गाँव को आज परदेश खा चूका है , गाँव के लोग आधुनिकता की चमक और रोटी रोजी की तलाश मैं गाँव को अपनी जिंदगी से हटा चुके है ! शहर मैं आकर मनुष्य सिर्फ शहर की सोचता है , और अब एक नौकरी एक आशियाना और बच्चो का भविष्य यह उसकी आधुनिकता की सबसे बड़ी चिंताए है और कुछ भाग्यशाली इन सब चिन्ताओ के साथ साथ फिर से गाँव के रिश्तो के साथ जुड़ रहे है ! आज मनुष्य को समाज न परदेश मैं पूरी तरह से मिल रहा है और न गाँव मैं !मेरे साथ कुछ ऐसा ही हुआ उस दिन अचानक दिल्ली के एक व्यस्त दोपहर मैं एक फ़ोन ने मुझे झकझोर कर रख दिया ! समय कुछ २ से २.३० बजे का होगा मैं अपने एक मित्र के साथ गोल मार्किट की एक दूकान मैं कुछ बैनर का डिजाईन फाइनल कर रहा था , तभी फ़ोन बजा और फ़ोन पर एक नंबर बार बार फ़्लैश हो रहा था , फ़ोन बुक मैं नाम न होने की वजह से कोई नाम नहीं आ रहा था , मैंने जैसे ही फ़ोन उठाया . उधर से एक अधेड़ महिला की आवाज आयी
" देबीया बोल रहा है "
मैंने एक दम जवाब दिया " हा " इस नाम से सिर्फ मुझे सिफ मेरे गाँव वाले जानते है !
" मैं चाची बोल रही हु "
तब तक मैंने चाची की आवाज पहचान ली थी , लोधी रोड की चाची बोल रही थी !
" बयी तू तो हमें भूल ही गया है , जब से नॉएडा आई हु तबसे न मिलना , न फ़ोन कुछ भी नहीं "
मैंने सोचते हुए जवाब दिया " चाची आपका नंबर ही नहीं था "
" नंबर नहीं था तो क्या हुआ , नंबर औरो से मिल सकता है , और कभी नॉएडा घर भी नहीं आया तू "
च्चाची ने चाचा के गुजर जाने और लोधी रोड का मकान छूटने के बाद नॉएडा चली गयी थी , इस लोधी रोड की भी अपना इतिहास था , यह कुवाटर उद्लिखान से आने वाले लोगो का सबसे बड़ा ठिकाना हुआ करता था अस्सी और नब्बे के दशक मैं , मैं भी जब दिल्ली आया था तो सबसे पहले यही आया था , पिताजी किशन गंज रहते थे , और उनकी छुट्टी सिर्फ सोमवार को होती थी इसलिए गाँव आने के दो तीन दिन मैं यही रहा ! लोधी रोड वाले चाचा की बारी थी पिताजी के पास छोड़ने की ! मुझे अभी भी याद है वह शाम डीटीसी की बस से उतरने के बाद उन्होंने मुझे पहली कैम्पा कोला पिय्लाई थी , जो इतनी ठंडी थी की सीधा नाक तक जा चढ़ी थी ! उन चाचा को गुजरे हुए अब काफी वक़्त हो गया है , चाची ने किसी तरह से अपनी छोटी बेटी की शादी की और बहुत मेहनत और मसक्कत के बाद उनका लड़का अब एन डी एम् सी मैं नौकरी लगा है अपने पिता के स्थान पर , लोधी रोड मैं अपने जीवन के लगभग ३० . ३५ साल काटने के बाद चाची नॉएडा चली गयी है !
" चाची पक्का आऊंगा जल्दी ही और फ़ोन भी करूँगा आपको अब आपको फ़ोन करने की जरुरत नहीं पड़ेगी " मैंने कहाँ
" हमारे गाँव मैं एक तू ही है जिस से बात होती है और , तू बिलकुल बेटे के तरह है मेरे , इसलिए इतने हक़ से कह रही हु " चाची ने बोला !
" ठीक है चाची मैं जल्द ही आपसे आकर मिलता हु बाय " यह कहकर मैंने फ़ोन काट दिया !
