समय बहुत आगे बढ़ गया
है विज्ञानं ने बहुत प्रगति कर ली है , परन्तु लगता है मेरा गाँव वही का वही है ,
वही मान्यताये वही विश्वास विज्ञानं की प्रगति ने मेरे गाँव को छुआ तक नहीं है जबकि मोबाइल , कंप्यूटर
, गाडी , कार ये सब जीवन के अभिन्न अंग जरुर बन गए है , सोच और विचारधारा का अभाव
अभी भी गाँव के जीवन मैं अन्धविश्वास को सबसे ऊची पायदान दिए हुए है ! अपने हर
छोटे बड़े दुःख के लिए सबसे पहले देवता की पूछ और फिर जादू –टोने और पितरो का
प्रभाव आज भी गाँव के जीवन को अंधकारमय बनाये हुए है , अक्सर इस प्रकार की छोटी –मोटी
घटनाये तो हमारे इर्द गिर्द रोज नजर आती है परन्तु एक बड़ी घटना ने मुझे हिला कर रख
दिया !
एक खुशहाल परिवार का
खुशहाल नवयुवक रमेश अपनी जिंदगी बड़े आराम से गाँव मैं जी रहा था , घर परिवार सब खुशहाल
था , माँ –बाप भाई बहन , चाचा चाची और अपने बच्चे के रूप मैं आने वाली ख़ुशी , इस
से ज्यादा भगवान् से कोई क्या मांग सकता है ! काम काज बहुत अच्छी तरह से चल रहा था
, घर मैं पैसे की कमी नहीं थी जिसके चलते समाज मैं भी इज्जत थी और रमेश की अपनी
आदतों पर अपना खुद का अंकुश था इसलिए समाज मैं और इज्जत थी ! हमारे पहाड़ के समाज
मैं पैसा होना और फिर सभी से इज्जत से पेश आना और शराब को अपनी आदतों के पास भी न
फटकने देना एक अच्छे चरित्र का उदहारण है! रमेश अपने काम मैं व्यस्त दुःख और दर्द
से दूर एक स्वस्थ जिंदगी बस्रर कर रहा था !
जिंदगी ने एक करवट
ली और रमेश को अचानक शरीर मैं एक दुःख का आभास हुआ , जिसे उसने शुरू मैं इतना
ध्यान नहीं दिया और एक नौजवान की तरह इस दुःख से लड़ने लगा , और यह दुःख उसके शरीर
को आते जाते उसे सताने लगा था ! पहाड़ मैं शरीर के दुःख को इसी प्रकार से ज्यादा
महत्त्व नहीं देते , परन्तु जब यह दुःख उसे सताने लगा तो एक आधुनिक नवयुवक की तरह
वह अस्पताल गया वहां उसने अपना इलाज करवाया परन्तु उसने इसे एक छोटा मोटा दर्द
कहकर अपने आप को समझा दिया ,काम काज की व्यस्तता और अच्छे अस्पताल का अभाव ने उसे
इस दर्द को सहने की क्षमता दे दी ! परन्तु जब दर्द कुछ ज्यादा असहाय होने लगा तो उसने अस्पताल और जादू –टोना दोनों
जगह अपना उपचार शुरू कर दिया ! पहाड़ का मरीज दो प्रकार के इलाज करवाता है पहला
जादू-टोने , देवता और पितरो का और साथ मैं अस्पताल का , पर क्योकि वहा के अस्पतालो
मैं सुवधा नगण्य है इसलिए बोल बाला सदा जादू टोने और देवताओ का ही रहता है ! रमेश
भी अब इसी दौर से गुजर रहा था , परन्तु उसे कही भी किसी प्रकार का आराम नहीं मिल
पा रहा था , मरता क्या न करता उसने दिल्ली की राह पकड़ी और सीधा ऐम्स मैं इलाज
करवाने पहुच गया , एम्स की भीड़ ने उसे और परेशान कर दिया , उसे प्राथमिक उपचार मैं
डॉक्टर्स ने कैंसर की आशंका जताई और जिसके टेस्ट के लिए उसे समय दिया गया , क्योकि
जिस कैंसर की आशंका डॉक्टर ने जताई उसके लिए रीढ़ की हड्डी से मांस का एक टुकड़ा
