सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

टूटता पहाड़ टूटता पहाड़ी !





मात्रभूमि को छोड़ने का दर्द सदा हमें सताता रहता है , अपनी जड़ो से दूर रहने  को पलायन कहते है , खेत खलिहान , पहाड़ , नदी और वो आबो हवा जिसे हम बचपन मैं इतना नहीं समझ पाए थे , जितना अब समझते है , उस पानी और हवा की कीमत जब हम शहर की और निकलते है तब पता चलता है , आज वही कारण है पहाड़ो से दूर होकर हमें पहाड़ अच्छे लग रहे है , मन मैं पहाड़ की वो वादिया एवं उनमे गुजरा बचपन सदा याद रहता है , परन्तु अब पहाड़ को हमारी सबसे ज्यादा जरुरत है पहाड़ की इज्जत हम तभी समझते है जब हम उस से दूर रहते है , परन्तु जब हम उसके पास रहते है तो सोच अलग होती है !

पहाड़ को छोड़ने के अलावा क्या चारा है हमारे पास या फिर सैकड़ो पहाड़ मैं रहने वाले लोगो के पास , यह समझना जरुरी है , पहाड़ हमें शुद्ध हवा और पानी दे रहा है , पर की इन्ही पर जिन्दा रहा जा सकता है ? व्यवस्था ने कभी पहाड़ को अपना नहीं समझा वह तो सिर्फ वह अपने फायदे के लिए बनी है , वह जब चाहती है पहाड़ को निचोड़ती है उसमे से अपने फायदे का रस निकालती है और चल देती है , ऐसा ही सब पहाड़ के साथ कर रहे है जिस से पहाड़ कम से कम पहाड़ी के लिए तो ख़तम होते जा रहे है ! पहाड़ का सबसे बड़ा दुःख है की उसके अपने ही उससे पराये की तरह व्यव्हार कर रहे है !

बचपन मैं शहर आने की तमन्ना नहीं थी , पर पढाई जरुरी थी , पढाई के लिए शहर आये और फिर पढई कर के पहाड़ के लायक नहीं रहे और उस से  सिर्फ गर्मी की छुट्टिय का नाता रह गया , और जैसे जैसे बड़े हुए वह नाता सिर्फ अब दो चार साल मैं एक बार उस से  मिलने तक का रह गया है ! बहुत सोचा की इसे अपनी कर्मभूमि बना लिया जाय और वही रहा जाय , परन्तु वह भी संभव नहीं हो पा रहा है , खेती एक मुख्य काम है पहाड़ के लोगो का परन्तु अब खेत कहा रहे , खेती की  जमीन पहाड़ मैं वैसे ही काफी कम है ,अगर मैं पुरे साल भी मेहनत कर के खेती करता हु तो अपना भी पेट नहीं पाल सकता , वो सरकार जो फसल नष्ट होने के मात्र पांच सौ के चेक बाट रही है तो इसका मतलब आप समझ ही सकते है सरकार खुद जानती है की खेती से  पहाड़ के  किसान को क्या मिल सकता है ! खेती तभी संभव है जब किसान के पास जमीन हो , उसके पास साधन हो , उसको भगवान् पर निर्भर न रहना पड़े फसल के लिए !

आज हमारी सरकार है , अपने लोग नीति बना रहे है , अपने लोग ऊँचे ओहदों पर बैठे है परन्तु पहाड़ की स्थिति और भी बदतर होती जा रही है , न वह नीति  पहाड़ के काम आ रही है और न ही वह पर रहने वाले पहाड़ी के , पहाड़ की गोद मैं उपजने वाले धातु , पहाड़ के पानी से विद्युत् परियोजना सब तो आप पहाड़ से छीन रहे हो और उसके बदले पहाड़ी को क्या मिला , आपदाए , पहाड़ी की लिए न स्कूल है , न अस्पताल है उसे हर छोड़ी से चीज के लिए तराई की शरण लेनी पढ़ती है और जहा उसका खर्चा पहाड़ से भी ज्यादा होता है , तो पहाड़ी अब समझदार हो चला है , जब उसको लगता है की सब तो तराई मैं ही आ गया है तो मैं क्यों वह रहू!
नेता लोग चुनाव जीत कर सीधा देहरादून की राह पकड़ लेते है , वही नीति बनाते है और फिर वही के हो कर रह जाते है , ये कैसा विकास है , पहाड़ अब बंदरो और बागो के लिए रह गया है , अभी चौखुटिया बाजार मैं आये चीते ने यह सिद्ध कर दिया की अब उसे भी अपने शिकार के लिए बाजार आना पड़ेगा वही हो रहा है , जो सरकार पहाड़ के नाम पर चल रही है , वही उसकी अपनी नहीं हुई तो कौन होगा इस पहाड़ का और कौन सुध लेगा इस पहाड़ी की !

इसलिए हमें ही इस  पहाड़  को  फिर से आबाद  खड़ा करना  पड़ेगा , उसके अनुरूप काम करने पड़ेंगे , प्रकृति को सबसे ऊपर रख  कर हमें सोचना पड़ेगा , तभी हम आने वाली पीढ़ी को  कुछ दे  पायेंगे !

