सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कैसे बनेगा, कैसे बचेगा मेरा उत्तराखंड.!




आपदा ने पहाड़ को तोड़ के रख दिया है , पहाड़ का दर्द आपको सडको पर, कच्चे रास्तो पर, टूटे हुए मकानों पर, अंतिम सांस लेती दुकानों पर दिख जायेगा, लेकिन इस दर्द ने आज तक प्रशाशन और शाशन करते नेताओ को न तो इसने छुआ है और न ही यह दर्द कभी उनकी आँखों के सामने से गुजरा है, गाँधी पीस फाउंडेशन मैं आयोजित एक गोष्टी ने बहुत हद तक पहाड़ो के इस दर्द को जनता के सामने रखा, इसमें आये सभी गणमान्य जनमानस ने इस दर्द को समझा है, और एक वचन भी लिया है की इस विषय पर बहुत सिद्दत से काम करने की जरुरत भी है, इसी पीड़ा को माननीय न्यायलय के साम ने भी रखा है, इसमें हमारे कुछ समाज सेवी साथी काफी सक्रिय है , और दिल्ली मैं रहते हुए हम और आप लोग इस मुद्दे को सरकार और व्यवस्था के सामने रखेंगे, इस गोष्टी मैं एक पीड़ित मित्र भी उपस्थित थे, जिन्होंने की बहुत कुछ खोया है इस आपदा मैं , परन्तु सरकार लाचार सी दिखी, यह मित्र ही नहीं अगस्तमुनी के बहुत सारे परिवारों ने बहुत कुछ खोया है , जिसकी भरपाई जिंदगी भर नहीं हो सकती है , और इस बुरे वक़्त पे स्थानीय प्रशासन का उदासीन रुख देख कर मन और दुखी हो जाता है ! 

पहाड़ के इन लोगो के ये पहाड़ भी अब अपने नजर नहीं आते, पिछले कुछ सालो मैं इनपर इतने हमले हुए है की यह अपना स्वरुप और अपनी वास्तविकता भूल सी गए है, विकास ने नाम पर होने वाला यह कहर स्थानीय निवासियों से छुपा हुआ नहीं रहा है , उनमे से बहुत लोगो ने इसका जाने - अनजाने मैं साथ दिया है , उनकी उम्मीद की कभी विकास इन पहाड़ो को एक सपनो की नगरी मैं बदल देगा, कभी जीवंत नहीं हो पाया, आखिर प्रकृति भी कोई चीज है और उसकी बदलाव की कुछ सीमाए है, इंसान ने जमीन को नए- ने  उपकरणों से कुरेदने और लहू लुहान करने की जो निरंतर कोशिश की है उसका जवाब प्रकृति हर बार देती आई है , जिसका हमने कभी सम्मान नहीं किया, प्रकृति ने बार बार अपने इस दर्द को आपदा के रूप मैं हमारे सामने पेश किया है परन्तु हम तो विकास के नशे मैं ऐसे डूबे हुए है की हमें विकास के सामने कुछ नहीं नजर आता !

ये विकास के मॉडल के द्वारा मूक और बधिर जनता को समझाना और उनकी राय को कभी नहीं सुन ना यह विकास का मॉडल है जो प्रचलित है उत्तराखंड मैं , इन विकास के ठेकेदारों का बस चलता तो यह प्रकृति का भी प्रबन्धन कर देते , परन्तु सब चीजे इनके हाथ मैं नहीं है, इसलिए ये तभी ये सब ज्ञानी लोग आपदा का ठीकरा देवताओ पर फोड़ने के लिए आतुर है, अपने कुकर्मो के लिए सदा से दूसरो को दोष देने वाली व्यवस्था हमारे देश की प्रचलित संस्कृति है और उसी वाद - विवाद का शिकार भी आपदा बन चुकी है , पुरे उत्तराखंड मैं इतनी जाने गयी, इतनी जाने अभी भी रोज जा रही है, लोग अभी भी जिंदगी भी शोक मैं जी रहे है, जो चले गए उनका अब क्या कहा जाए , लेकिन जो रोज मौत से जूझ रहे है कम से कम ये विकास पुरुष उनकी तो सुध लेते...!

कैसे बनेगा मेरा प्यारा उत्तराखंड, कैसे बचेगा मेरा प्यारा उत्तराखंड ...यह अब सबसे बड़ा चिंता का विषय बन गया है हमारे लिए...!

टिप्पणियाँ

  1. बड़े भाई
    मुझे लगता है पाहड़ को वही और वहां से जुड़े लोग ही बदल सकते है
    !!!!

    जवाब देंहटाएं
  2. Kundan Bhai ..bilkul sahi kaha aapne...bina jude kuch ho nahi sakta..!

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

धराली की त्रासदी , जब प्रकृति ने सब्र खो दिया !!

