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खाली गाँव के आधुनिक लोग !




गाँव बड़ी मुश्किल से जाया जाता है अब, जिंदगी  की  सभी जरूरते अब  शहर से  जुडी  हुई  है इसलिए गाँव का महत्व अब जिंदगी मैं सिर्फ कुछ छुटियो का रह गया है , यह वो माँ की गोद  है जिसमे बच्चा कभी भी जा कर सर छुपा सकता है , कभी उसे अगर कर्मभूमि नकार दे तो उस के पास सदा यह माँ की गोद रहती है , परन्तु हमने इस माँ को क्या दिया कुछ याद नहीं आता , यह वो माँ है जो सदा हमें कुछ न कुछ देती रही है कभी इसने हमसे कुछ नहीं माँगा , रामनगर से शुरू होती पहाड़ की चढ़ाई एक दूसरी दुनिया मैं हमें ले जाती है जहा सब चीजे मुफ्त है , पानी और हवा जीवन का अमूल्य अंग है जिनकी अहमियत हमें प्रदूषित शहरो मैं रह कर मालुम हुई ,यह गाँव को वह स्वरुप है जो प्रदूषित नहीं है परन्तु अब पहाड़ के समाज मैं एक नए प्रकार का प्रदुषण फ़ैल रहा है जो समाज के अलावा देवभूमि कही जाने वाली जमीं और आसमा के लिए भी खतरे से खाली नहीं है !


इस बार गाँव गया और एक नया दुःख साथ ले आया...गाँव के स्वरुप ने बहुत कुछ बदल दियाहै, सबसे बड़ा दुःख इस बात का है की हमारे किशन मास्साब को गाँव को इस वर्ष अलविदा कहना पड़ा! अक्सर लोग गाँव से नौकरी की तलाश मैं बहार जाते है , पर मास्साब इस उम्र मैं गाँव छोड़कर परदेश को निकले है , बहुत दुःख का कारण है यह, यह दुःख उनका ही नहीं बल्कि मुझ जैसे चिन्तक का भी है , जो अभी भी इस गाँव को हरा भरा देखना चाहताहै, आखिर क्या कारण है उनका इस उम्र मैं गाँव को छोड़ने का? उनसे जब एक शाम मैं जब इस विषय पर जिक्र छेड़ा तो मेरी भी आँखों मैं आंसू आ गए और उनकी बात सुनकर मुझे भी लगा कीगाँव से दूर रहना ही उनके लिए अच्छा है, आप ही बताईये एक इंसान जिसने जन्म इस गाँव मैं लिया, जिसने शिक्षा यहाँली , सिक्षा के बाद का रोजगार यहाँ किया, मुझे जैसे अज्ञानी बालक कोभी उन्होंने ज्ञानदेने की कोशिश की, फिर शादी हुई, बच्चे हुए, बच्चो के भी बच्चे हुए, और रिटायर होने के बाद और पहले भी सदा गाँव के बारे मैं सोचा, काम किया , अपने ग्राम को उम्दा और विकसित बनानेकी हर कोशिश की,परन्तु पिछले कुछ सालो से अंधविश्वास ने जिस प्रकार हमारे गाँव को घेर लियाहै उसनेबाकी की रही सही गाँव बनाने की उम्मीद कोतोड़ दिया...पूरा गाँव आज 'कस" की चपेट मैं है , भाई-भाई से नहीं बोलरहा, दुश्मनी और अविश्वास पुरे गाँव मैं फैला हुआ है...उन्होंने ही मुझे बतायाकी हमारे गाँव के उन्नीस मवास मैं से ग्यारह का आपस मैं "कस" है ..तो फिर कैसे रहसकते है इस गाँव मैं..न शादी का मजा रहा गया गाँव मैं न मातम का...बस अब लगता है समय आ गया है कुछ समय के बाद खंडहर मैं तब्दील हो जाएगा उद्लीखन ...अगर इस तरह से इस गाँव की "रीढ़ की हड्डी" कहलाने वाले बुजुर्ग गाँव की इस प्रथा के कारण गाँव छोड़ करचले जायेंगे...मास्साब...बाकी कोई कुछ भी कहे ...आप ने सचमुच इस गाँव के लिए बहुत कुछ किया है, और मैं आपके इस काम की कद्र और इज्जत करता रहूँगा...लोग चाहे भूल जाये...पर उद्लिखानआपके सहयोग को सदा याद रखेगा ! ऐसी हालत हर गाँव की है कोई शिक्षा के बहाने , कोई रोजगार के बहंगे गाँव छोड़ कर गया , उसका उतना दुःख मुझे कभी नहीं हुआ ,जितना मास्साब के विषय पर हुआ , क्योकि उनका सिर्फ और सिर्फ एक कारण है वह है समाज ..वो अगर यहाँ से जा रहे है तो इस विषैले  समाज के कारण जा रहे है !

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