पहाड़ के बच्चो का जीवन अकसर अपनी माता जी या दादी जी के आँचल मैं पलता और बड़ा होता है , क्योकि पुरुष अधिकतर समय गाव से बाहर रहकर रोटी कमाने की दौड़ मैं लगे होते है ! माना की आज पहाड़ बहुत बदल चुका है परन्तु पहाड़ मैं रहने वाले बच्चो के लिए अभी भी यही सच है ! समय काफी आगे निकल गया है आज मैं जिनके बारे मैं लिखने जा रहा हु वो अब हमारे बीच मैं नहीं है , पर उनकी याद सदा दिल मैं रहती है और उनके मेरे जीवन पर बहुत एहसान है , इतना बड़ा परिवार है तो उसका कारण सिर्फ वो है , उन्होंने एक पक्की नीव की तरह हम सब के जीवन को सहारा दिया है !
आज पिताजी की उम्र ७५ साल की हो गयी है और उनसे लगभग बीस साल पहले आमा जन्म कुमाऊ के द्वाराहट स्थित किरौला गाँव मैं हुआ था , मैंने यह गांव कभी नहीं देखा पर सुना जरुर है इस गाँव के बारे मैं ! लगभग १९२० के समय उनका जन्म इस गाँव मैं हुआ होगा ! उनके बचपन के बारे मैं कभी बात नहीं हुई , पर यह जरुर पता है की लगभग १२ वर्ष की उम्र मैं उनकी शादी मेरे दादा जी के साथ हो गयी थी ! १२ वर्ष आज के ज़माने के हिसाब से बहुत कम उम्र है और अब इस उम्र मैं शादी करना एक कानूनन अपराध भी है , परन्तु वो पुराना समय था और तब उस वक़्त यह सब चलता था ! बारह वर्ष की उम्र मैं शादी और दादा जी का गाँव संस्केत था ,जो आज भी जौरासी से लगभग ६ -७ किलोमीटर की दूरी पर है आज भी यहाँ जाने के लिए जौरासी ही उतरना पड़ता है ! उस ज़माने मैं तो शायद ही कोई सड़क होगी , किरोला गांव से संस्केत की दूरी लगभग ६० किलोमीटर होगी , दादी ने एक बार बताया था की दहेज़ का सामान अपनी पीठ पर बाध कर वो दादा जी के गाँव पहुची थी, क्योंकि तब उस समय सब काम खुद करना पड़ता था और नयी बहु होने के नाते तो यह और भी जरुरी हो जाता था ! सिर्फ यही लाइन थी जिसने मुझे उनके शादी के बारे मैं सब कुछ बताया !
दादी ने अपना वैवाहिक जीवन शुरू किया परन्तु जो समय आने वाला था वह काफी भयावह और दर्दनाक था जिसकी कल्पना भी उन्होंने नहीं की होगी ! दादी के पांच बच्चे हुए , लेकिन इन सब बच्चो का सुख उनके जीवन मैं नहीं था , एक साल आया जब ये बच्चे एक ऐसी बीमारी से पीड़ित हुए की इन सबको जान गवानी पड़ी , सिर्फ औलाद के रूप मैं पिताजी बच पाए , परन्तु यह ख़ुशी भी ज्यादा देर तक रह नहीं पायी और चार साल की उम्र मैं दादाजी , दादी और पिताजी को इस दुनिया मैं अकेले छोड़ कर सदा के लिए इस दुनिया से चले गए !एक अकेली माँ और चार साल का बच्चा , माँ जिसे दीन दुनिया का कुछ पता नहीं , हम अनुमान भी नहीं लगा सकते उनके दुःख की सीमा का ! असिक्षित माँ कमाई का कोई साधन नहीं खेती ही एक सहारा था पर उसपर भी बाकी परिवार वालो जी नजर रहती थी ! पुराने परिवारों मैं अक्सर ऐसा होता था , बड़ी मुश्किल से कुछ खेत और जमीन दादी के पास आये और दादी , दादा वाला गांव छोड़कर उद्लिखान आ गयी जहा अब हम रहते है !
