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दिल्ली तो गनाई !

दिल्ली की हवा धीरे-धीरे गरम होती जा रही है , सूरज रोज अब सर चढ़ कर कहर ढाएगा, सड़के दिन मैं सुन सान हो जाएँगी , बाजार की चहल - पहल सिर्फ सूरज ढले शुरू होगी , हवा अब फिर अनजान से बन ने लगी है , बार बार मन केलिन्डर की ओर देखता है , फिर समय आ रहा है गाँव की वादियों मैं खोने का, रामगंगा मैं सब कुछ भूल कर डूब मारने का , समय आ रहा है गाँव जाने का !

अंतर बहुत है तब और अब मैं , आज सब कुछ होने के बावजूद वह ख़ुशी नहीं मिल पाती गाँव जाने की, ख़ुशी तो वो थी , पुरे साल इन्तजार रहता था गर्मियों की छुट्टी का , क्योकि यही समय था , जब नए कपडे, नए जूते और नया अहसास आज़ादी का मिलता, अब पापा की डाट-डपट से दूर , इजा और अम्मा के आँचल मैं कटेंगे शकुन के दिन !

छुट्टी पड़ी और  अगले दिन  पहुच गए कश्मीरी गेट बस अड्डा , पहले यही से सब बसे जाती थी , गर्मी मैं भीड़ काफी होती थी , इसलिए दिन से ही गनाई की बस के लिए लाइन मैं लगना पड़ता था, उस बस मैं उस वक़्त सीट मिलना , स्पेस क्राफ्ट मैं सीट मिलने की तरह था, जैसे तैसे सीट का इंतजाम हुआ और बस मैं बैठ कर निकल गए गाँव को , मन मैं तरंगे , और उमंगें भरी रहती थी , और आज तो पापा ने और भी पैसे दे दिए, चलने से पहले कही पर न उतरने की हिदायत और सामान पर नजर रखने की हिदायत बाई डिफाल्ट मिलती थी ! बस धीरे -धीरे चलते हुए गाजियाबाद और फिर गजरौला पह्चुही वह पर खाना खाया और नींद ने आँखों को घेर लिया और फिर आँख रामनगर मैं खुलती जहा चाय पी और बस के चलने का इन्तजार करने लगे , रात गहरी होने के कारण रुकना पड़ता था , पहाड़ को बस सुबह के चार बजे निकली , अब समय आया पहाड़ो को , जन्भूमि को पास से देखने का छूने का !
रामनगर से ऊपर जब पहाड़ो मैं बस पहली बार प्रवेश करती है तो यकायक " राम तेरी गंगा मैली ' का गाना जुवा पर चढ़ जाता है ," हुस्न पहाड़ो का की बारो महीने यहाँ मौसम जाड़ो का" कितना सच कहा है गीतकार ने पहाड़ो के बारे मैं, बस अब झूमती हुई चलती है ऐसा लगता है जैसे इसे भी पहाड़ो का नशा हो गया है ! गर्जिया का मंदिर , पहाड़ के पाँव पे खड़ा है , और वहा पर बस रूकती है , पंडित जी ३-४ थालिया सट  से बस के अन्दर पकड़ाते है , यहाँ पर पहली बार लगता है अब हम देव भूमि पहुच गए है , वह पिठ्या -आछेत , और बेल पतरी का प्रयोग किया और गर्जिया माता से  शुभ सफ़र की कामना करते हुए आगे बढे..!

पहाड़ की सौगात आलू-मटर और रायता का इन्तजार है , वह भतरोजखान मैं मिलता है , बस जैसी ही वह पहुचे बस खाली सब नीचे पहुचे और खूब रायता और आलू -मटर खाए, खूब पानी पिया , चाय पी, अब लगा पहुच गए पहाड़, इन सब व्यंजनों का आनंद लेकर बस चल पड़ी , अब धीरे - धीरे बस के यात्री उतरने लगे , कुछ लोग गीत मैं मस्त है कुछ सोये हुए है , और एक साहब ने सुबह ही गुलाबो का सेवन कर लिया है , अब पहाड़ जो पहुच गए है , और यहाँ तो हम लोग , समय देख कर नहीं पीते , बल्कि गुलाबो को देख कर पीते है , जब मिली तब लगा ली,

भाई साहब ने समां बाधदिया था , पी उन्होंने थी और लग ऐसा रहा था , की पूरी बस ने पी ली हो, इसकी स्मेल ने पुरे बस को गुलाबोमय कर दिया था, भाई साहब के पेट मैं गुलाबो हिलारो मार रही थी , और वो खड़े होकर बस वालो को नाच कर के दिखा रहे थे, यह अच्छा था की रह नाच रस के पियक्कड़ थे , नहीं तो रंग मैं भंग हो जाता , क्योकि शराब पीने के बाद पता चलता है की ये कौन से रस के दारुबाज है, हमने तो झगडे रस के , इंग्लिश रस के पियक्कड़ देखे है जो अक्सर पिके झगडा या अंग्रेजी बोलते है , परन्तु ये साहब जरा अच्छे किस्म के थे और संगीत और नाच कर लोगो का मनोरंजन कर रहे थे , बस धीरे - धीरे चलती हुए गनाई के अंतर को कम कर रही थी, सड़क के चारो तरफ खेत और अगल बगल मैं पहाड़ चल रहे थे, एक अलग ही खुसबू थी इस मिटटी की , जो की सदा अपनों को अपने पास खीच के लाती थी !

चलते -चलते गनाई पहुच गए , बस कड़ी हुए , बहार जीप वाले आवाज लगा रहे थे, परन्तु क्योकि काफी समय के बाद पहाड़ आना हुआ , मैं अपना बैग पकड़ कर पैदल ही बैराठ की और निकल गया , बैराठ मैं रामगंगा को छुआ, और बैग किनारे रख कर तीन चार दुबकी एक साथ लगायी , रामगंगा का यह पानी ने बदन और मन को फिर साफ़ कर दिया था, फिर मन उमंगो से भर गया था , दिल को लग रहा था , स्वर्ग मैं आ गया हु, और कपडे पहने और निकल गए घर के ओर...!

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