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पिता जी ....पितृ दिवस की हार्दिक बधाई !




पिता जी , एक ऐसा व्यक्तित्व जिसे हम  अक्सर उतना क्रेडिट नहीं देते  जितना उनको मिलना चाहिए , और शायद मैं इसमें गलत होऊ, पर मैं यहाँ अपनी बात कर रहा हु ! सबसे बड़ा बेटा होना और उतनी ही बढ़ी उम्मीद , यह अक्सर हमारे समाज का एक अनकहा सच है , बड़ा बेटा अगर कामयाब हो जाये तो बाकी सब परिवार  अपने आप संभल जायेगा , यह मान्यता है परिवार की , ऐसा कुछ मेरे साथ भी हुआ , बड़ा था , दादी और माँ का दुलारा था , लेकिन "बाबु " कहता था मैं पिताजी को , क्योकि तब तक " पापा" और " डैडी" शब्दों का अविष्कार नहीं हुआ था पहाड़ मैं ! मेरी बचपन की यादे बाबु के साथ खास नहीं थी , क्योकि बचपन के शुरआती साल पहाड़ मैं गुजरे थे , और पापा दिल्ली मैं काम करते थे , पांचवी तक सब ठीक चल रहा था , क्योकि पढाई का मतलब तब तक ज्ञान नहीं पास होना होता था , गाँव मैं मास्टरजी हल चलाते- चलाते पास कर देते थे , इस लिए पढाई कभी मुश्किल नहीं रही ! बचपन बड़ा अच्छा कट रहा था , सबसे बड़े थे, आमा इजा, का प्यार था , दिन भर सिंघाड़ नाक मैं रहता था , और मक्खियो ने  कभी मुझे दोस्त की जरुरत महसूस न होने दी , वो सदा मेरे नाक, मुह और कमीज की बाह पर बैठी रहती थी ! खैर अब तक  सब ठीक चल रहा था , और पांचवी से छठी तक पंहुचा तो गाँव से चौखुटिया के इन्टर कॉलेज मैं एडमिशन हो गया , वहा भी सब ठीक था , पर आलू- मटर ने मजबूर कर दिया मुझे और जेब- खर्ची की एवज मैं फीस की मटर खा गए , उसके बाद स्कूल जाना नहीं हुआ और सीधा ७ विषय मैं से ६ विषय मैं फ़ैल हो कर दिल्ली आगमन हो गया...!

अमा - इजा गाँव मैं बाबु के साथ दिल्ली , दो छोटे कमरे और १६ लोगो का परिवार, घर कम प्लेटफोर्म ज्यादा लगता था , चौथी मंजिल , पानी की किल्लत वह जमाना था जब पानी की मोटर नाम की कोई चीज नहीं होती थी , सुबह २ घंटे पानी आता था , लेकिन वह अपनी ताकत से सिर्फ २ मंजिल तक चढ़ पाता था , हम तो चौथी पर थे ! अपना पर्सनल हैण्ड पंप लगा रखा था , और एक ड्रम सदा उसके नीचे रहता था , मेरे काम सुबह उठ कर उस ड्रम को रोज भरना होता था , बाबु खाना बनाते सामने और बाकी लोग अपने अपने काम मैं लगे होते, बाबु मेरा हर काम खुद कर के जाते , पढाई के अलावा ! दिन भर इधर - उधर घूमना फिर किताब शाम को ही खुलती थी , क्रिकेट खून मैं बसा हुआ था , दिन भर बैट बाल लेकर हम रन ही बनाते रहते , हमने उन गलियों मैं तेंदुलकर से भी ज्यादा रन बनाये होंगे !  शरारते साथ चलती थी , गाँव से आते ही , गणित मैं फ़ैल हुए और खुद ही रिपोर्ट कार्ड साइन कर के दे दी , सोचा पिता जी को पता नहीं चलेगा , वो तो पडोसी ने सामजिक समझदारी दिखाई और पिताजी को रिपोर्ट कार्ड के बारे मैं ज्ञान दिया , फिर क्या था , माहौल घर मैं तैयार हुआ , और डंडे को तेल पिलाया गया , मुझे मुर्गा बना कर डंडे के द्वारा रिपोर्ट कार्ड के बारे मैं पूछा गया , अब थर्ड डिग्री के आगे तो अच्छे अच्छे लोग बोल जाते है , मैं तो नौसिखिया ही था,और जुर्म काबुल किया, इस प्रकार की पिटाई अक्सर हर पंद्रह दिन के दौरान हो जाती थी और इस से घर का माहौल भी बिलकुल सही रहता था !

