सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मेरे गाँव की जागेर !

                                        
आजकल गाँव मैं खूब चहल - पहल है , सूने घर फिर से रोशन हो चले है , गाँव मैं अकेले रहने वाले आमा बुबू , खूब व्यस्त नजर आ रहे है ,नाती - नातिनो ने मृत सी पड़ी जिंदगी मैं काफी जवानी  भर दी है , हसने, रोने और चीखने चिल्लाने की आवाज ने आदमी तो आदमी बंदरो को भी खुश कर दिया है , अब बन्दर भी काफी कम मेहनत मैं ज्यादा चीजो मै हाथ साफ़ करने मैं सफल हो रहे है ! दाल भात खाने वाले अमा बुबू  आजकल चोकलेट , टाफी, चिप्स   कैम्प कोला से घिरे हुए नजर आ रहे है ..आ गयी है गर्मी की छुट्टिया , और साथ ही आ गया है शादी का मौसम और जागेर के दिन..!

गाँव का नौला सुखा हुआ है , सड़क टूटी हुई है , गाय भैंस का जमाना नहीं रहा , आजकल अमूल से काम चल रहा है , खेती बंजर हो चली है , क्योकि शादी होते ही बहु तली ( दिल्ली) की और रुख कर रही है , पहाड़ मैं अब बचा क्या है , पानी  नहीं बिजली की कमी , स्कुल मैं अंग्रेजी नहीं , और बिना अंग्रेजी के भी कोई पढाई हुई, अमा - बुबू को भी एक दो बार समान पैक करके दिल्ली लाये पर , उनको दिल्ली-विल्ली कुछ नहीं भाया, सुबह से शाम तक नाती- नातिनो ने कार्टून दिखाया , खाने के नाम पर चोव्मिन,मोमोस. पिस्ता, गोलगप्पे, छोले भठूरे खिलाये और बस अमा-बुबू के पेट की लगा दी , दिन भर दरवाजे बंद करके कमरे मैं पड़े रहो ..किसी के पास उनसे बात करने के लिए टाइम नहीं है , वैसे भी अमा- बुबू का वर्शन अब  आउटडेटिड हो गया है इसलिए वो अब गाँव मैं ही रहते है ...क्योकि पहाड़ हमारे लिए सिर्फ उन चीजो की रखने की जगह बन गयी है ...जिसे हम धरोहर कहते है !

बच्चों का गाँव आना अक्सर नहीं होता , यह तो इस बार देवता की जागेर है इसलिए यहाँ आना हुआ , नहीं तो पहाड़ की और कौन रुख करता है , न माँ बाप की चिंता न किसी और की , आज का युवा सिर्फ फॉरवर्ड लूकिंग है , उसे कोई चिंता नहीं है न तो पहाड़ की और न धरोहर कि!

आज गाँव के देवता की पूछ हो रही है , क्योकि उसके हाथ मैं ही अब पॉवर बची है , वही वो सब इंसान से करवा सकता है जो उसके माँ - बाप नहीं करवा पाए, आज देवता उसे अमेरिका से भी बुलवा लेता है , आज के इंसान को चिंता है अपनी , अपनी ख़ुशी की , वह चाहता है की उसकी ख़ुशी मैं एक रत्ती भर भी दुःख न आये इसलिए वो देवता की सुनता है , लेकिन माँ -बाप रूपी देवताओ को वह गाँव छोड़ कर शहर चला गया है , देवताओ की इस पूछ ने गाँव को चलो कुछ समय के लिए ही सही  ...कम से कम इसे गाँव तो बना दिया ...अन्यथा इस गाँव मैं सदा समसान जैसा सन्नाटा छाया रहता था , ..बस अब फिर आज के बाद एक नयी उम्मीद ...अगली जागेर तक ...गाँव तब लगेगा गाँव ..अब जब अगली जागेर होगी ...जय हो...!

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मेरी दादी - मेरी आदर्श !!!

