सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मध्यकाल के बाज्यू से वर्तमान के डैड का सफ़र ..!





शब्दों का सफ़र आज मैंने सोचा " बाज्यू " से शुरू किया जाय , मध्य काल मैं जन्मे  मेरे जैसे कई साथी अपने आप से इस लेख को जोड़ पाएंगे , यह वह समय था जब बाज्यू  किसी भी परिवार मैं सबसे शक्तिशाली हस्ती होती थी , पुरुष प्रधान जमाना था , सब खर्चे करना , बच्चो को अच्छी जिंदगी देना, परिवार को किसी चीज की कमी न होने देना यह सब " बाज्यू" की कर्मभूमि थी ! नारी को बराबर का दर्जे की बात अब होती है , उस वक़्त  "इजा" शब्द उतना शक्तिशाली नहीं होता था  वह सदा प्यार से भरा एक व्यक्तित्व होता था , जिसके आँचल मैं हम कभी भी सिर छुपा कर हमें सब कठिनाईयो का हल  मिल जाता था ! और एक हिसाब से यह ठीक भी था , क्योकि परिवार मैं सिर्फ एक ही को कठोर होना चाहिए अगर दोनों ही इस प्रवृति के हो गए तो बच्चो की तो लग गयी !

ऐसा ही मेरा परिवार था , बड़ा होने के नाते , आमा और इजा का लाडला होना स्वाभाविक था , परन्तु यह उम्मीद बाज्यू से रखना मुर्खता लगती थी ! बाज्यू अक्सर गुस्से मैं रहते थे, , किसी भी बात पर डांट सकते थे , किसी भी बात पर थप्पड़ मार सकते थे , और इन सब क्रियायो के क्रियान्वन मैं आप उनसे कोई सवाल नहीं पूछ सकते थे, क्योकि उस ज़माने के बाज्यू और बेटे के रिश्तो मैं कोई सीधा संवाद नहीं होता था , बहुत बार ऐसा होता था की ग़लतफ़हमी मैं ही पिट जाते थे , क्योकि उस  ज़माने के बाज्यू सिर्फ थप्पड़ और  लात से बात करते थे , मुह खोलने का वो कष्ट नहीं करते थे ! 

पलायन का दर्द मेरे परिवार ने भी सहा , पहले पलायन पुरे परिवार नहीं होता था , सिर्फ पिता और लडको का होता था , यह तो अब पुरे परिवार का पलायन होता है , पहले ऐसा नहीं था, कमाई भी कम थी , और वह साल मैं एक बार सिर्फ घर जाने के बराबर ही होती थी ! तन्खाव्ह काफी कम होती थी , और रिश्तेदारी लम्बी होती थी इसलिए साल मैं एक ही घर का चक्कर लगता था ! पढाई के लिए मैं भी दिल्ली आया , और आमा . इजा को गाँव मैं छोड़ना पड़ा , अब " बाज्यू " ही सब थे , माँ -पिता दोनों , किराये के मकान मैं रहते थे , इसलिए शिकायत पर जीरो टॉलरेंस थी , कोई भी शिकायत कर सकता था , और कभी भी पिटाई हो सकती थी , शिकायत करने वाले की मनसा बाज्यू नहीं देखते थे , वो सिर्फ थप्पड़ और लात तैयार रखते थे , जैसे ही शिकायत हुई , पिटाई शुरू...
यहाँ  तक की एक बार मेरे मुह मैं बहुत बड़ी चोट लगी , पिताजी को फ़ोन किया गया वो जल्दी से फैक्ट्री से घर आये और मुझे बिस्तर पर चारो तरफ से गली के लोगो ने घेर रखा था, उन्होंने साइकिल की चाभी और रोटी का डब्बा ऊपर रखा और दो थप्पड़ सबके सामने जड़ दिए और कहा गलती इसकी ही होगी तभी इसको चोट लगी है .जबकि मेरी गलती कही भी नहीं थी ....पर क्या करे पीड़ित  की तो कभी सुनी नहीं जाती थी उस ज़माने मैं...! एक वह दौर था .....लेकिन एक  बात आपको इस लेख से लगा रहा होगा की बाज्यू बड़े जल्लाद टाइप के होते थे , परन्तु ऐसा हरगिज़ नहीं था , यह उनके प्यार करने का ढंग ही ऐसा था , बाय डिफौल्ट बाज्यू का नेचर ऐसा होता था .....उस चोट के बाद उन्होंने काफी प्यार भी बरसाया , पर प्यार का ढंग उनका अपना था  हिटलर टाइप , इसलिए प्यार भी हिटलर टाइप का था ..बिलकुल पक्का और कठोर !

बड़े हुए शादी हुई बच्चे हो गए ..और हम भी बाप बन गए ...अब हमारा जमाना आ गया , और अब हम एक नए ज़माने के डैडकरण से झुझ रहे है , आज मेरे बच्चे , एम्पावरमेंट  की बात करते है , अधिकारों की बात करते है , लात थप्पड़ तो दूर आप उनको डाट भी नहीं सकते ! कभी कभी दिल करता है हम भी बाज्यू बन गए है , और उसके साथ हमें वही बाज्यू वाले अधिकार मिल गए है जो मेर्रे बाज्यू के थे , थप्पड़ और लात पर काम करने की सोचता हु, पर तभी छोटी बिटिया पूछने लगती है , आप ने मुझे क्यों और किस बात पर डाटा ? मेरी क्या गलती है , आजकल ऐसे ही होता है , मैं उसकी क्लास लगाऊ उस से पहले वो मेरे क्लास लगा देती है और इस सब मैं , मैं थप्पड़ वाली बात भूल जाता हु,.....अब पिछले साल से वह कुंग- फु भी सीख रही है और कभी - कभी वह उछल कर एक दो किक भी रशीद कर देती है , और उसकी किक भी इतनी पैनी हो गयी है की अब दर लगने लग गया है , कही कभी झगडा हुआ तो पता चला उसने मुझे ही धुन दिया है .....!