इस गाँव मैं आते ही दादी ने अपना जीवन खेती और मवेशियों मैं लगा दिया , पिताजी को पांचवी तक की शिक्षा दी और पिता जी भी जिद करके दिल्ली आ गए , क्योकि जैसा अब लोगो का सहारा दिल्ली है तब भी लोगो का सहारा दिल्ली ही था! पिताजी यहाँ आकर एक फैक्ट्री मैं नौकरी करने लगे , अम्मा जी को सदा उनका डर सताए रहता था क्योकि जितना दुःख अम्मा जी ने इस छोटे से जीवन मैं देख लिए था उस से ये स्वाभाविक था की वो डर पूरी जिंदगी भर नहीं गया होगा ! दिल्ली मैं अपनी नौकरी शुरू की एक पांच पढ़े हुए बच्चे को आप समझ सकते है किस प्रकार की नौकरी मिल सकती है , पर जहा भी वो गए अपनी मेहनत और लगन से और अपनी अच्छी आदतों के बल पर उन्होंने अच्छा काम किया और धीरे धीरे वो आमा का सहारा बन गए ! समय बीत ता गया और अम्मा जी ने पिताजी की शादी तय कर ली और १६ साल की उम्र मैं उनकी शादी बड़ी धूम - धाम से हो गयी , परन्तु करनी को कौन ताल सकता है जो होना है वो हो कर रहता है , पिताजी की नयी नवेली दुल्हन भी सिर्फ ६ महीने उनका साथ निभा सकी और अचानक युवा अवस्था मैं वह भी इस दुनिया को छोड़ कर सदा के लिए चल बसी , अम्मा जी के ऊपर फिर से दुखो का पहाड़ टूट पड़ा और उनके फिर वो पुराने घाव हरे हो गए , अपने जवानी के दिनों मैं अपने परिवार मैं इतनी मौतों को देखने के बाद भी , इस औरत ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा और दुःख को अपने आँचल मैं दबाकर रखा पर उसे कभी भी अपने फर्ज के आगे नहीं आने दिया , अम्मा फिर खेती और मविशियो मई व्यस्त हो गयी और जीवन मैं नयी आशा ढूढने लगी , फिर अगले ही साल पिताजी के लिए एक नया रिश्ता आया और उनका विवाह मेरी माता जी से हुआ , अब इस परिवार मैं खुशियो के आगमन का समय था , हम चार भाई और एक बहिन है और क्योंकि मैं सबसे बड़ा नाती था , तो जाहिर है मेरे प्रति अम्मा जी का प्यार अनंत था , उन्होंने मुझे सदा सबसे ज्यादा प्यार दिया और मेरी बहुत गलतिया भी माफ़ की , आज अगर हमारे घर मैं ख़ुशी है तो सिर्फ उनके कारण है , अपने जिंदगी के वो लगभग ८० सावन पार कर के वो श्री भगवन के चरणों मैं चली गयी और हमें एक प्यार से महकता घर दे गयी !
आमा का जीवन बहुत सरल सा लगता है ऊपर लिखी इन पंकतियो से परन्तु , अगर आप इनकी गहराइयों मैं जाओ तो पता लगता है की कितना बड़ा बलिदान किया दादी ने हमारी खुशियों के लिए ! उनके जीवन को अगर आज के परिपेक्ष मैं देखता हु तो शायद आज की नारी के लिए इतना कष्ट सहना काफी मुश्किल होता , लगभग १५ से २० वर्ष की आयु मैं है आमा ने सब दुःख देख लिए , बच्चो की मौत , पति की मौत फिर भी , बिना पैसे , बिना शिक्षा अपने आप को फिर से खड़ा किया जिंदगी के इन थपेड़ो के सामने और अंत मैं जीत उसकी ही होती है जो निस्वार्थ मेहनत करता है , भगवान् ने भी हारकर अम्मा का साथ दिया और उनके २० वर्ष के बाद के जीवन को ख़ुशी से भर दिया !
आज इसी प्रकार से हर घर मैं इस प्रकार की एक अम्मा या बुबू मौजूद है जिन्होंने अपने जीवन की चिंता न कर सब कुछ परिवार पर न्योछावर कर दिया है , परन्तु बहुत कम परिवार के लोग है जो उनकी सुध लेते है , उनके इस समर्पण का आदर करते है ,इसलिए मेरी सभी मित्रो से यही गुजारिश है , हमें अपने बुजुर्गो से बात करने चाहिए उन्हें खुश रखना चाहिए , ये वो लोग है जिन्होंने हमारी एक मुस्कराहट के लिए कई वर्षो तक अपने आसुओ का बलिदान दिया है , इसलिए कभी भी अपने से बड़ो का सम्मान करना न भूले !

अच्छा चिट्ठा है । जारी रखें । ब्लाग अनुसरणकर्ता गैजेट लगायें ताकि अनुसरण किया जा सके । शुभकामनाएं ।
जवाब देंहटाएंhttp://ulooktimes.blogspot.in/
धन्यवाद गुरूजी उत्साहवर्धन के लिए , आशा है आगे भी आप अपनी कृपादृष्टि बनाये रखेंगे , आपसे बहुत कुछ सीखना है मुझे , आपके सुझाव के लिए धन्यवाद !
हटाएंबहुत सुन्दर।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद राजेंदर भाई उत्साह वर्धन के लिए , आशा है आप इसी प्रकार अपनी कृपा बनाये रखेंगे !
हटाएंबिष्ट जी बहुत अच्छा लिखते हो........ पर मेरा एक सवाल हे राजनीती में क्यों चले गए आप.... क्योंकि सही और गलत की आलोचना करना मुश्किल हो जायेगा। .. पार्टी हित भी देखना पड़ेगा
जवाब देंहटाएंधन्यवाद शंकर जी , आपने समय निकाल मेरी इस पोस्ट को पढ़ा और जहा तक राजनीती और लेखन का सवाल है दोनों चीजे अलग अलग है और ब्लॉग मैं अक्सर उन्ही विषय पर लिखना पसंद करता हु जो आम जीवन मैं मुझे प्रव्हावित करती है , और मेरे लेख राजनीती से प्रेरित न होकर व्यवस्था से प्रेरित होते है , आप लोगो के आशीर्वाद से इस लक्ष्मण रेखा का सदा सम्मान करूँगा, धन्यवाद !
हटाएंVery nice, it was an heart touching autobiography. Very nice thinking ��������������
जवाब देंहटाएंThank you Hitesh for finding time and reading this post, despite exam pressure ....and also allow me to take this opportunity to wish you very best for your upcoming exams !!
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