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चौखुटिया के रंग ...!



दोस्तों ये है चौखुटिया से बहती रामगंगा नदी का एक दृश्य, पानी से भैर इस नदी का आनंद ले रही है , ये भैंसे , पहाड़ के बारे मैं बहुत कुछ यह नदी भी कहती है , इस नदी के रहते पहाड़ के लोगो को जीवन मिलता है , अगर इसे पहाड़ की लाइफलाइन कहा जाये तो यह किसी प्रकार की अतिश्योक्ति नहीं होगी , !पानी के इस स्वरुप को हमने सदा प्यार किया है , सदा चाहा है , इस पानी की बदौलत रंगीली बैराठ उत्तराखंड के सबसे उपजाऊ क्षेत्र मैं आती है , और जब यहाँ गेहू, धान की फसल लहलहाती है तो उसे देखते ही बनता है ! पानी के बारे मैं बुधिजीवियो का यह विचार है की अगला विश्व युद्ध पीने के पानी के लिए होगा , और पानी की ,किल्लत अब पहाड़ मैं भी देखि जा सकती है , जब की यह सब नदिया हिमालय से जुडी हुई है . परन्तु अनगिनत बाधो के निर्माण होने के कारण ये आज इनका जीवित रहना अश्म्भव सा हो गया है ! ४७ डिग्री के तापमान पर दिल्ली जल रहा है ...मन करता है की कंप्यूटर के मॉनिटर से निकल कर सीधा एक डूब ..रामगंगा मैं मार दू ...!

आम की यह फोटो जी को ललचा रही है , जिसका खट्टा खाने को दिल कर रहा है वो  इनको ले जा सकता है और अपनी भूख मिटा सकता है , आजकल गाँव मैं खूब आम लगे हुए है , आदमियों से ज्यादा ये बंदरो को ललचा रहे है ,अब यह लड़ाई बन्दर और आदमियों के बीच है जो जीता आम उसके ..!
ये है मेरे बचपन के साथी , इनके बिना बचपन अधुरा था , आज टीवी के ज़माने मैं शायद बच्चे इनको भूल गए हो , आज Benten, नोबिता, Shinchan का जमाना है परन्तु जो मजा हमने इनके ग्वाव जा के लुटा वो शायद इस जनरेशन के लोग समझ भी नहीं पाएंगे! इनको चराना, इन के ऊपर बैठ जाना, दूसरी गयो से इनकी लड़ाई करवाना और चोरी चुपके से जंगल मैं दूध निकल कर पी जाना , वो शरारते कभी नहीं भूल पायेंगे हम.!
रामगंगा की यह दूसरी तस्वीर है , ऐसा लगता है जैसे यहाँ पहुचते पहुचते यह बूढी हो चली है , जो लोग इस नदी से वाकिफ है वह पहचान सकते है , सामने लड्डू - मोड़ी का रौ है जो हम सबके लिए फन एंड फ़ूड विलेज से अच्छा वाटर पार्क था, गर्मियों की पूरी दोपहर यहाँ कटती थी , डूब मरते हुए , बौ काटते हुए , पता नहीं कितनो बच्चो ने यहाँ तैरना सीखा और , आज भी वो चाहे कितनी दूर हौ इस रामगंगा से इस स्थान को वो कभी नहीं भुला सकते...!

और अंत मैं चीड के बगल से लिया गया यह चित्र , सामने बैराठ और चौखुटिया का बाजार जो धुधला नजर आ रहा है , चाहे इस बाजार ने तरक्की न की हो , लेकिन इसकी यादे यहाँ वालो के दिल पर सदा रही है , इस बाजार ने सबके मन पर बड़ी छाप छोड़ी है   ! आज मेरे और आप के पास बहुत कुछ है , पैसा है धन है दौलत है , मकान  है बैंक बैलेंस है ..पर क्या मैं सचमुच धनि हु ? मुझे लगता है मेरी जिंदगी की सबसे प्यारी चीजे पहाड़ मैं है और मैं यहाँ तो फिर मैं कैसा धनि हु इन सबके बिना ...इतनी बड़ी धरोहर का मालिक है सब पहाड़ के रहने वाले ...आखिर इनसे बड़ा धनी कौन हो सकता है ...जय उत्तराखंड.!

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