सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

गढ़वाल भवन का संघर्ष!

साथियो ,
गढ़वाल भवन का संघर्ष मेरे घर तक पहुच गया है , मेरे प्रबुध जनों को मैं बताना चाहता हु की , आज जब मैं गढ़वाल भवन की मीटिंग के बाद घर पंहुचा तो , मेरा सामान भी बहार बिखरा हुआ पड़ा था , सब कुछ घर से बाहर , मैंने घर के अन्दर घुसने की कोशिश की परन्तु मेरी अर्धांगिनी ने मुझे अन्दर आने नहीं दिया , उन्होंने मुझसे दो टूक शब्दों मैं घर से निकल जाने के लिए कहा , कहा इतने दिनों से घर की चिंता नहीं है तुम्हे , जहा दिन भर और रात देर तक रहते हो वही चले जाओ , घर आने की जरुरत नहीं है .....मैं बड़ा हैरान परेशान सोच मैं पड़ गया , सोचने लगे कैसे मनाऊ अपनी प्राण प्यारी को , बहुत मिन्नतें की , बहुत प्यार जताने की कोशिश की परन्तु उस पर अभी तक कोई अशर नहीं हो रहा है , कुछ नए -नए सीखे हुए नारे भी लगाने की कोशिश की , उसको यह भी दलील दी की इतने सालो से हां साथ है , दो बच्चे भी है , उसको भारतीय संस्कृति की भी दलील दी की हमारे देश मैं ऐसा नहीं होता, पति को ऐसे सामान के साथ बहार नहीं कर देते , सात जनम के साथी है हम और सात फेरे हमने साथ लिए है ....पर उसका गुस्सा है की शांत नहीं हो रहा .....अब साथियो काफी गहन चिंतन के बाद मैं इस नतीजे पर पंहुचा हु की .....अब मुझे भी वो धरना यहाँ शुरू करना पड़ेगा ...जिस से मेरा प्रणय सूत्र बच सके ...जरुरत पड़ेगी तो यहाँ भी भीड़ और मीडिया की जरुरत पड़ सकती है ....मैं यह सब छुपकर इसलिए लिख रहा हु ...कही आपके घर का भी यही हाल न हो जाए ...इसलिए आन्दोलन मैं अगली बार जरुर अपनी श्रीमती जी को लाना नहीं तो घर मैं भी धरना देना पद सकता है ..बस मैं जा रहा हु आन्दोलन शुरू करने.......बोल पत्नी व्रता ..पति की जय...

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उत्तराखंड में पंचायत चुनाव: गांव के विकास की धड़कन

  उत्तराखंड में पंचायत चुनाव: गांव के विकास की धड़कन पंचायत चुनाव, या पंचायत चुनाव , भारत में ग्रामीण लोकतंत्र की नींव हैं, जो गांवों को उनके भविष्य को संवारने का अधिकार देते हैं। उत्तराखंड में, हिमालय की गोद में बसे गांवों के लिए ये चुनाव विशेष महत्व रखते हैं। जुलाई 2025 में होने वाले उत्तराखंड पंचायत चुनाव की सरगर्मी शुरू हो चुकी है। प्रधानों (ग्राम प्रमुख) से लेकर समग्र विकास तक, ये चुनाव ग्रामीण उत्तराखंड के लिए गेम-चेंजर हैं। आइए जानें कि पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं, ये गांवों के विकास को कैसे बढ़ावा देते हैं, और 2025 के चुनावों से जुड़े कुछ रोचक किस्से जो उत्तराखंड के गांवों की भावना को दर्शाते हैं। पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं पंचायत चुनाव भारत की विकेंद्रित शासन व्यवस्था की रीढ़ हैं, जो 1993 के 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) को संवैधानिक दर्जा देता है। उत्तराखंड, जहां 7,485 ग्राम पंचायतें, 95 ब्लॉक, और 13 जिला पंचायतें हैं, में ये चुनाव ग्रामीण समुदायों के लिए जीवन रेखा हैं। ये गांव वालों को प्रधान , उप-प्रधान और सदस्यों जैसे नेताओं ...

धराली की त्रासदी , जब प्रकृति ने सब्र खो दिया !!

  परिचय: जब प्रकृति ने अपना सब्र खो दिया 5 अगस्त 2025। यह तारीख उत्तराखंड के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है। इस दिन से पहले, उत्तरकाशी जिले में गंगा (भागीरथी) के किनारे बसा खूबसूरत गाँव 'धराली' अपनी सेब के बागानों, शांत वातावरण और हरियाली के लिए जाना जाता था। यह एक ऐसी जगह थी जहाँ लोग शहर के शोर से दूर सुकून के पल बिताने आते थे। लेकिन उस रात, प्रकृति ने अपना वो रौद्र रूप दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। कुछ ही घंटों में, हँसता-खेलता धराली गाँव जलमग्न हो गया, और अपने पीछे छोड़ गया सिर्फ तबाही, खामोशी और अनगिनत सवाल। आज हम उस विनाशलीला को याद करेंगे, उसके कारणों की गहराई में जाएँगे और समझने की कोशिश करेंगे कि धराली की इस जल समाधि से इंसान क्या सबक सीख सकता है। आपदा के पीछे के विस्तृत कारण: यह सिर्फ बादल फटना नहीं था अक्सर ऐसी घटनाओं को केवल "बादल फटने" ( Cloudburst ) का नाम देकर एक प्राकृतिक आपदा मान लिया जाता है। लेकिन धराली की त्रासदी कई वर्षों से की जा रही मानवीय गलतियों और प्रकृति की चेतावनियों को नजरअंदाज करने का एक भयानक परिणाम थी। इसक...

5500/ का चालान बचाइए और आज ही बुक करें कलर कोडेड फ्यूल स्टिकर अपनी कार के लिए।

  5500/ का चालान बचाइए और आज ही बुक करें कलर कोडेड फ्यूल स्टिकर अपनी कार के लिए। परिचय भारत में, विशेष रूप से दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) जैसे क्षेत्रों में, रंग-कोडेड ईंधन स्टिकर वाहनों के लिए अनिवार्य हो गए हैं। यह कदम वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने और पर्यावरण नियमों को लागू करने के प्रयासों का हिस्सा है। हाई सिक्योरिटी रजिस्ट्रेशन प्लेट (एचएसआरपी) के तहत शुरू किए गए ये स्टिकर वाहन के ईंधन प्रकार को दर्शाते हैं, जिससे अधिकारियों को उच्च उत्सर्जन वाले वाहनों की पहचान और नियमन में आसानी होती है, खासकर जब वायु गुणवत्ता खराब हो। यह लेख रंग-कोडेड ईंधन स्टिकर के उद्देश्य, महत्व और भारत में इसे प्राप्त करने की प्रक्रिया को समझाता है। रंग-कोडेड ईंधन स्टिकर का उद्देश्य रंग-कोडेड ईंधन स्टिकर वाहन के ईंधन प्रकार को दृष्टिगत रूप से दर्शाते हैं, जिससे कानून प्रवर्तन और प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों को वाहनों के उत्सर्जन की निगरानी में मदद मिलती है। ये स्टिकर एचएसआरपी सिस्टम का हिस्सा हैं, जो 2012-13 में शुरू हुआ और दिल्ली में अप्रैल 2019 तक सभी वाहनों के लिए अनिवार्य हो गया। य...