टिप्पणियाँ

  1. सोचते ही रह जायेंगे । हर कोई लूटने खसोटने मे लगा है पहाड़ को । लखनऊ से डकैत ला ला कर देहरादून में बैठा दिये हैं । गैरसैंण का झुनझुना सब बजा रहे हैं ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बिलकुल सही कहा आपने , पहाड़ी के लिए तो यह सब बिलकुल उस कहावत की तरह हो गया ," आसमान से गिरा खजूर पर अटका " और अब तो ये लूग और ज्यादा दर्द देती है क्योकि लुटेरे मेरे अपने जो है !

      हटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उत्तराखंड में पंचायत चुनाव: गांव के विकास की धड़कन

  उत्तराखंड में पंचायत चुनाव: गांव के विकास की धड़कन पंचायत चुनाव, या पंचायत चुनाव , भारत में ग्रामीण लोकतंत्र की नींव हैं, जो गांवों को उनके भविष्य को संवारने का अधिकार देते हैं। उत्तराखंड में, हिमालय की गोद में बसे गांवों के लिए ये चुनाव विशेष महत्व रखते हैं। जुलाई 2025 में होने वाले उत्तराखंड पंचायत चुनाव की सरगर्मी शुरू हो चुकी है। प्रधानों (ग्राम प्रमुख) से लेकर समग्र विकास तक, ये चुनाव ग्रामीण उत्तराखंड के लिए गेम-चेंजर हैं। आइए जानें कि पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं, ये गांवों के विकास को कैसे बढ़ावा देते हैं, और 2025 के चुनावों से जुड़े कुछ रोचक किस्से जो उत्तराखंड के गांवों की भावना को दर्शाते हैं। पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं पंचायत चुनाव भारत की विकेंद्रित शासन व्यवस्था की रीढ़ हैं, जो 1993 के 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) को संवैधानिक दर्जा देता है। उत्तराखंड, जहां 7,485 ग्राम पंचायतें, 95 ब्लॉक, और 13 जिला पंचायतें हैं, में ये चुनाव ग्रामीण समुदायों के लिए जीवन रेखा हैं। ये गांव वालों को प्रधान , उप-प्रधान और सदस्यों जैसे नेताओं ...

धराली की त्रासदी , जब प्रकृति ने सब्र खो दिया !!

  परिचय: जब प्रकृति ने अपना सब्र खो दिया 5 अगस्त 2025। यह तारीख उत्तराखंड के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है। इस दिन से पहले, उत्तरकाशी जिले में गंगा (भागीरथी) के किनारे बसा खूबसूरत गाँव 'धराली' अपनी सेब के बागानों, शांत वातावरण और हरियाली के लिए जाना जाता था। यह एक ऐसी जगह थी जहाँ लोग शहर के शोर से दूर सुकून के पल बिताने आते थे। लेकिन उस रात, प्रकृति ने अपना वो रौद्र रूप दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। कुछ ही घंटों में, हँसता-खेलता धराली गाँव जलमग्न हो गया, और अपने पीछे छोड़ गया सिर्फ तबाही, खामोशी और अनगिनत सवाल। आज हम उस विनाशलीला को याद करेंगे, उसके कारणों की गहराई में जाएँगे और समझने की कोशिश करेंगे कि धराली की इस जल समाधि से इंसान क्या सबक सीख सकता है। आपदा के पीछे के विस्तृत कारण: यह सिर्फ बादल फटना नहीं था अक्सर ऐसी घटनाओं को केवल "बादल फटने" ( Cloudburst ) का नाम देकर एक प्राकृतिक आपदा मान लिया जाता है। लेकिन धराली की त्रासदी कई वर्षों से की जा रही मानवीय गलतियों और प्रकृति की चेतावनियों को नजरअंदाज करने का एक भयानक परिणाम थी। इसक...

5500/ का चालान बचाइए और आज ही बुक करें कलर कोडेड फ्यूल स्टिकर अपनी कार के लिए।

  5500/ का चालान बचाइए और आज ही बुक करें कलर कोडेड फ्यूल स्टिकर अपनी कार के लिए। परिचय भारत में, विशेष रूप से दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) जैसे क्षेत्रों में, रंग-कोडेड ईंधन स्टिकर वाहनों के लिए अनिवार्य हो गए हैं। यह कदम वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने और पर्यावरण नियमों को लागू करने के प्रयासों का हिस्सा है। हाई सिक्योरिटी रजिस्ट्रेशन प्लेट (एचएसआरपी) के तहत शुरू किए गए ये स्टिकर वाहन के ईंधन प्रकार को दर्शाते हैं, जिससे अधिकारियों को उच्च उत्सर्जन वाले वाहनों की पहचान और नियमन में आसानी होती है, खासकर जब वायु गुणवत्ता खराब हो। यह लेख रंग-कोडेड ईंधन स्टिकर के उद्देश्य, महत्व और भारत में इसे प्राप्त करने की प्रक्रिया को समझाता है। रंग-कोडेड ईंधन स्टिकर का उद्देश्य रंग-कोडेड ईंधन स्टिकर वाहन के ईंधन प्रकार को दृष्टिगत रूप से दर्शाते हैं, जिससे कानून प्रवर्तन और प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों को वाहनों के उत्सर्जन की निगरानी में मदद मिलती है। ये स्टिकर एचएसआरपी सिस्टम का हिस्सा हैं, जो 2012-13 में शुरू हुआ और दिल्ली में अप्रैल 2019 तक सभी वाहनों के लिए अनिवार्य हो गया। य...