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" आगे ले जाओ "


                                                


पहाड़ का जीवन बड़ा संघर्षशील है , जो वहा रहता है , वहा काम करता है , और वहा बीमार होता है सबके लिए ! विकास शब्द सिर्फ व्यवस्था  की गलियारों मैं गुम हो जाता है , आम जिंदगी मैं वह कही नजर नहीं आता है ! हर मुश्किल का हल ढूढना सचमुच एक पहाड चढ़ने की तरह हो जाता है , रोटी पानी की समस्या तो सदा से रही है पर अभी कुछ समय पहले चिकित्षा व्यवस्था से भी सामना हुआ और तब पता चला की यहाँ भी वही हाल है जो बाकी व्यवस्था का है !
पहाड़ के पिछड़ेपन  कारण एक ही नहीं बहुत से है , जिसमे स्वास्थ्य सेवा का भी बहुत बड़ा योगदान है , सरकारी चिकित्षा व्यवस्था की कमी इसका सबसे बड़ा कारण भी मान सकते है , मैं चौखुटिया ब्लाक का वासी हु , और वह बचपन से एक अस्पताल है वह देखा और वहा इलाज भी करवाया था कभी , जब उत्तराखंड बना नहीं था तब भी मुझे लगता था वहा वही सुविधाए थी जो अब है , और आप यह भी कह सकते है वो और कम हुई है ! उत्तराखंड बने हुए आज चौदह साल हो चुके है परन्तु धरातल पर सब कुछ वैसा ही चल रहा है , कितनी सरकारे आई - गयी पर आम आदमी की मुश्किलों अभी भी वही है जो सदियों पहले थे , आश्चर्य सिर्फ इस बात का है फिर यह बजट का पैसा कहा लग जाता है ?
अभी दो दिन पहले मेरे एक रिश्तेदार की तबियत ख़राब हुई , इन महिला के पेट मैं काफी दर्द हुआ और चौखुटिया गयी और वह प्राइवेट डॉक्टर जो की MBBS नहीं है उन्होंने २ इंजेक्शन लगाये और कहा की दर्द कम हो जायेगा पर वो नहीं हुआ , घर आकर वो रात भर कराहती रही फिर अगले दिन सुबह उनको रानीखेत दिखाया गया , जहा उन्हें फिर २ इंजेक्शन लगाये गए और दवा दी गयी , परन्तु घर पहुचते ही उनका दर्द फिर उनको परेशान करने लगा जिसके बाद उनके 108 बुला कर चौखुटिया के सरकारी अस्पताल मैं भरति करवा दिया गया ,वहा के तत्ल्कालीन चिकितश्क साहब की मैं बड़ी तारीफ करूँगा की उन्होंने मरीज का मौजूदा उपकरणों के साथ काफी अच्छा ध्यान रखा , मैंने दिल्ली से उनसे फ़ोन पर भी बात की , जो आम तौर पर हमें कही और नजर नहीं आता की एक सरकारी डॉ साहब फ़ोन पर उपचार भी बता रहे है मरीज के रिश्तेदारों को , यहाँ वह सब हुआ , परन्तु मरीज का दर्द कम होने का नाम नहीं ले रहा था, अब क्या करे बड़ी चिंता का विषय बना हुआ था , अगर मरीज को इस हालत मैं यहाँ से उठाये तो कहा इलाज के लिए ले जाया जाय ? बड़ा चिंता का विषय था , आपस मैं और डॉ सहाब से बात की , और समझा की पूर्ण इलाज या तो सुशीला तिवारी अस्पताल हल्द्वानी मैं हो सकता है या फिर दिल्ली , हल्द्वानी लगभग १५० किमी दूर था और दिल्ली 400 किमी , चिंता यह सता रही थी की क्या मरीज इतना समय और इतना लम्बा सफ़र तय कर लेगा इलाज के इन्तजार मैं ? 
अब जैसे तैसे मन को मनाया ,और इस निर्णय पर पंहुचा गया की इनको यहाँ से आगे रानीखेत ले जाया जाय , वहा एक प्राइवेट हस्पताल मैं भारती करवाया जाय और फिर आगे की नीति बनायीं जाय , और वही किया गया , इस वक़्त मरीज उस अस्पताल मैं भरती है और इलाज चल रहा है , सिर्फ पैसे का इंतजाम करना बाकी रह गया है , उसका इंतजाम करना है , कुल खर्चा 30 हजार रुपये के करीब आ रहा है !
वो तो परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक है नहीं तो एक जान चली जाती , मेरा सिर्फ एक प्रश्न है , अगर सब मरीजो को आपने आगे ही भेजना है तो फिर क्यों ये अस्पताल खोले हुए है और क्यों इनमे वह सब सुविधाए नहीं है जो एक आम अस्पताल मैं होती है , पहाड़ मैं अगर कोई इलाह चाहिए तो उसके लिए क्यों सिर्फ सुशीला तिवारी अस्पताल हल्द्वानी यां सफ़दरजंग दिल्ली ही क्यों आना पड़ता है , कहा है फिर उत्तराखंड की सरकार, जब सब कुछ दिल्ली ने करना है तो फिर क्यों राज्य की मांग की गयी और क्यों इतना बजट हर साल इस थकी हुई और मरी हुई व्यवस्था मैं डाला जाता है ?

कब यह सरकार जनता के लिए काम करेगी ?? क्या सिर्फ आम जनता अपना काम संघर्ष कर के ही प्राप्त कर सकती है ? बड़े शर्म की बात है ..कब खतम होगी यह  " आगे ले जाओ संस्कृति " ?

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