल्कि ब्यभिचार में भी लिप्त रहा। इस प्रकार राजनीतिक संरक्षण में फलते-फूलते इस धंधे ने यहां जनांदोलन की पृष्ठभूमि तैयार की। नशे के खिलाफ हालांकि समय-समय पर टुकड़ों में आंदोलन होते रहे, लेकिन इसका व्यापक असर नहीं हुआ। 14 अप्रैल 1983 को अल्मोड़ा में चन्द्रसिंह गढ़वाली समारोह में उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी ने सुरा-शराब, वन और खनन माफिया के खिलाफ बड़े आंदोलन की घोषणा की। इसके लिये व्यापक रणनीति और विचार-मंथन शुरू हुआ। 1 फरवरी 1984 को चैखुटिया विकासख्ंाड के बसभीड़ा से इस आंदोलन की ज्वाला फूट पड़ी।
जब यह आंदोलन चला तो इसमें महिलाओं के साथ बड़ी संख्या में जनता ने भागीदारी की। बसभीड़ा (चैखुटिया) अल्मोड़ा से चला यह अभियान लंबे ऐतिहासिक संघर्ष के साथ समाप्त हुआ। 26 मार्च 1984 को पहली बार ‘अलमेड़ा बंद’ का आह्नान हुआ और पूरा कुमाऊं बंद रहा। गरमपानी में शराब व्यापारियों का मुंह काला कर घुमाया गया। महिलाओं ने जिला प्रशासन कार्यालय में घुसकर नीलामी रुकवाई। सोमेश्वर में पुलिस दमन में कई आंदोलनकारी घायल हुये। यह आंदोलन उत्तराखंड के जनसरोकारों के लिये दिशा देने वाला साबित हुआ। इस आंदोलन में भारी संख्या में लोगों ने गिरफ्तारियां दी। इस आंदोलन को पूरे देश की मीडिया ने सराहा।
यहां यह उल्लेखनीय है कि 1980 के बाद उत्तराखंड में अराजक राजनीतिक लोगों का जो दौर शुरू हुआ वर धीरे-धीरे गांव-घरों में आने लगा है। इंदिरा गांधी के शासन में वापसी के साथ ‘संजय ब्रिगेड’ के लोग जनप्रतिनिधि बनकर आये। एक नवनियुक्त सांसद ने उस समय ताड़ीखेत ब्रांज फैक्ट्री में आंदोलनकारियों को ललकारा फिर 1984 के ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलन में माफिया के सबसे बड़े हितैषी बनकर उभरे। दुर्भाग्य से राजनीतिक विकल्प न होने के कारण वे चुने जाते रहे। बाद में तो वे सभी लोगों के प्रिय हो गये। उन्हें सत्ता न मिलने का मलाल, राज्य के बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को होता रहा। जब वे मुखिया बने तो पहला काम उत्तराखंड के उच्च शिक्षा संस्थान कुमाऊं विश्वविद्यालय के एक परिसर का नाम अस्सी के दशक के सबसे बड़े सुरा-लिक्विड के व्यापारी के नाम कर गये। जहर के व्यापारियों के सिनेमा हाॅल बनने लगे। अल्मोड़ा शहर ने पहली बार देखा बहुमंजिली इमारतों को बनते। जहर के व्यापारियों के सिनेमा हाॅल बनने लगे। इसी सुरा व्यापारी ने दानपुर भवन बनाया। आंदोलनकारियों ने तब नारा लगाया- ‘दो मंजिले मे हाथी है, डाबर वाला पापी है।’ इसी व्यक्ति के नाम पर जमीन से जुड़े मुख्यमंत्री ने संस्थान बनाया। यह वही दौर था जब एक नये राजनीतिक अपसंस्कृति का विकास पहाड़ में हुआ। इस दौर में जितने भी छोटे-बड़े शराब माफिया राजनीतिक संरक्षण में फले-फूले वही बाद में जनप्रतिनिधि भी बनते गये। ग्राम सभाओं, ब्लाकों जिला पंचायतों से लेकर संसद, विधानसभाओं में भी ऐसे लोग पहुंचने लगे। इस तरह की राजनीतिक शराब के रास्ते ही आई।
उस दौर में शराब के प्रभाव का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि कहा जाने लगा कि ‘गांधी के चेलों को शराब चाहिये।’ राजनीतिक-माफिया गठजोड़ सिर्फ एक दल विशेष तक सीमित नहीं रहा। जब कांग्रेस के बाद भाजपा सत्ता में आई तो उसने भी शराब व्यापारियों से परहेज नहीं किया। यहां भी वोट की राजनीति में शराब को मान्यता मिलने लगी। पहले शराब लोकसभा और विधानसभा चुनाव जीतने का साधन मानी जाती थी, बाद में इसने पंचायतों तक पांव पसारने शुरू कर दिये। तमाम राजनीतिक दलों ने जिस प्रकार शराब और बाहुबल का इस्तेमाल किया वह किसी से छुपा नहीं है।