यह है मध्यकाल के बाज्यू की विडम्बना , अपने बाज्यू से पिटे सोचा जब अपने बच्चे होंगे तब उन पर अपनी कसर निकालूँगा , पर अब जमाना इतना बदल गया है की हर डांट पर भी इन्क्वारी बिठा देते है आज कल के बच्चे और डैड  अब कभी बाज्यू नहीं बन पाएंगे...जय हो !

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उत्तराखंड में पंचायत चुनाव: गांव के विकास की धड़कन

  उत्तराखंड में पंचायत चुनाव: गांव के विकास की धड़कन पंचायत चुनाव, या पंचायत चुनाव , भारत में ग्रामीण लोकतंत्र की नींव हैं, जो गांवों को उनके भविष्य को संवारने का अधिकार देते हैं। उत्तराखंड में, हिमालय की गोद में बसे गांवों के लिए ये चुनाव विशेष महत्व रखते हैं। जुलाई 2025 में होने वाले उत्तराखंड पंचायत चुनाव की सरगर्मी शुरू हो चुकी है। प्रधानों (ग्राम प्रमुख) से लेकर समग्र विकास तक, ये चुनाव ग्रामीण उत्तराखंड के लिए गेम-चेंजर हैं। आइए जानें कि पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं, ये गांवों के विकास को कैसे बढ़ावा देते हैं, और 2025 के चुनावों से जुड़े कुछ रोचक किस्से जो उत्तराखंड के गांवों की भावना को दर्शाते हैं। पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं पंचायत चुनाव भारत की विकेंद्रित शासन व्यवस्था की रीढ़ हैं, जो 1993 के 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) को संवैधानिक दर्जा देता है। उत्तराखंड, जहां 7,485 ग्राम पंचायतें, 95 ब्लॉक, और 13 जिला पंचायतें हैं, में ये चुनाव ग्रामीण समुदायों के लिए जीवन रेखा हैं। ये गांव वालों को प्रधान , उप-प्रधान और सदस्यों जैसे नेताओं ...

धराली की त्रासदी , जब प्रकृति ने सब्र खो दिया !!

  परिचय: जब प्रकृति ने अपना सब्र खो दिया 5 अगस्त 2025। यह तारीख उत्तराखंड के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है। इस दिन से पहले, उत्तरकाशी जिले में गंगा (भागीरथी) के किनारे बसा खूबसूरत गाँव 'धराली' अपनी सेब के बागानों, शांत वातावरण और हरियाली के लिए जाना जाता था। यह एक ऐसी जगह थी जहाँ लोग शहर के शोर से दूर सुकून के पल बिताने आते थे। लेकिन उस रात, प्रकृति ने अपना वो रौद्र रूप दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। कुछ ही घंटों में, हँसता-खेलता धराली गाँव जलमग्न हो गया, और अपने पीछे छोड़ गया सिर्फ तबाही, खामोशी और अनगिनत सवाल। आज हम उस विनाशलीला को याद करेंगे, उसके कारणों की गहराई में जाएँगे और समझने की कोशिश करेंगे कि धराली की इस जल समाधि से इंसान क्या सबक सीख सकता है। आपदा के पीछे के विस्तृत कारण: यह सिर्फ बादल फटना नहीं था अक्सर ऐसी घटनाओं को केवल "बादल फटने" ( Cloudburst ) का नाम देकर एक प्राकृतिक आपदा मान लिया जाता है। लेकिन धराली की त्रासदी कई वर्षों से की जा रही मानवीय गलतियों और प्रकृति की चेतावनियों को नजरअंदाज करने का एक भयानक परिणाम थी। इसक...

5500/ का चालान बचाइए और आज ही बुक करें कलर कोडेड फ्यूल स्टिकर अपनी कार के लिए।

  5500/ का चालान बचाइए और आज ही बुक करें कलर कोडेड फ्यूल स्टिकर अपनी कार के लिए। परिचय भारत में, विशेष रूप से दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) जैसे क्षेत्रों में, रंग-कोडेड ईंधन स्टिकर वाहनों के लिए अनिवार्य हो गए हैं। यह कदम वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने और पर्यावरण नियमों को लागू करने के प्रयासों का हिस्सा है। हाई सिक्योरिटी रजिस्ट्रेशन प्लेट (एचएसआरपी) के तहत शुरू किए गए ये स्टिकर वाहन के ईंधन प्रकार को दर्शाते हैं, जिससे अधिकारियों को उच्च उत्सर्जन वाले वाहनों की पहचान और नियमन में आसानी होती है, खासकर जब वायु गुणवत्ता खराब हो। यह लेख रंग-कोडेड ईंधन स्टिकर के उद्देश्य, महत्व और भारत में इसे प्राप्त करने की प्रक्रिया को समझाता है। रंग-कोडेड ईंधन स्टिकर का उद्देश्य रंग-कोडेड ईंधन स्टिकर वाहन के ईंधन प्रकार को दृष्टिगत रूप से दर्शाते हैं, जिससे कानून प्रवर्तन और प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों को वाहनों के उत्सर्जन की निगरानी में मदद मिलती है। ये स्टिकर एचएसआरपी सिस्टम का हिस्सा हैं, जो 2012-13 में शुरू हुआ और दिल्ली में अप्रैल 2019 तक सभी वाहनों के लिए अनिवार्य हो गया। य...