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आपदा ..क्या सीखा ..क्या किया ...!


आज केदारनाथ फिर से सबकी जुबा पे है , आँखे फिर नाम हो गयी है , वो हादसा कभी भी नहीं भुलाया जा सकता ! आपदा फिर से टीवी स्क्रीन पर जीवित हो उठी है , लेकिन यह आपदा पिछले साल की आपदा से ज्यादा भयानक और भयवाह है , केदारनाथ तो सिर्फ इस आपदा का चिन्ह्मात्र है यह गढ़वाल और कुमाओं मैं धारचूला तक फैली है ! जो घटना जून के महीने मैं हुई और उसमैं बहुत लोग स्वर्ग सिधारे , बेघर हुए, घायल हुए, लेकिन अब बात करे उनकी जिनका जीवन तो बच बया पर फिर भी वो मुर्दा की तरह है , परिवार टूटे, सगे- सम्बन्धी नहीं रहे, अपंग हो गए , सिर्फ सांस लेना जिंदगी नहीं होता, और ये लोग सिर्फ वही कर रहे है ! हमारी सरकार, लचर व्यवस्था क्या इनके जीवन को दुबारा खड़ा कर पायेगी ? मीडिया के कैमरे ने हमें बताया की क्या किया हमारे व्यवस्थापको ने पिछले एक साल मैं ? अभी कुछ समय पहले चुनाव हुए , उसमे यह मुद्दा कही नहीं था , और आपदा उत्तराखंड की मीडिया के लिए कही विषय नहीं है , वो तो नेशनल मीडिया ने जा कर यह हल चल मचाई है , अन्यथा सब ठीक चल रहा था., .....एक खोखली व्यवस्था है जिसके कारण इस आपदा मैं जाने गयी , और आगे भी जाने जाती रहेंगी .

इस आपदा के दो पहलु है , एक जो जून के उन तीन दिनों मैं हुआ , जिसे कुछ लोग दैविक आपदा का नाम दे रहे है , पर मेरा मानना है , देवता को अपने बुरे कामो का दोष देना ये सिर्फ भारत मैं ही हो सकता है , विकास और अंधाधुन्द निर्माण , नदी छेत्र मैं इस आपदा को भयावह बना ने मैं काफी कारगर सिद्ध हुए, अगर हम केदारनाथ के आस पास के छेत्र को सही तरीके से विकसित करते और नदी की जगह पर भवन निर्माण नहीं करते तो शायद जाने कम जाती ! आपदा आई और तीन दिन के बाद थम गयी !

दूसरा पहलु जो पहले से भी मुख्य है उसपर अब बात होनी चाहिए, उत्तराखंड मैं आपदाए आम है , और यह आपदा अंतिम होगी वह भी गलत होगा, इस आपदा ने हमें बहुत कुछ सिखाया तो है , पर हम सब कुछ बड़ी जल्दी भूल जाते है ! हमारा आपदा प्रभंदन विभाग बिलकुल अपंग था , उसके बाद आनन् - फानन मैं हमने बहुत कुछ सेना और मीडिया के प्रेशर मैं किया , और एक बार मीडिया के कैमरे वह से बाहर निकले , प्रशाशन भी सब कुछ वैसे ही छोड़ कर आ गया , क्योकि अब कैमरे नहीं है तो फिर काम कौन करे , राजनेता तो देहरादून चले गए , पिछले एक दो दिन की लगातार कवरेज ने हमें दिखाया की वहा क्या नहीं हुआ , और यह सब चलता रहेगा , मीडिया TRP की दौड़ मैं है , नेता वोट की दौड़ मैं है , अब ये लोग वैसे भी जिन्दा नहीं है . तो फिर कहा इनका वोट होगा , फिर नेता क्यों काम करे ...!
...श्रीमान बहुगुणा ने सही कहा था ....की सिर्फ देवभूमि का देवता ही मालिक है इन बेसहरा लोगो का ...क्योकि नेता तो खाली अपनी सरकारेबचाने आते है उत्तराखंड मैं...!

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