पलायन अब दर्द का कारण नहीं रहा , गाँव भी शहर हो गए है , और गाँव मैं हम परदेशी ! संबंधो , रिश्तो मैं प्यार की कमी , गर्मजोशी का न होना , सफलता को सिर्फ अच्छी कमाई से जोड़ना , ये कुछ कारण है , जो इस दर्द को कम किये देते है ! गाँव जाना हर बार होता है , इस बार भी हुआ परन्तु वो अपनापन कही न कही खोया हुआ नजर आया ! रिश्तो मैं अब वो खून नहीं बहता , पैसे ने सब रिश्तो को खोखला कर दिया है !
समाज आज जिसकी हम बात करते है . वो सिर्फ आपके फ़ोन की फ़ोन बुक या फेसबुक के मित्र ता सूचि तक ही सीमित रहा गया है ! आज समाज की कोई परिभाषा धरातल पर नहीं रह गयी है , समाज भी आपका तभी है , जब आप समाज की जरुरत पूरी करते है , अन्यथा आप अकेले ही रहते है , और वैसे इसमें बुरा भी क्या है , आखिर अकेले आये है , अकेले ही जायेंगे ..तो फिर साथ की चिंता क्यों ?
गाँव मैं जाकर लगा की यह कभी मेरा गाँव था , जन्म लिया , बड़े हुए और चल दिए इस से दूर , पढाई और करियर बनाने , क्योकि यहाँ के बच्चे न तो पढाई करते है और न उनका कोई करियर होता है , यह सोच थी लेकिन अब वो बदल रही है , गाँव के बच्चे भी शहर के साथियो की तरह जीवन मैं आगे बढ़ रहे है , पर सफलता की इस दौड़ मैं रिश्ते कही खो से गए है , आज गाँव जाने का कारण अपने सगे सम्भंधियो से मिलने नहीं बल्कि जागेर होती है , प्यार न बढ़ो से रहा गया है , न छोटे - भाई बहनों से , एक लडाई है अपने आपको दिल्ली मैं रखने की , !
अपनी जड़ो से जुदा होकर रहने का दुःख है पलायन का , पर यह दुःख सहने के लिए हम फिर भी तैयार है , क्योकि समाज हमें अब गाँव मैं भी नहीं मिलता , हम वह परदेशी हो गए है , दिल्ली मैं तो सिखाया ही समाज से दूर रहना, यहाँ भी जॉइंट फॅमिली से नयूक्लेअर फॅमिली का चलन बढ़ रहा है , और समाज इस हाई- टेक ज़माने मैं सिर्फ अपनी इमीडियेट परिवार तक सीमित रह गया है ! पहाड़ अब सिर्फ चित्रों मैं , कंप्यूटर के वाल पेपर मैं सिमटकर रह गया है , कर्मभूमि ही अब घर है , यही समाज है और यही जीवन है !
जरूरतों का संसार फैला है चारो तरफ और हमने अपनी जरूरतों को इतना बड़ा कर दिया है की , हम पूरा दिन और रात इनको पूरा करने मैं लगा देते है , जरूरतों की भूख कभी खत्म नहीं होती और इस भूख मैं हम अपने जीवन को न्योछवर कर रहे है , जीवन का मुख्य उद्देश्य भूल गए है हम , जिस दिन हमें यह उद्देश्य समझ आ जायेगा उस दिन , हमें इन रिश्तो मैं भी प्यार नजर आने लगेगा , और साथ ही पलायन का दर्द भी हमें दुःख देने लगेगा ...!
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