सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

नौले से नल तक का विकास...!

चित्र मैं दिखती यह चीज कोई पाषाण काल की खोज नहीं है , और न ही यह मोहन जोदारो या हड़प्पा संस्कृति के अवशेष , यह चित्र है मेरे गाँव के नौले का , जिसका गर्मियों मैं यह हाल हो जाता है ! गरिमयो के मार का इसके पास भी जवाब नहीं है , परन्तु बारिश से लेकर सर्दियों तक यह हमारे गाँव के लिए निर्मल जल का सबसे उपयुक्त श्रोत है , अनगिनत सालो से यह हमारे एवं हमारे पड़ोस के गाँव की प्यास बुझा रहा है ! 

गाँव मैं पानी का संकट शुरू से रहा है जिसके कारण ग्राम - पंचायत और स्थानीय प्रशाशन ने पहल की और हमें गाँव मैं नल की सुविधा दी , यह सुविधा काफी सालो के संघर्ष के बाद पूरी हुई , आज मैं गर्व से कह सकता हु की मेरे गाँव मैं भी नल है , और उत्तराखंड के जिस विकास की हम सदा बात करते है वह आपको 
इस नल से साफ़ नजर आ रहा होगा, आज मेरे गाँव मैं नौला है आज मेरे गाँव मैं नल है , परन्तु बस अब सिर्फ पानी का इन्तजार है ,जैसे मैं पानी का इन्तजार  मैं कर रहा हु वैसे ही , लगता है यह नल भी उस पानी का इन्तजार कर रहा है ! इस नल के चारो ओर उगी घास बताती है की कितने समय से इस नल पर कोई पानी लेने नहीं आया, आज यह कीड़े-मकोडो का घर बना हुआ है , घास इसके चारो तरफ है , इसे अपने आगोश मैं ली हुई है !



इस विषय पर काफी बात हुई , काफी शिकायतों का भी दौर चला , जिसमे गाँव के कुछ लोगो की भूमिका रही ,जल निगम, जल संसथान और स्थानीय MLA साहब को इस बाबत कई पत्र लिखे पर , नौला ऐसा ही रहता है गर्मियों मैं और नल की घास कम नहीं हुई ! आज इसी प्रकार का विकास उत्तराखंड के हर गाँव मैं दिखता है , किताबो मैं व्यवस्था ने इस पर काफी खर्च किया , और हर बार काफी पैसा खर्च होता है, न तो पानी आता है और न ही यह घास कम होती है ! गाँव मेरा और अच्छा है प्यार और भाईचारे के अलावा यहाँ सब है , झगडा  है , कस है , जागेर है  , शराब भी है पर पानी नहीं है , गाँव वाले इतने व्यस्त है इन सब मैं की उनके पास और कोई समय नहीं बचता वो इसलिए गाड़ मैं लगे हैण्ड पंप से पानी लेने जाते है ! आज तक पानी की इस लड़ाई को अपने तक ही लोगो ने रखा है , और शुरू मैं जब पानी आया था , पानी आने की ख़ुशी मैं भी काफी झगडे हुए ! कुछ जागरूक लोग है , जो की काफी कम है वो सब अभी भी पानी के लिए दौड़ भाग करते है , पर जो कही नहीं जाते घर  बैठे रहते है , वो सबको गाली देते है , और सबसे ज्यादा गाली वो उनको देते है , जो पानी के लिए दौड़ा - भागी करते है , ये वैसे ही है ...की उत्तराखंड की बुरी हालत के लिए जैसे UKD को गाली देना, UKD को वोट आपने कभी नहीं दिए , वोट दिए बीजेपी और कांग्रेस को और गाली खाती है UKD , यही हालत है मेरे गाँव की और यही है विकास ..नौले से नल तक ...!

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

धराली की त्रासदी , जब प्रकृति ने सब्र खो दिया !!

