पहाड़ो की जिंदगी को अपने जिंदगी के कैमरे मैं
रिकॉर्ड करके चलता हु, और जब भी आज की जिंदगी से कुछ फुर्सत के पल मिलते है तो खो
जाता हु पहाड़ की यादो मैं ! पहाड़ के उस बचपन मैं जिसने बेबाक हसना, खेलना और
जिंदगी जीना सिखाया , वो पहाड़ , वो जंगल, वो रामगंगा शायद मेरे पक्के असल जिंदगी
के साथी है , जिन्हें मैं आज भी वही खड़ा पाता हु जहा वो थे , चाहे , चाहे जिंदगी
मैं बहुत कुछ बदल गया है !
बात उस समय की है जब मैं कक्षा पांच मैं , खावाखेत
प्राइमरी स्कूल का विद्यार्थी था, पढाई का मतलब वहा खाली , स्कूल जाना होता था, न
परीक्षा की चिंता, न परसेंटेज की , सिर्फ हाजिरी लगाना सबसे बड़ा मकसद था स्कूल
जाने का , करियर’ नाम का परिंदे के बारे
मैं हमने कभी सुना ही नहीं था न कोई ईस्ट मित्र जनता था , लेकिन जो मैं बात कहने जा
रहा हुआ यह पढाई से सम्बंधित नहीं है , क्योकि पढाई हमने की कहा !
छोटा गाँव, छोटा परिवार, और गाँव के लोगो का तब
मुख्य साधन खेती था, दिनचर्या सुबह , कलेवे के साथ शुरू होती थी भात का साथ जवान
और शाम को रोटी के साथ ख़तम, यही कुछ करना होता था
गाँव मैं ! घर मैं मैं ही एक बच्चा/आदमी था, पिताजी दिल्ली मैं नौकरी करते
थे, दादा जी थे नहीं, अम्मा और मम्मी का लाडला मैं था, और घर का सबसे बड़ा भी मैं
ही था ! हल चलाने का मौसम आ रहा था, लेकिन घर मैं बल्द न होने के कारण अमा और इजा
बल्दो की तलाश कर रही थी, आखिर यह तलाश ख़तम हुए और एक जोड़ी बल्द हमने खरीद लिए,
गाँव के जीवन मैं गाय, भैंस, बाछुर ,
बल्दो का बड़ा महत्व था, मेरे लिए ये और भी ज्यदा महत्वपूर्ण थे क्योकि , दोनों बल्द
मुझे बड़े थे , और मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे दो बड़े भाई आ गए है एक का नाम था
खैर और दुसरे का नाम था प्यार ...खैर और प्यार की यह जोड़ी मुझे बहुत पसंद थी!
इनके साथ मैं धीरे घुल मिल गया, इजा और आमा जब भी
इनको घा देने जाती मैं उनके साथ हो लेता और जब भी ग्वाव जाता इनके साथ खेलने का
बहुत आता , कभी इनकी पूछ मोड़ देता, कभी इनको सिकौर से मारता और कभी इनके सर को सहलाता
और फिर प्यार बल्द मेरे सर और मेरे मुह को अपनी जीब से चाटता, ये मेरा फवोरिट टाइम
पास था बचपन का, और जब गाँव के सब गाय- बैल
रामगंगा पानी पीने जाते तो और ही मजा आता था, रश्ते मैं अगर दुसरे गाँव के
गाय- भैंस भी चर रहे होते थे, तो बैलो की ग्वाह-ग्वाह करते हुए लड़ाई का अलग
मजा आता था !
इस प्रकार ये मेरे बचपन के साथी ये बल्द मेरी जिंदगी का अभिन्न अंग बन गए थे,
पढाई के लिए न चाहते हुए भी दिल्ली का रुख करना पड़ा , इन अपनों की यादे दिल मैं
समाये हुए अब पढाई मैं समय लगने लगा, लेकिन हर साल गर्मियों को छुट्टी मैं गाँव
जाना एक पत्थर की लकीर था , जो कभी नहीं बदला ! गाँव जाते ही सबसे पहले मैं बैग रख
कर खरिक जाता जहा मैं घंटो खैर और प्यार के साथ समय बिताता, चाहे जुवानी कुछ भी एक
दुसरे को कह नहीं पाते, लेकिन मैं उनकी आँखों मैं अपने प्रति अतह प्यार महुशश
करता, फिर वही उनके शारीर को सहलाना, और उनका मेरे बालो और चेहरे पर अपनी जीब से
चाटना, इस बात को पक्का करता था की दोस्ती अभी भी पक्की है और कोई दरार उसमे नहीं
आई है, चाहे समय कितना बदल गया हो !