प्रदेश में सत्तारूढ़ होने वाले राष्ट्रीय दल भाजपा-कांग्रेस के कारिंदे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इस शराब संस्कृति के पोषक हैं। उत्तराखंड में जमीन, जंगल और शराब के तंत्र से जुड़े लोगों की एक बड़ी जमात है। यह लगातार उनके कृत्यों में देखने को मिल जाता है। उत्तराखंड में शराब को संरक्षण देकर राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति में ंलगे राजनीतिक दलों के कारण राज्य बारूद के ढेर में बैठा है। उत्तराखड में हाई-वे से शराब हटाने के आदेश के परिपालन में सरकार द्वारा निकाले गये रास्ते को शराबबंदी मुहिम को हतोत्साहित करने के रूप में देखा जाना चाहिये। ऐसी प्रवृत्ति की जड़े अपराध को पनपाने वाली राजनीतिक शक्तियों के साथ निहित हैं। यदि समय रहते जनता ने व्यापक जनजागरण कर यहां के माहौल को नहीं सुधारा तो यह उत्तराखंड के भविष्य के लिये अच्छे संकेत नहीं हैं। अब यह बात साबित हो गई है कि राजनीतिक दलों ने जनविरोध को ही अपना एजेंडा बना लिया है। वोट की राजनीति से गांव-गांव में शराब पहुंचाने वालेराजनीतिज्ञ अब भी बेशर्मी से जनता के पैरोकार बनने का ढोंग कर रहे हैं।
पिछले विधानसभा चुनाव में जिस तरह भाजपा-कांग्रेस ने संसाधनों और शराब का इस्तेमाल किया है उससे यह बात साबित होती है कि ये दोनों दल किसी भी तरह शराब को पहाड़ में बनाये रखना चाहते हैं। चुनाव में शराब का कितना बोलबाला था वह इस बात से समझा जा सकता है कि जनता ने भाजपा के प्रत्याशियों के खिलाफ नारे बनाये। जैसे-
पिछले विधानसभा चुनाव में जिस तरह भाजपा-कांग्रेस ने संसाधनों और शराब का इस्तेमाल किया है उससे यह बात साबित होती है कि ये दोनों दल किसी भी तरह शराब को पहाड़ में बनाये रखना चाहते हैं। चुनाव में शराब का कितना बोलबाला था वह इस बात से समझा जा सकता है कि जनता ने भाजपा के प्रत्याशियों के खिलाफ नारे बनाये। जैसे-
- ‘जब तक....तब तक पीना, तब तक पीना जब तक....।’ (रिक्त स्थान में नाम छुपाया गया है आप चाहें तो अनुमान से भर सकते हैं)
- सैंडिया हैं सौल, मैंसों हैं मैग्डाॅल...........।’ अर्थात महिलाओं के लिये शाॅल हैं और आदमियों के लिये बोतल है। (इस नारे को भी आधा लिखा गया है, अगर आपने कहीं सुना हो तो भर सकते हैं लोक में बनाये इस नारे में आपत्तिजनक शब्द हो सकते हैं उससे मेरा कोई-लेना देना नहीं है।)
जिन पर ये नारे बने उनमें से एक तीसरी बार विधायक बने हैं और दूसरी तो मंत्री बन गई हैं। एक और विधायक हैं जो कभी कांग्रेस में थे। उनके खिलाफ उनकी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस ने उनके पुराने समय के अखबार बांट दिये, जिनमें उनके शराब के संरक्षक होने का आरोप था और सीबीआई जांच की मांग थी, भाजपा में आकर वे भी ‘तर’ गये। और भी बहुत सारे नेता हैं जो भाजपा की गंगा में डुबकी लगाकर अब सबसे बड़े ‘राष्ट्रभक्त’ हो गये हैं। इसलिये सावधान! उत्तराखंड में ‘बंदेमातरम’ के साथ शराब पीना भी अनिवार्य होने वाला है। और जो बंदेमातरम नहीं गायेगा उसे पहाड़ से निकाल दिया जायेगा। इस डर से हम भी सुबह-सुबह अपने बड़े भाई मुकेश बहुगुणा का अनुसरण कर नहाते वक्त मंत्रोचारण करने वाले हैं, बंदेमातरम से पहले- ‘हर-हर दारू, घर-घर दारू।’
(यह लेख मैंने गंगोलीहाट में चले शराबबदी आंदोलन के समय ‘संडे पोस्ट’ में 2006 में लिखा था। उसके कुछ अंश उसमें से लिये हैं। उत्तराखंड में शराब पर विस्तृत विवरण मेरी शीघ्र आने वाली पुस्तक में है)
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