आज सुबह मन बड़ा दुखी और रुधने सा हो रहा है .....अमृता रावत( पत्नी सतपाल महाराज और पूर्व मंत्री उत्तराखंड सरकार) जी को रोते हुए देख कर मन मैं अन्दर तक दुःख की पीड़ा पहुच गयी, इस्तीफा माँगा हुआ ...कितना दुःख देता है ...यह अनुमान आप .सचमुच इस जनसेवी के अशुप्रुण चेहरे को देख कर लगा सकते है इसलिए मुझसे बिना कुछ कहे रहा नहीं गया...मैं आपसे इस दुःख को शेयर कर रहा हु....मुझे पूर्ण विश्वास है की उनकी इस दुःख की घडी मैं हम सब उनके साथ है....!
परिचय: जब प्रकृति ने अपना सब्र खो दिया 5 अगस्त 2025। यह तारीख उत्तराखंड के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है। इस दिन से पहले, उत्तरकाशी जिले में गंगा (भागीरथी) के किनारे बसा खूबसूरत गाँव 'धराली' अपनी सेब के बागानों, शांत वातावरण और हरियाली के लिए जाना जाता था। यह एक ऐसी जगह थी जहाँ लोग शहर के शोर से दूर सुकून के पल बिताने आते थे। लेकिन उस रात, प्रकृति ने अपना वो रौद्र रूप दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। कुछ ही घंटों में, हँसता-खेलता धराली गाँव जलमग्न हो गया, और अपने पीछे छोड़ गया सिर्फ तबाही, खामोशी और अनगिनत सवाल। आज हम उस विनाशलीला को याद करेंगे, उसके कारणों की गहराई में जाएँगे और समझने की कोशिश करेंगे कि धराली की इस जल समाधि से इंसान क्या सबक सीख सकता है। आपदा के पीछे के विस्तृत कारण: यह सिर्फ बादल फटना नहीं था अक्सर ऐसी घटनाओं को केवल "बादल फटने" ( Cloudburst ) का नाम देकर एक प्राकृतिक आपदा मान लिया जाता है। लेकिन धराली की त्रासदी कई वर्षों से की जा रही मानवीय गलतियों और प्रकृति की चेतावनियों को नजरअंदाज करने का एक भयानक परिणाम थी। इसक...
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