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नेता है या चोकलेट ..!

भारतवर्ष काफी विभिन्नताओ का देश है , इसमें बहुत धर्म है, भाषा है, प्रदेश है लेकिन आज़ादी की लड़ाई मैं सबने मिलकर अंग्रेजो को भारत से बहार खदेड़ा , उस वक़्त नैतिकता , सिधांत और समर्पण की राजनीती होती थी, राजनीती को देश एवं समाज सेवा से जोड कर देखा जाता था, एक राजनीती आज भी हो रही है जिसमे रोज नैतिकता , सिधान्तो की धज्जिया उड़ाई जाती है , नेता का कद अब भगवान से भी बड़ा हो गया है , और वो जो कह दे , कर दे वह सच है उसके सिवा सब मिथ्या है !
भारतीय राजनीती आजकल एक अलग दौर से गुजर रही है, जिसमे मीडिया का काफी बड़ा रोल है , नेता नहीं हो गया है , चोकलेट का ब्रांड हो गया है , आज नेता भी आपके पास उसी माध्यम से पहुचता है जिस माध्यम से आपके पास कैडबरी की डेरी मिल्क पहुचती है , आप उसे टीवी पर, अख़बार पर, गली मोहल्ले के बड़े बड़े होर्डिंग्स पर पाएंगे, और साथ मैं होगा एक ताजा सन्देश जो आपको उनको महाशय के बारे मैं सोचने पर मजबूर कर देगा, आप कोई भी सोशल नेटवर्किंग साईट खोलेंगे तो उसमे उनका मुश्कारता चेहरा आपको नजर आएगा, अब तो सुना है आप पैसे निकालने वाली एटीम स्लिप पर भी वो वोट मांगते नजर आ रहे थे !
दोस्तों यह सच्चाई है २०१४ के चुनाव की , जिसमे इन सभी चीजो ने काफी बड़ा रोल अदा किया, लेकिन जैसे ही इलेक्शन ख़तम हुए , सब भागने लगे है कुर्सी हत्याने अब, ये हाल बिहार मैं हो रहा है , यही हाल उत्तराखंड मैं दिख रहा है , क्या यह अनैतिकता नहीं है किसी विशेष दल की सरकार को गिरना और फिर उनके पार्टी के नेताओ को खरीद कर अपनी सरकार मैं शामिल करना और उसके बदले उन्हें मलाईदार पद देना, यह कहा की नैतिकता है , और आप पहले वाले दल मैं भी सरकार मैं थे , वह आपको कोई गद्दी नहीं दी तो आपने पाला बदल दिया , और अपने जेब भरी और आ गए दुसरे दल मैं , क्या अवाम ने आपको इसलिए चुना है की सिर्फ आप अपनी जेब की सोचे और जनता का ख्याल न करे.!
इसका पहलु यह भी है की जो पार्टी और नेता चुनाव प्रचार मैं अंधाधुंध पैसा खर्च करते है उनको यह पैसा किसी न किसी प्रकार निकालना भी पड़ता है , इसलिए उस नेता की यह राजनीतिक मज़बूरी भी बन जाती है की वह जितना हो सके उतना पैसा कम ले , पता नहीं भविष्य मैं कभी फिर मौका मिले न मिले, इसलिए यह सब चीजे भी भारतीय राजनीती मैं देखने को मिलती है ! इलेक्शन कमीशन को इस बात का संज्ञान लेना चाहिए की इलेक्शन खरचा सीमित हो और सब को बराबर मिले, जैसे की स्टेट फंडिंग की बात बार बार उठती है ..इस से सबको एक लेवल प्लेयिंग फील्ड भी मिलेगा और फिर लोग क़ाबलियत के हिसाब से वोट देंगे ...चोकलेट की तरह नहीं....!

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