जिंदगी सदा खुशनुमा रहे यह संभव नहीं है , ऐसा ही
एक खतरनाक मोड़ इस दोस्ती मैं भी आया , बात उन दिनों की है , जब हम गाय- भैसों को रामगंगा
की बजाय अपने गाँव के पास वाले जंगल मैं
चरने के लिए खदेड़ देते थे, ऐसा ही एक दिन था , मैं सुबह सुबह अपने साथियो के साथ
इन सबको चरने के लिए जंगल मैं खदेड़ आया ! उन दिनों ये पुरे दिन चरते थे और शाम को
अपने आप खरिक आ जाते थे ! उस दिन ऐसा नहीं हुआ शाम को जब मैं खरिक आया तो देखा
प्यार बल्द कही नजर नहीं आ रहा, मैंने औरो को बाधा और खैर की आँखों मैं मुझे एक
अजीब सी बैचेनी नजर आई , प्यार की खोज मैं
सीधा जंगल की और निकल गया , काफी मसक्कत करने के बाद भी मुझे प्यार का कही
नामो-निशान नजर नहीं आया ! रात हो गयी थी, इजा, आमा और पडोसी लोग भी परेशान हो गए
थे ! फिर गाँव वालो के साथ मिलकर रात को जंगल मैं फिर खोज के लिए जाना पड़ा, क्योकि
जंगल खतरनाक भी था बाग का भी डर था , लेकिन काफी खोजने के बाद भी प्यार नहीं मिला
और हम सब गाव वापस आ गए !,
रात भर घर वालो को नींद नहीं आई अटकले लग रही थी की कही प्यार पहाड़ से गिरकर मर न गया हो और दूसरी की कही बाग़ ने उसका शिकार
न कर दिया हो ! परन्तु जब तक उसका सबूत नहीं मिलता तब तक बैचेनी लाजमी थी ! सुबह
होते ही मैं अपने एक दोस्त के साथ फिर जंगल के लिए निकल पड़ा , पार पत्या से होते
हुए सिमार, भैसिकोट, तक गया लेकिन वह हमें नहीं मिला , तभी मैंने सोचा अब लखनपुर
की ओर चला जाय और रस्ते मैं एक पत्थर है जिस से अक्सर गाय-बैल फिसल जाते है और पास
के गधेरे मैं गिर जाते है, मैं अपने मित्र के साथ उस पत्थर की और गया और उसमे मुझे
फिसलन के निसान नजर आये , और पत्थर के नीचे की और मिटटी नयी नयी बिखरी से नजर आई ,
हम दोनों उस मिटटी के पीछे पीछे सीधे नीचे
पहुचे तो मेरी आँखे भौचक्की रह गयी , प्यार एक पेड़ की जड़ मैं अटका हुआ था , उसके
पाँव मैं चोट आई थी और वह दर्द से कराह रहा था , मैंने उसके पास दौड़ के गया और
मैंने उसके बदन का मुआयना किया , उसके एक पाँव मैं काफी चोट थी, मैंने अपने मित्र
को बोला जल्दी मेरी इजा और आमा को धात दे कर बुला दो , मैं इसका ख्याल रखता हु, मुझे देखकर उसकी आँखों मैं प्यार छलक ने
लगा , उसी आँखे चोट के कारण नम तो थी ही
पर अब उनमे आंसू भी आ गए !
इजा – अमा के साथ गाँव वाले भी आये, उन्होंने सबने
उसके खड़ा करने की कोशिश की परन्तु वह खड़ा नहीं हो पा रहा था चोट के कारण, फिर सबने
कहा की इसे यहाँ से उठाकर पत्या ले चलते है क्योई वह तक राश्ता ठीक था और वह पर
इसकी दवा की जाएगी, उसकी दो बांस के डंडो के बीच रस्सी से बाध कर जा पत्या लाया
गया, वह पर एक अच्छी जगह देख कर उसे लिटाया और उसके लिए मैं तब तक जंगल से हरी घास
और पत्तिया खाने के लिए ले आया , जो उसने छुई भी नहीं दर्द के मारे. ! उन दिनों
डाक्टर आदमियों के नहीं होते थे जानवर के कहा मिलते , फिर आमा ने लाल मिटटी का लेप
उसकी टांग पर लगा दिया और सब घर चले आये !
अब रोज मैं और मेरी इजा उसे दिन मैं तीन बार खाना
देने और दवाई देने जाते , धीरे –धीरे उसका दर्द कम हो रहा था, अब वह खाना भी बड़े
आराम से खा रहा था, दिन मैं गाय-भैंस भी वह जाते थे, मैं उसके साथ पुरे दिन दिन
बैठ कर उसकी पीठ सहलाता रहता था और वो मुझे चाटता रहता था, फिर लगभग एकं महीने के
बाद एक दिन आया जब वह खुद अपने पैरो पर उठ
कर खरिक वापस आया, उसे पूरी तरह से सुखी देख मन मैं बहुत ख़ुशी हुई !घर मैं ख़ुशी का
माहौल था , ऐसा लग रहा था घर का एक सदस्य बड़े बरसो के बाद हमें मिल रहा रही मैंने
उसके लिए खूब घास और हेयर पत्तियों इकठ्ठा की और उसको उनको चाव से खता देख मेरी
आँखों मैं आंसू आ गए ! वह मेरा ऐसा
बेजुबान दोस्त था जिसके प्यार को मैं सिर्फ उसकी आँखों मैं पढ़ सकता था, उसके साथ
मैं कई साल हल चलाया और उसकी और मेरी यह बेजुबा दोस्ती अभी भी मेरे खवाबो मैं कायम
है और सदा मेरे दिल के करीब रहेगी. !
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें