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उत्तराखंड चुनाव २०१७ , जनता का फैसला !!











उत्तराखंड के भाग्य मत पेटी मैं बंद है और सभी राजनेताओ की तकदीर का फैसला ११ मार्च २०१७ को होगा ! उत्तराखंड के चुनाव में हर बार की तरह इस बार भी बीजेपी और कांग्रेस के बीच मैं कांटे की टक्कर है , इसलिए चुनावी पंडित यह अनुमान लगाने मैं सावधानी बारात रहे है की कौन से पार्टी को बहुमत मिलेगा , कांग्रेस और बीजेपी दोनों को संभावित विजेता लोग अपनी सहूलियत के हिसाब से बता रहे है , पर यह जरुर है की कोई भी पार्टी क्लियर विनर नजर नहीं आ रही है ! उत्तराखंड के चुनाव राज्य के लिए जरुर महत्वपूर्ण है परन्तु राष्ट्रीय स्तर पर इनका महत्व काफी कम है , यही कारण है बीजेपी ने कांग्रेस के बागियों के टिकेट देकर अपने कार्यकर्ताओ को बागी बना दिया ! कांग्रेस और बीजेपी के बीच की यह खीचतान उत्तराखंड के बनने के समय से ही चली आ रही है , कुर्सी का मोह यहाँ का राजनेताओ को कुछ भी करने को मजबूर कर देता है , इनके लिए विरोधी कही का भी हो सकता है विरोधी पार्टी का और अगर अपनी मन मर्जी का कार्य नहीं हुआ या टिकेट नहीं मिला तो ये नेता अपनी पार्टी के उम्मीदवार को हराने के लिए भी एड़ी चोटी का जोर लगा देते है , ऐसा  अतीत मैं अक्सर होते हुए देखा गया है , इसलिए यह चुनाव कोई अलग नहीं था इस चुनाव मैं भी वही सब हुआ जो पहले होता आता आया है !

कांग्रेस पार्टी जो हाई कमान संस्कृति के लिए जानी जाती है , इस बार बीजेपी मैं भी वही हाई कमान संस्कृति नजर आई , कांग्रेस के बागियों को टिकेट देकर अपने कार्यकर्ताओ की उपेक्षा बीजेपी ने बहुत बड़े स्तर पर की है जिस से उनको इन चुनावो मैं काफी धक्का लगा है , इन बागियों की बजे अगर बीजेपी अपने कार्यकर्ताओ को उम्मीदवार बनाती तो शायद बीजेपी का आना बिलकुल तय था , उनके इस कदम से चुनाव मैं बीजेपी  भ्रस्ट्राचार का मुद्दा मुखर रूप से नहीं उठा पायी , क्योंकि उन्होंने उन सभी को टिकट दिया जो की कांग्रेस मैं इस कृत्य के लिए दोषी थे ! और वैसे भी  भ्रस्ट्राचार सिर्फ के मुद्दा रह गया है इन चुनावो मे , यह एक दुसरे को कोसने का एक तरीका है और जनता को अपने लुभावने नारों से गुमराह करने का माध्यम है और सच कहे तो जमीनी स्तर पर कही इस विषय पर कोई पार्टी कुछ नहीं कर रही है , एक दुसरे को नारों , और अपनी उम्दा चुनाव स्ट्रेटेजी से हराने का मात्र सिलसिला रह गए है चुनाव , सरकार के बदलने से क्या कोई फर्क पड़ेगा , यह कहना मुश्किल है !

इन राजनीतिक पार्टियों , उनके वादों से दूर बात आम जनता की करते है , इस चुनाव मैं बहुत कुछ नया भी हुआ है , कुछ उम्मीदवार ऐसे थे जो सचमुच राजनीती को बदलने के लिए चुनाव मैदान में उतरे थे . इनमे से अनूप नौतियाल, लेप्तिनेंट सुषमा बिष्ट माथुर, प्रभात ध्यानी ,इन्द्रेश मैखुरी , प्रेम सुंदरियाल , राजेश्वर पैनुली , समीर रतूड़ीऔर  प्रताप सिंह शाही थे ! इन सभी उम्मीदवारों का मुख्य कारण चुनाव मैं उतरने का यह था की यह उत्तराखंड की जनता की सेवा करना चाहते थे और समस्याओं से जूझ रहे उत्तराखंड को वहा के निवासियों के अनुरूप विकसित करना चाहते थे , परन्तु क्या यह कभी अपने मकसद मैं कामयाब होंगे ? और या फिर मैं यह कहू की क्या प्रदेश की जनता कभी चाहेगी की इमानदार प्रवृति के लोग यहाँ के नीति नियंता बने ?

हर चुनाव मैं इस प्रकार के उम्मीदवार उठते है परन्तु बहुत ही कम या इनमे से किसी को भी जनता  विजयी नहीं बनाती है यह अक्सर देखा गया है , सिर्फ  इमानदारी और समाजसेवा के सहारे चुनाव जीतना अब असंभव सा लगता है , जिन राजेनीतिक दलों की  यह जनता पुरे ५ साल आलोचना करती है चुनाव के समय उन्ही के चुनाव चिन्ह पर ठप्पा लगाकर उन्हें विजयी बना देती है , और फिर उन्ही से विकास की उम्मीद करती है ! यह नाम जो ऊपर लिखे है उन संब उम्मीदवारों का अपना इतिहास है और समय समय पर मुद्दों और समाज को प्रभावित करने वाले विषयो पर ये अक्सर सुर्खियों मैं रहते है , यह मौजूदा शासन और उसकी गलतियों के विरुद्ध सभाए और आन्दोलन तो करते है परन्तु जब यह जनता से वोट की मांग करते है तो जनता इन्हें बाबा जी का ठुल्लू दिखा देती है ! फिर कैसे सुधरेगी उत्तराखंड की हालत ,कैसे होगा विकास , कैसे रुकेगा पलायन ?

मुझे जो सबसे बड़ी चिंता खाती है वह यह है की यह चुनावी राजनीती सिर्फ करोड़ पति उम्मीदवारों तक ही सीमित हो गयी और , समाज सुधारक लोगो की जगह सिर्फ सड़क और आन्दोलन तक सीमित रह गयी है ,और इस बार का चुनाव भी वही निराशा को बढ़ावा देखा , बस यही सब जान ने के लिए इन्तजार करे ११ मार्च २०१७ का !

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