चाची के इस फ़ोन कॉल ने मुझे अतीत मैं धकेल दिया था ! आज फिर से यादे मुझे उद्लीखन ले चली थी ! एक फला -फूला गाँव था मेरा , हर घर मैं एक अलग प्रकार की ख़ुशी थी , पैसे का रंग इस खुश मैं दूर दूर तक नहीं था , गरीबी और अमीरी इन रिश्तो के बीच कभी नहीं आई ! सब त्यौहार , रामलीला , खतोदु, फूलदे , खेलना -कूदना , अडडू, फर्र ,गुच्छी , और आठे का कौतिक . आलू -मटर और रायता सब साथ मिलकर और गोल धारा बनाकर नीचे बैठकर खाते थे ! रामगंगा जीवन का एक अभिन्न अंग थी , और उसमे नहाना सबसे बड़ा सुख ! रामगंगा ने बिना कोच के हमें तैरना सिखा दिया और भैंस की पूँछ पकड़कर जर्धार रौ के चक्कर लगाना ! लालुपाती और पाट्या मैं गोरु के गवाव और सौल्धयानि ग्ध्यर से मझेटी लगाना यही बचपन था , बरेती जाना सबसे बड़ा पिकनिक था और पिठ्या लगाना और मिटा कर दुबारा लगाना जेब खर्ची कमाने का सबसे बड़ा साधन , यही जीवन था इस से आगे कुछ नहीं ! करियर शब्द कभी सुना नहीं था , सिर्फ तकती और कमेतु लेकर स्कूल जाना तकती मैं " अ आ " लिखकर वापस ले आना यही हमारी पढ़ायी थी !
समय ने पता नहीं कब बड़ा कर दिया और "तली" की राह पकड़ ली , क्योकि "तली " जो जाता है वही फिर छुट्टियों मैं गाँव मैं नवाब-साब बन कर फिर घूमता है , बेल-बोटम की पेंट, पीछे की जेब मैं कंगी , टूथ पेस्ट और ब्रश और पैर मैं हर टाइम चप्पल ये कुछ नयी चीजे जुड़ गयी जिन्दगी से , यही आधुनिकता की पहली कड़ी थी , और यही से सफ़र शुरू हुआ गाँव से दूर रहने का और शहर को पास रखने का ! जैसे जैसे समय बीतता गया गाँव के रिश्ते छूटते गए और शहर मैं नए रिश्तो ने पुराने रिश्तो की जगह ले ली ! चिट्ठी अब मोबाइल बन गयी है पर मोबाइल मैं चिट्टी वाली मिठास कहा ! मोबाइल वो सुख कहा दे पाता है जो बीस दिन देर पहुचने वाली चिट्ठी देती थी ! रिश्तो मैं नकलीपन आ गया है अब सब रिश्ते आमिर और रसूकदार लोगो के घर तक जाते है , गरीब आदमी का न कोई दोस्त है न रिश्तेदार ! यह सच शहर का है तो यही सच गाँव का भी है !
परन्तु कुछ रिश्ते इन सब से दूर है जो ऊँच नीच और आमिर गरीबी से दूर है ये रिश्ते है मेरे गाँव के , ये रिश्ते है मेरे बचपन के , जिनमे कभी किसी प्रकार छल - कपट नहीं था , यही और ऐसा ही रिश्ता है लोधी रोड वाली चाची का , चाचा मेरे सबसे अच्छे मित्रो मैं से थे , इन रिश्तो मैं उम्र नहीं देखि जाती , बड़े वैचारिक रिश्ते थे वो , आज वो होते तो पता नहीं गाँव की हालत कुछ तो अच्छी होती , चाची की बातचीत मैं चाचा का जिक्र तो नहीं आया परन्तु हर बात कही जाय यह जरुरी तो नहीं ! चाची के अंतिम वाक्य के अपने पन ने मुझे काफी झकझोर कर रख दिया था , उसमें मुझे एक अपना उनका हक़ दिखा की , माना तुम मुझे फ़ोन नहीं करते याद नहीं करते परन्तु क्या मेरा अधिकार तुम पर नहीं है ?
यह प्रश्न गाँव का हर बुजुर्ग इस जवान पीढ़ी से पूछता है , कम से कम एक फ़ोन और एक नमस्ते के हकदार हम भी है , क्या तुम लोग हमें इस लायक भी नहीं समझते ? बचपन मैं कभी दाल - भात , कभी रोटी-सब्जी और कभी गाय का दूध तो पिलाया होगा , कभी दही और छा तो रखी होगी हमने तुम्हारे लिए , माना हम तुम्हारे परिवार के नहीं है फिर भी समाज का एक हिस्सा तो जरुर है , सदा सुख और दुःख मैं साथ तो खड़े थे , क्या इन का आज के युग मैं कोई मूल्य नहीं है , हमने कभी रुपये पैसे या कोई अन्य उम्मीद तो नहीं रखी पर , एक फ़ोन और एक नमस्ते के हकदार तो हम भी है ! चाची की बातो से लगा मुझे भी की शायद वह इसी हक़ की उम्मीद मुझसे कर रही थी , तो उसमे गलत क्या है , उन्होंने बचपन मैं कुछ न कुछ तो मेरे लिए किया होगा , और जो चाचा जी जिनकी वो अर्धांगिनी है उन्होंने तो बहुत कुछ मेरे लिए किया , तो फिर क्यों मैं उनको फ़ोन नहीं करंता , क्यों नहीं उनके हाल चाल पूछता ? इन्ही सब सवालो को मन मैं लिए मैं दिल्ली के ट्रैफिक मैं फिर खो जाता हु , और फिर शाम की चका- चौंध और शोर मैं गाँव फिर कही खो जाता है !

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