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आपदा का दर्द !

आपदा ने पहाड़ को तोड़ के रख दिया है , पहाड़ का दर्द आपको सडको पर, कच्चे रास्तो पर, टूटे हुए मकानों पर, अंतिम सांस लेती दुकानों पर दिख जायेगा, लेकिन इस दर्द ने आज तक प्रशाशन और शाशन करते नेताओ को न तो इसने छुआ है और न ही यह दर्द कभी उनकी आँखों के सामने से गुजरा है, गाँधी पीस फाउंडेशन मैं आयोजित एक गोष्टी ने बहुत हद तक पहाड़ो के इस दर्द को जनता के सामने रखा, इसमें आये सभी गणमान्य जनमानस ने इस दर्द को समझा है, और एक वचन भी लिया है की इस विषय पर बहुत सिद्दत से काम करने की जरुरत भी है, इसी पीड़ा को माननीय न्यायलय के साम ने भी रखा है, इसमें हमारे कुछ समाज सेवी साथी काफी सक्रिय है , और दिल्ली मैं रहते हुए हम और आप लोग इस मुद्दे को सरकार और व्यवस्था के सामने रखेंगे, इस गोष्टी मैं एक पीड़ित मित्र भी उपस्थित थे, जिन्होंने की बहुत कुछ खोया है इस आपदा मैं , परन्तु सरकार लाचार सी दिखी, यह मित्र ही नहीं अगस्तमुनी के बहुत सारे परिवारों ने बहुत कुछ खोया है , जिसकी भरपाई जिंदगी भर नहीं हो सकती है , और इस बुरे वक़्त पे स्थानीय प्रशासन का उदासीन रुख देख कर मन और दुखी हो जाता है ! मैं अपने मित्रो से जरुर अनुरोध करूँगा की व्यवस्था परिवर्तन की इस लड़ाई मैं हमारा साथ दे , जिस से की आपदा पीड़ित लोगो को न्याय मिल सके.

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