निकलना पढता था , वह प्रक्रिया काफी जटिल और काफी दर्द्नीय थी , रमेश ने जैसे –तैसे
उस टेस्ट के लिए अपना सैंपल दिया और उसकी
रिपोर्ट का इन्तजार करने लगा उस रिपोर्ट से पता चला की उसे कैंसर है और उसे
फिर से एक दूसरा सैंपल देने के लिए सफदर जंग अस्पताल मैं जाना था , उसमे समय था ,
इसलिए वह गाव आ गया , इस दौरान मैं भी गाँव आया हुआ था , एक दिन मैं भी अपने एक
परिचित के साथ रमेश का हाल चाल पूछने उसके घर गया , घर मैं सन्नाटा सा छाया हुआ था
, ख़ुशी का नामो निशान नहीं था , घर के वातावरण मैं एक प्रकार की निराशा सी फैली
हुई थी , रमेश चाख मैं लेटा हुआ था और उसके चारो तरफ गाँव की औरते बैठी हुई थी जो
अपने ढंग से इस दुःख के बारे मैं बात कर रही थी, रमेश उन सबसे बात कर रहा था ,और
उसके दिल्ली के अनुभव के बारे मैं सबको बता रहा था , शरीर मैं दर्द काफी व्याप्त
था इसलिए वह बैठने मैं भी काफी परेशानी महसूस कर रहा था , एक नवजवान का इस प्रकार
से दिन भर लेटे रहना एक प्रकार का सन्देश था की दर्द कितना अश्ह्नीय हो चला था !
रमेश से कुछ देर बात की उसकी बात मैं मुझे एक कृत्रिम विश्वास झलक रहा था इस दर्द से लड़ने की सच्ची लडाई नजर आ रही थी परन्तु इस सबसे भयवाह एक और बात की उसको टेस्ट के लिए मांस निकालने की इस प्रकिर्या ने तोड़ के रख दिया था उस दर्द ने उसे पूरी तरह चित्त कर दिया था , वह बैठे हुए अन्य लोगो को समझाने की कोशिश मैं लगा हुआ था की मेरे दर्द का इलाज दिल्ली के डॉक्टर के पास नहीं है उसका इलाज तो मेरे गाँव के दाश के पास है जिसने मुझे पूरा विश्वास दिलाया है की यह सब करनी इस देवभूमि के देवताओ की है और उसके पास उन सब देवताओ का इलाज है !
मैं इस दलील से ख़ासा अप्रभावित था परन्तु जिस प्रकार से दिल्ली के डॉक्टर अभी भी टेस्ट के रिजल्ट का इन्तजार कर रहे थे किसी प्रकार के प्रभावी इलाज के लिए उस समय इस दास का आ जाना और अपने इलाज को सबसे उपयुक्त मानना ही रमेश के लिए एक तिनके का सहारा था ! रमेश दिल्ली से आकर इस दास से मिल चूका था और उस दास ने उसे यह भी कहा की तुम दिल्ली जाकर चार कदम पीछे चले गए हो इसलिए जो भी इलाज है उसे जल्दी शुरू करना पड़ेगा , और वही हुआ , जब मैं रमेश से मिलने गया था उस दिन उसके इलाज का दूसरा दिन था वह बड़ी ख़ुशी से बता रहा था सबको की दास के इलाज से उसे काफी फायदा पहुच रहा है , जो भूख उसकी कही ख़त्म हो गयी थी वो उसने वापस पा ली है और अब वो दो की बजे चार रोटिया खा रहा है , कुछ देर रमेश के पास बैठने के पश्चात मैं घर को निकल रहा था की मुझे खो मैं उसकी गर्भवती पत्नी मिली उसे देखकर मेरा दुःख और बढ़ गया , मैं उसके पास गया और उसको मैं सिर्फ यह कह पाया की दास के उपचार के साथ साथ आप डॉक्टर का उपचार भी जारी रखे ! और यह कह कर मैं अपने गाव की और निकल गया ! यह मेरी अंतिम मुलाकात थी रमेश से !