पहाड़ के बच्चो का जीवन अकसर अपनी माता जी या  दादी जी के आँचल मैं पलता और  बड़ा  होता है , क्योकि पुरुष अधिकतर समय गाव से  बाहर रहकर रोटी कमाने की दौड़  मैं  लगे  होते है ! माना की आज पहाड़ बहुत बदल चुका है परन्तु पहाड़ मैं रहने वाले बच्चो के लिए अभी भी  यही सच है ! समय काफी आगे निकल गया है आज मैं जिनके  बारे मैं लिखने जा रहा हु वो अब हमारे बीच मैं नहीं है , पर उनकी याद सदा दिल मैं रहती है और उनके मेरे जीवन पर  बहुत एहसान  है ,  इतना बड़ा परिवार है तो उसका कारण सिर्फ वो है , उन्होंने एक पक्की नीव की तरह हम सब के  जीवन को सहारा दिया है ! आज पिताजी की उम्र ७५ साल की हो गयी है और उनसे लगभग बीस साल पहले आमा जन्म कुमाऊ के द्वाराहट स्थित किरौला गाँव मैं हुआ था , मैंने यह गांव कभी नहीं देखा पर सुना जरुर है इस गाँव के बारे मैं ! लगभग १९२० के समय उनका जन्म इस गाँव मैं हुआ होगा ! उनके बचपन के बारे मैं कभी बात नहीं  हुई , पर यह जरुर पता है की लगभग १२ वर्ष की उम्र मैं उनकी शादी मेरे दादा जी के साथ हो गयी थी ! १२ वर्ष आज के ज़मा...

धराली की त्रासदी , जब प्रकृति ने सब्र खो दिया !!

  परिचय: जब प्रकृति ने अपना सब्र खो दिया 5 अगस्त 2025। यह तारीख उत्तराखंड के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है। इस दिन से पहले, उत्तरकाशी जिले में गंगा (भागीरथी) के किनारे बसा खूबसूरत गाँव 'धराली' अपनी सेब के बागानों, शांत वातावरण और हरियाली के लिए जाना जाता था। यह एक ऐसी जगह थी जहाँ लोग शहर के शोर से दूर सुकून के पल बिताने आते थे। लेकिन उस रात, प्रकृति ने अपना वो रौद्र रूप दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। कुछ ही घंटों में, हँसता-खेलता धराली गाँव जलमग्न हो गया, और अपने पीछे छोड़ गया सिर्फ तबाही, खामोशी और अनगिनत सवाल। आज हम उस विनाशलीला को याद करेंगे, उसके कारणों की गहराई में जाएँगे और समझने की कोशिश करेंगे कि धराली की इस जल समाधि से इंसान क्या सबक सीख सकता है। आपदा के पीछे के विस्तृत कारण: यह सिर्फ बादल फटना नहीं था अक्सर ऐसी घटनाओं को केवल "बादल फटने" ( Cloudburst ) का नाम देकर एक प्राकृतिक आपदा मान लिया जाता है। लेकिन धराली की त्रासदी कई वर्षों से की जा रही मानवीय गलतियों और प्रकृति की चेतावनियों को नजरअंदाज करने का एक भयानक परिणाम थी। इसक...

आलू मटर ने पहुचाया दिल्ली !

                               (फोटो आभार   चौखुटिया गेवाड विकास परिषद्) यह बात उन दिनों की है जब मैं चौखुटिया इन्टर कॉलेज मैं छठी कक्षा का छात्र था, सोनगांव स्कूल से पांचवी पास करके चौखुटिया इन्टर कॉलेज मैं प्रवेश लिया था, चौखुटिया मुझ गाँव के स्कूल से पढ़े के लिए बिलकुल शहर सा था, सोनगांव के स्कूल के आस पास कोई दुकान थी , और न ही कुछ खाने को मिलता था, परन्तु चौखुटिया इसके विपरीत एक बड़ा सा बाजार था, उस ज़माने मैं फ़ास्ट फ़ूड के तौर पे आलू- मटर सबसे हिट डिश थी, आलू-मटर  संग रायता मेरा पसंदीदा डिश थी , अब पापा दिल्ली रहते थे, और गाँव मैं अम्मा जी घर देखती थी, और तब जेब -खर्ची नाम की कोई भी खर्ची नहीं होती थी, सिर्फ दाल-भात खाओ या फिर मदुए की रोटी और साग, बस यही सब कुछ खाना पड़ता था !  बाजार मैं स्कूल जाते वक़्त रोज आलू-मटर अपनी ओर बुलाते थे, परन्तु पैसे न होने के कारण मैं मन मसोस कर रह जाता था, लेकिन इस समस्या का हल भी जल्दी निकल गया , मेरे कक्षा के कुछ साथी मेरे मित्र बन गए जिन्होंने मुझे अपन...