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मेरी नाख का सिंगाड़ मेरे बचपन का साथी ..!


उंगलिया अनायास ही चलने लग जाती है , जब पहाड़ का ध्यान आता है , पहाड़ की बात होती है और पहाड़ के बारे मैं लिखने का दिल करता है तो , दिमाग  उंगलिया और दिल सब एक हो जाते है ,पहाड़ के बारे मैं क्या लिखा जाय, कभी कभी सब सामान्य सा लगता है परन्तु जैसे ही उसे लेखनी से जीवित किया जाता है तो एक अद्भुत से चीज जो सबके दिल को छु लेती है उसका जनम होता है , परन्तु यह हर आलेख मैं हो जाए यह संभव नहीं है , बचपन जिंदगी का सबसे अच्छा पल होता है और ज्यादा तर उसके बारे मैं लिखने पर मन खुश होता है , इस बहाने उसे याद भी कर लिया जाता है , आज मन मैं कुछ ऐसा ही विचार चल रहा है !

४-५ वी कक्षा की बात थी , तब हाइजन ( शरीर की सफाई) के ऊपर गाँव मैं ध्यान नहीं दिया जाता था, नहाने का कोई दिन निश्चित नहीं , टूथ पेस्ट तो अब चले है , तब जब  कभी दिल करता था तो कोयले से दांत साफ़ किये जाते थे  अन्यथा उसकी भी कोई आवश्यकता नहीं थी ! मेरा अपना शरीर की सफाई पर बिलकुल ध्यान नहीं होता था , बचपन मैं जब पैदा हुआ तो अचानक साथ मैं नाख मैं सिंगाड़ पता नहीं कब आया , और फिर मैं जैसे - जैसे बड़ा होता गया वह मेरे साथ साथ और तेजी से बहता गया, नाख पुरे दिन भर भरी रहती थी , वह एक सफ़ेद बर्फ की तरह नाख के दोनों छेदों मैं अपना राज समझकर बारो महीने पसरी रहती थी , दिन भर वह साथ थी तो मक्खिया भी भिन-भिन कर नाक से लेकर मुह तक अपने आप को पार्क करके रखती थी , मेरी नाख मक्खियों  की पार्किंग का काम करती थी ! उस नाख को साफ़ करने के लिए कभी कभी मम्मी "चाव " दे देती थी नहीं तो कमीज की बाजुओ से भी इमरजेंसी मैं काम चलाना पड़ता था, लेकिन वह सिर्फ एक्सट्रीम इमरजेंसी मैं , जब स्कूल मैं अध्यपक ने कहा तो , बचपन मैं साथी कोई ज्यादा नहीं थे, इसलिए मैं क्लास मैं भी साथी मुझे मेरी नाख के कारण दुरी बना कर बैठते थे , और मैं मक्खियों के छाते के साथ मस्त रहता था !

कभी - कभी जब कोई बड़ा त्यौहार आता था , तभी इजा नहलाती थी और तभी मेरी नाख की सहमत आती थी, बहुत डाट और  गालियों के बीच नाख की सफाई होती थी , और नहाने की बाद कुछ दिन नाख बड़ी हलकी और लाल से दिखती थी ,फिर कुछ दिन के बाद फिर नाख मैं शीर फूट जाती थी और सिंगाड़ से फिर नाख भर जाती थी, मेरी और इस सिंगाड़ के बीच बहुत बड़ा रिश्ता था , जिसके कारण दोस्त मेरे नजदीक कम ही आते थे !

दिल्ली आने से पहले नाख का सिंगाड़ और मक्खिया गाँव मैं ही छोड़ के आना पड़ा उनका पलायन मेरे साथ नहीं हो पाया , और फिर यहाँ पिताजी ने मार- मार कर सब बदन की सफाई अपने हाथो ले ली , फिर क्या था हम चमक गए , स्मार्ट हो गए , सूर्यवंशी है तो तेज चेहरे पर नजर आने लगा, १२ वि कक्षा के बाद गाँव की छुट्टी गया था तभी एक पुराना मित्र मिल गया जो मेरे साथ छठी मैं पड़ता था, मैंने उसे पहचान लिया था , और बस मैं बैठे थे , बाते होने लगी ,,,उन्होंने मुझसे पूछा कहा के हो , मैंने उसे अपने गाँव का नाम बता दिया , उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा " म्योर ल एक दगडी छि, उडेखानक, सिंगणु, दिन भर क्लास म माख भगाड़ पाई रनेर होय , और पुर कमीज बोह , सिंगाड़ल सानी हाई कौ, इतु पलीत hoye " उसने जब ये कहा मेरे मन मैं बड़ी हंसी छुटी, मैं ने फिर हस्ते हुए कहा ...अबे वो मैं ही हु .....वह यह सुन कर विश्वास नहीं कर पाया ...., वो तपाक से बोला ," नहीं भाई साहब आप झूठ बोल रहे हो , आप इतने स्मार्ट हो वो तो बिलकुल पलीत था " ..मैंने कहा भुला ये सब दिल्ली का कमाल है , मैं वही हू यह सुनकर मित्र हैरान हो गया ...पर फिर कुछ समय के बाद वह भी मुश्कराने लगा ,,और फिर गले मिला...!

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