  परिचय: जब प्रकृति ने अपना सब्र खो दिया 5 अगस्त 2025। यह तारीख उत्तराखंड के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है। इस दिन से पहले, उत्तरकाशी जिले में गंगा (भागीरथी) के किनारे बसा खूबसूरत गाँव 'धराली' अपनी सेब के बागानों, शांत वातावरण और हरियाली के लिए जाना जाता था। यह एक ऐसी जगह थी जहाँ लोग शहर के शोर से दूर सुकून के पल बिताने आते थे। लेकिन उस रात, प्रकृति ने अपना वो रौद्र रूप दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। कुछ ही घंटों में, हँसता-खेलता धराली गाँव जलमग्न हो गया, और अपने पीछे छोड़ गया सिर्फ तबाही, खामोशी और अनगिनत सवाल। आज हम उस विनाशलीला को याद करेंगे, उसके कारणों की गहराई में जाएँगे और समझने की कोशिश करेंगे कि धराली की इस जल समाधि से इंसान क्या सबक सीख सकता है। आपदा के पीछे के विस्तृत कारण: यह सिर्फ बादल फटना नहीं था अक्सर ऐसी घटनाओं को केवल "बादल फटने" ( Cloudburst ) का नाम देकर एक प्राकृतिक आपदा मान लिया जाता है। लेकिन धराली की त्रासदी कई वर्षों से की जा रही मानवीय गलतियों और प्रकृति की चेतावनियों को नजरअंदाज करने का एक भयानक परिणाम थी। इसक...

उत्तराखंड में पंचायत चुनाव: गांव के विकास की धड़कन

  उत्तराखंड में पंचायत चुनाव: गांव के विकास की धड़कन पंचायत चुनाव, या पंचायत चुनाव , भारत में ग्रामीण लोकतंत्र की नींव हैं, जो गांवों को उनके भविष्य को संवारने का अधिकार देते हैं। उत्तराखंड में, हिमालय की गोद में बसे गांवों के लिए ये चुनाव विशेष महत्व रखते हैं। जुलाई 2025 में होने वाले उत्तराखंड पंचायत चुनाव की सरगर्मी शुरू हो चुकी है। प्रधानों (ग्राम प्रमुख) से लेकर समग्र विकास तक, ये चुनाव ग्रामीण उत्तराखंड के लिए गेम-चेंजर हैं। आइए जानें कि पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं, ये गांवों के विकास को कैसे बढ़ावा देते हैं, और 2025 के चुनावों से जुड़े कुछ रोचक किस्से जो उत्तराखंड के गांवों की भावना को दर्शाते हैं। पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं पंचायत चुनाव भारत की विकेंद्रित शासन व्यवस्था की रीढ़ हैं, जो 1993 के 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) को संवैधानिक दर्जा देता है। उत्तराखंड, जहां 7,485 ग्राम पंचायतें, 95 ब्लॉक, और 13 जिला पंचायतें हैं, में ये चुनाव ग्रामीण समुदायों के लिए जीवन रेखा हैं। ये गांव वालों को प्रधान , उप-प्रधान और सदस्यों जैसे नेताओं ...

उत्तराखंड के संघर्ष के एक जीवित नायक: प्रताप सिंह साही

  उत्तराखंड के संघर्ष के एक जीवित नायक: प्रताप सिंह साही काफी समय बाद मुझे  अल्मोड़ा भवन  जाने का मौका मिला और मान्यवर प्रताप सिंह साही जी से मिलकर ऐसा लगा जैसे मैं अपने परिवार के किसी बड़े सदस्य से मिल रहा हूँ। वह शख्स जिसने अपनी जिंदगी के 22 साल उत्तराखंड आंदोलन के लिए समर्पित कर दिए, जेल की यातनाएं सहीं, और अंततः 9 नवंबर 2000 को हमारे सपनों का उत्तराखंड राज्य हमारे सामने आया। प्रताप सिंह साही जी का जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा जनपद के बग्वाली पोखर स्थित डोटल गाँव में हुआ। बचपन से ही उनमें अपने समाज और पहाड़ के लिए कुछ बड़ा करने का जज्बा था। प्रारंभिक शिक्षा गांव में हुई, और वर्ष 1976 में वे दिल्ली आ गए। उस समय इमरजेंसी का दौर था, लेकिन अपने दिल में पहाड़ के प्रति प्रेम और अलग उत्तराखंड राज्य का सपना वे कभी नहीं छोड़े। 1977 में सरकारी विभाग में नौकरी मिली, पर नौकरी के साथ-साथ उत्तराखंड आंदोलन की जड़े उनके मन में धीरे-धीरे गहरी होती गईं। 1978 में दिल्ली के वोट क्लब में आयोजित एक ऐतिहासिक रैली में वे शामिल हुए, जहाँ उन्होंने उत्तराखंड के कई प्रमुख नेताओं जैसे प्रताप सिंह ने...