निकले थे घर से , घर अपना ठीक करने.
रास्ते उबड़ - खाबड़ लगे हमें परेशान करने.
चारो तरफ दुःख के बादल , करने लगे आवाज ,
दुःख और गम ने खूब दिखाया हमें अपना अंदाज ,
हमने सोचा था जिंदगी है एक सफ़र आसान ,
पर जब देखी अपनी बेबसी, टूट गए सब अरमान.
हैरान , परेशान टहलते पहुचे फिर अपने घर,
देखकर बुढ़ापे की लाठी , याद आया वो मंजर,
आज भी इस लाठी के सहारे , वो है खड़े निडर,
हर गम , हर दुःख , हर दर्द से बेखबर .
ऐ मेरे पालन हार , तू है सबसे अचल .
मेरे आदर्शो , मेरे सपनो का है तू बल
हार कर जिसे मैं बैठा था , उसने दी दिशा और मान .
मुझे फिर मिल गया है , जीतने न का ज्ञान..
जीतने का ज्ञान..!
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