उसके कुछ दिनों बाद मैं दिल्ली आ गया और फिर लगभग एक महीने बाद मुझे हमारे गाँव के सभापति का फ़ोन आया और उन्होंने पुछा रमेश की हालत और बिगड़ गयी है , जो स्वाभाविक ही था क्योकि डॉक्टर का इलाज चल नहीं रहा था , मैंने सभापति जी से बोला की अगर पैसे का अभाव नहीं है तो आप सीधा रमेश को राजीव् गाँधी कैंसर संस्थान रोहिणी दिल्ली मैं दिखाए , इसके बाद मेरी सभापति जी से भी बात नहीं हुइ !
इस बीच मेरे गाँव से आने और उसके बाद के एक महीने मैं मुझे ज्ञात हुआ की रमेश अपने उपचार के लिए पूरी तरह से हमारे गाँव के दास पर निर्भर हो गया उसे लगा की मेरी भूख इस दास ने बढाई है इसलिए अब पूरा इलाज भी उसके ही पास है उसे लगाने लगा की यह दोष किसी देवता है ही है और इस कारण वह गाव के दास के पुरे वश मैं आ गया , रमेश ने दास से कहा की मेरे डॉक्टरी इलाज मैं काफी खर्चा आएगा , इसकी बजाय उतनी ही राशि मैं आपको दे देता हु आप निसंकोच अपना इलाह शुरू करे पुरे इलाज का लगभग खर्च 5 लाख रुपया बताया गया और रमेश ने पेशगी के तौर पर उसे डेढ़ लाख रुपया दे भी दिया , इस प्रकार गाँव मैं दास ने उसका इलाज शुरू कर दिया ! लगभग एक महीने तक जब इस इलाज से फायदा नहीं हुआ तो रमेश ने फिर दिल्ली की राह चुनी , और अंत मैं परिवार वाले उसे रोहिणी राजीव गाँधी कैंसर संसथान मैं इलाज के लिए ले आये ! परन्तु अब स्थिति काफी बिगड़ चुकी थी और कैंसर अब लाइलाज हो चला था , और इसी दौरान मुझे एक हफ्ते पहले पता चला की रमेश दिल्ली इलाज के लिए दुबारा आते हुए ,सदा के लिए इस जीवन को अलविदा कर चूका था !
इस घटना ने मुझे काफी अन्दर तक झकझोर दिया था , और साथ ही मैं अपने आपको भी उसकी मौत का जिम्मेदार मान ने लगा था , क्योकि चाहे में कही भी रहता हु मैं भी उस समाज का हिस्सा हु और इसके कारण मेरी भी यह जिम्मेवारी बनती है की समाज से अन्धविश्वास को ख़त्म करू ! मैं अपने ईस्ट देवता के बिलकुल विरुद्ध नहीं हु , अपने देवभूमि और संस्कृति के बिलकुल विरुद्ध नहीं हु , परन्तु देवता के नाम पर चलने वाली ये अन्धविश्वास की दुकाने बंद होनी चाहिए ! अन्यथा एक दिन पूरा समाज इस अन्धविश्वास का शिकार हो जायेगा जैसे की रमेश का हुआ ! समाज मैं एक जन जागरण की जरुरत है तभी समाज को इस अन्धविश्वास से मुक्ति मिल पाएगी , अन्यथा तब तक निर्दोष जीवनों का जाना लगा रहेगा !
कैंसर बीमारी के ऊपर एम्स के डॉ जी.के रथ का इंटरव्यू जो कुछ समय पहले रविश कुमार जी ने लिया था , यह पूर्ण नहीं है परन्तु जितना भी है उसे कैंसर के बारे मैं आपककी बहुत आकंशाओ का जवाब आपको जरुर मिल जाएगा !

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