बचपन मैं जो बाबु से बात सीखी वह ज्यादातर लोगो पर उस समय पर लागु होती थी , और वह थी , बाबु लोग उस वक़्त मुह से काम कम और  हाथो से बात ज्यदा करते थे , कोई भी बात बुरी लगे तो झट से थप्पड़ पद जाता था , और आधे समय तो ये समझ ही नहीं आता था की ये थप्पड पड़ा क्यों , एंग्री यंग मन का दौर था , इसलिए बाबु लोग उस वक़्त कभी रीज़न नहीं बताते थे थप्पड़ का , और न ही हम इतनी हिम्मत कर पाते की आखिर थप्पड़ पड़ा तो पड़ा क्यों , बस हम इस बात से खुश होते चलो जितना पड़े कम पड़े , क्योकि थप्पड़ो का हिसाब नहीं रखा जाता था !  एक बार  का वाकिया था , डीटीसी बस मैं चढ़ते हुए मैं अचानक नीचे गिर गया था , तो गाडी का अगला टायर मेरे पाँव के पंजे पर आ गया और मैं बस मैं जैसे - तैसे चढ़ा और घर पहुचते - पहुचते पाव पूरा सूज गया , रात के ११ बज गए बाबु ने जब यह देखा उनसे रहा नहीं गयी पहले उन्होंने एक थप्पड़ रशीद किया और फिर सरसों के तेल से पुरे पाँव मैं मालिश की , और यह मालिश काफी समय तक चलती रही , तब पहली बार मुझे लगा की बाबु मुझे प्यार भी करते है , नहीं तो सिर्फ यह लगता था जैसे बाबु ने सिर्फ मुझे पीटने का ही  ठेका ले रखा है ,  जैसे तैसे बचपन बीता , बड़े हुए , शादी हुए, दिल्ली मैं  ही हुई, बाबु बड़े खुश उस वक्त दिल्ली मैं शादी होना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी , वो तो अच्छा हुआ श्रीमती जी की भाभी का जो जाम हैंडपंप को नलका समझ कर अपनी ननद हमें दे गयी , आपको मालूम है पहाड़ी समाज उस वक़्त का , सिर्फ अपना घर होना चाहिए दिल्ली मैं चाहे वो किसी भी  कच्ची कॉलोनी मैं क्यों न हो !
बाबु बड़े खुश थे शादी करके मेरी, लेकिन कुछ दिन तक यह ख़ुशी रही , बहु अच्छी थी , अब मेरी बीवी थी , कैसे बुराई कर सकता हु , पर बाबू को उनकी हाथ की बनी हुई रोटिया समझ नहीं आ रही थी , उनको लगता था की रोटिया किनारों से कच्ची रहती है , फिर क्या ...SIT बिठाई गयी , जिसमे मैं , और दादी थे , निर्णय हुआ की बहु आटा गूंद कर बाकी सबके लिए रोटिया बना कर रख देगी और बाबु अपनी रोटी खुद बनायेंगे..! यही जिंदगी के खट्टे - मीठे अनुभव थे , बाबु ने सब कुछ किया , पर उनके प्यार को समझना बड़ा मुश्किल था , क्योकि उस रिश्ते मैं बात चीत नहीं हुआ करती थी सिर्फ एक्शन का बोल - बाल था ! शादी के बाद मेरे और उनके बीच अंतर काफी कम हुआ , हम बिलकुल दोस्त बन गए , और एक बार मैंने उनके साथ दारू पीने की कोशिश भी की , और तब पहली बार लगा की बाबु मेरे से शर्मा रहे  मेरे साथ दारू पीते हुए , मैंने उनसे पूछा क्या कारण है तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया ..." तुझसे तो कोई शर्म नहीं है समाज की मुझे तो शर्म है " मैंने अपना पेग बाथरूम मैं फैक दिया तब उन्होंने आराम से दारू पी.!

बाबु , मुझे नहीं मालुम मैं आपकी कामनाओ पर खरा उतरा या नहीं , पर मैं यह जरुर कहूँगा की आप सचमुच एक आदर्श बाबु रहे , मेरे दुःख और सुख मैं सदा आप साथ रहे, मैं आपके लिए कुछ नहीं कर पाया परन्तु , आप मेरे भगवान् है , और मैं आपके सिखाये हुए आदर्शो पर चलता रहूँगा....! आपको पिता दिवस की हार्दिक शुभकामनाये...!

टिप्पणियाँ

  1. देबू दा, काबिल ए तारीफ लिखतें हैं आप...आप जब भी लिखते हैं उसमें पहाड़ की हवाओं का झोका और पुरानी यादों का नॉस्टेलिजिया का कॉकटेल होता है....इस लेखन से हर कोई मदहोश हो सकता है.... मैं तो हो ही जाता हूं...शब्दों का इतना अच्छा चयन करना कोई आपसे सीखे....आप लेखन के क्षेत्र में आगे बढ़े...ऐसे ही लिखते रहें जैसे आप लिखते हैं....लोगों को आपकी लेखनी पसंद आएगी...किताब छापें......

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    1. संजू भाई ...धन्यवाद आपने प्रशंसा के शब्दों के लिए समय निकाला उसके लिए धन्यवाद ..लिखना क्या दाज्यू बचपन गाँव मैं ही छोड़ आये , वह कभी कभी हिलोरे मारने लग जाता है तो यह शब्द बाहर आते है ...आपका पुनः धन्यवाद समय निकाल कर मेरे संस्मरण पढने के लिए !

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