  परिचय: जब प्रकृति ने अपना सब्र खो दिया 5 अगस्त 2025। यह तारीख उत्तराखंड के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है। इस दिन से पहले, उत्तरकाशी जिले में गंगा (भागीरथी) के किनारे बसा खूबसूरत गाँव 'धराली' अपनी सेब के बागानों, शांत वातावरण और हरियाली के लिए जाना जाता था। यह एक ऐसी जगह थी जहाँ लोग शहर के शोर से दूर सुकून के पल बिताने आते थे। लेकिन उस रात, प्रकृति ने अपना वो रौद्र रूप दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। कुछ ही घंटों में, हँसता-खेलता धराली गाँव जलमग्न हो गया, और अपने पीछे छोड़ गया सिर्फ तबाही, खामोशी और अनगिनत सवाल। आज हम उस विनाशलीला को याद करेंगे, उसके कारणों की गहराई में जाएँगे और समझने की कोशिश करेंगे कि धराली की इस जल समाधि से इंसान क्या सबक सीख सकता है। आपदा के पीछे के विस्तृत कारण: यह सिर्फ बादल फटना नहीं था अक्सर ऐसी घटनाओं को केवल "बादल फटने" ( Cloudburst ) का नाम देकर एक प्राकृतिक आपदा मान लिया जाता है। लेकिन धराली की त्रासदी कई वर्षों से की जा रही मानवीय गलतियों और प्रकृति की चेतावनियों को नजरअंदाज करने का एक भयानक परिणाम थी। इसक...

उत्तराखंड में पंचायत चुनाव: गांव के विकास की धड़कन

  उत्तराखंड में पंचायत चुनाव: गांव के विकास की धड़कन पंचायत चुनाव, या पंचायत चुनाव , भारत में ग्रामीण लोकतंत्र की नींव हैं, जो गांवों को उनके भविष्य को संवारने का अधिकार देते हैं। उत्तराखंड में, हिमालय की गोद में बसे गांवों के लिए ये चुनाव विशेष महत्व रखते हैं। जुलाई 2025 में होने वाले उत्तराखंड पंचायत चुनाव की सरगर्मी शुरू हो चुकी है। प्रधानों (ग्राम प्रमुख) से लेकर समग्र विकास तक, ये चुनाव ग्रामीण उत्तराखंड के लिए गेम-चेंजर हैं। आइए जानें कि पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं, ये गांवों के विकास को कैसे बढ़ावा देते हैं, और 2025 के चुनावों से जुड़े कुछ रोचक किस्से जो उत्तराखंड के गांवों की भावना को दर्शाते हैं। पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं पंचायत चुनाव भारत की विकेंद्रित शासन व्यवस्था की रीढ़ हैं, जो 1993 के 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) को संवैधानिक दर्जा देता है। उत्तराखंड, जहां 7,485 ग्राम पंचायतें, 95 ब्लॉक, और 13 जिला पंचायतें हैं, में ये चुनाव ग्रामीण समुदायों के लिए जीवन रेखा हैं। ये गांव वालों को प्रधान , उप-प्रधान और सदस्यों जैसे नेताओं ...

उत्तराखंड के संघर्ष के एक जीवित नायक: प्रताप सिंह साही

  उत्तराखंड के संघर्ष के एक जीवित नायक: प्रताप सिंह साही काफी समय बाद मुझे  अल्मोड़ा भवन  जाने का मौका मिला और मान्यवर प्रताप सिंह साही जी से मिलकर ऐसा लगा जैसे मैं अपने परिवार के किसी बड़े सदस्य से मिल रहा हूँ। वह शख्स जिसने अपनी जिंदगी के 22 साल उत्तराखंड आंदोलन के लिए समर्पित कर दिए, जेल की यातनाएं सहीं, और अंततः 9 नवंबर 2000 को हमारे सपनों का उत्तराखंड राज्य हमारे सामने आया। प्रताप सिंह साही जी का जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा जनपद के बग्वाली पोखर स्थित डोटल गाँव में हुआ। बचपन से ही उनमें अपने समाज और पहाड़ के लिए कुछ बड़ा करने का जज्बा था। प्रारंभिक शिक्षा गांव में हुई, और वर्ष 1976 में वे दिल्ली आ गए। उस समय इमरजेंसी का दौर था, लेकिन अपने दिल में पहाड़ के प्रति प्रेम और अलग उत्तराखंड राज्य का सपना वे कभी नहीं छोड़े। 1977 में सरकारी विभाग में नौकरी मिली, पर नौकरी के साथ-साथ उत्तराखंड आंदोलन की जड़े उनके मन में धीरे-धीरे गहरी होती गईं। 1978 में दिल्ली के वोट क्लब में आयोजित एक ऐतिहासिक रैली में वे शामिल हुए, जहाँ उन्होंने उत्तराखंड के कई प्रमुख नेताओं जैसे प्रताप सिंह ने...