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उत्तराखंडी चाचा....जो लुप्त होने के कगार पर है ..!



उत्तराखंडी चाचा....जो लुप्त  होने के  कगार  पर है .!

गाँव का एक मकान जो उसके मालिक की तरह अधेड़ उम्र को पार कर गया है , न मकान मैं कोई चाहत बची है , और न ही उसके मालिक मैं कोई आरजू , जिंदगी को समय के हवाले कर दिया है , जिन्दगी  समय के थपेड़े खाती हुई चली जा रही है , एक बेटा है उनका , उसकी शादी की चिंता सता रही है ,क्योकि अब पहाड़  मैं कामकरने वाले लड़के से कोई  शादी  नहीं  करना चाहता , चाहे वो कितने पैसे कमाता हो , कुछ समय के लिए दिल्ली गया था , परन्तु गाँव के लोगो और रिश्तेदारों की उदासी की वजह से कोई काम नहीं मिल पाया और वह उलटे  पाँव गाँव पहुच गया , अब सिर्फ स्कूल वाली दुकान  का सहारा है  जो उसकी जिंदगी का इंजन बन कर उसे  पार लगाएगी !

यह कहानी है हर उस आदमी की जो उत्तराखंड से बाहर नहीं निकल पाया है, हर बच्चा , जवान या वृद्ध समय रहते यह कोशिश जरुर करता है परन्तु कुछ लोग कामयाब नहीं हो पाते है और वो फिर बन जाते है , "जग चाचा " या "कक", मेरे चाचा की तरह! खेती ही एक सहारा है , इसके अलावा न ही कुछ आता  है और नहीं कुछ  सुझा , लेकिन आज के समय मैं जब सड़के गाँव गाँव तक पहुच रही है तो , चाय की दुकान भी एक अल्टरनेटिव करियर आप्शन है.! चाचा ने भी वही किया , खेती इतनी ज्यादा होती नहीं होती ,परन्तु  खेती उत्तराखंड मैं कुछ खाने - कमाने के लिए नहीं बल्कि एक समय काटने का आसान तरीका जरुर है.!अब लोग दिल्ली आ गए तो वह दुकान भी नहीं रही , चाचा ने स्कुल के साथ एक दूकान जरुर खोल दी है अब !

काफी समय के  बाद गाँव के एक  अजीज रिश्तेदार की पुत्री का शादी का निमंत्रण आया , क्योकि पहाड़ अब  मेरी रोजमर्रा के जिंदगी से निकल गया है , सिर्फ शादी, मृत्यु या देवता तीन चीजो के लिए जाया जाता है , बाकि सब चीजे तो शहर मैं उपलब्ध है , सर्दी  की शादी थी , सभी लोग दिल्ली से भी गए, उनमे ज्यादा तर उन चाचा के परिवार से थे , शाम का समय था, चाचा काफी दूर का सफ़र कर के इस शादी मैं शाम को पहुचे थे , समाज मैं इज्जत अब सिर्फ पैसे वाले की है तभी इंसानियत से अमीर चाचा की अब कोई पूछ नहीं है  ! उनके आने पर नाक -भो सिकोड़ते हुए नमस्ते का दौर शुरू हुआ ,और ऐसा लग रहा था उनसे छोटे भी उनको नमस्ते करके   उन पर अहसान जता रहे है, चाचा  सफ़र की थकान के कारण कुछ घूट लगाकर आये थे, क्योकि पहाड़ की जिंदगी वैसे ही कठिन है और अपनी थकान और गम हलके करने का यही एक तरीका है! 

हाल चाल पूछने का  दौर शुरू हुआ , गोठ मैं सभी रिश्तेदार बैठे हुए थी , क्योकि यह शादी मेरे ससुराल की तरफ की थी और ससुराल के   इन चाचा से मेरी पहली मुलाकात थी , कद काठी मैं वो काफी छोटे कद के थे , पायजामा साधारण कमीज और उसके ऊपर एक ऊनि बनियान और एक बास्कट पहनी थी , सर पर टोपी और हाथ मैं लाठी , इस बैठक मैं मेरे ससुराल वाले तरफ से आये हुए दिल्ली के रिश्तेदार बैठे थे जिनमे उनकी भाभिया,बहुऐ और उनके भाइयो की बेटिया मौजूद थी , महिला संगीत अभी खतम हुआ था , और अब खाने की तैयारी चल रही थी ! मेरा शाला अपने इन चाचा की बहुत इज्जत करता है , और चाचा ने भी अपनी तरफ से किसी के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी तो ये तो अपना भतीजा ही था ,इसलिए शाले ने भी अपना भतीजे का फर्ज निभाते हुए उनके लिए गिलास ले आया और मदिरा की महफ़िल शुरू हो गयी , मैं, मेरा शाळा , उसके बड़े जीजाजी और एक अन्य रिश्तेदार , और चाचाजी गोठ मैं बैठ कर मदिरपान करने लगे वैसे भी उसकी अपने इन चाचा के साथ मुलाकात काफी वर्षो बाद हो रही थी !
 महफ़िल सजी हुइ थी, जाम पे जाम बन रहे थे, ठहाके से सारा वातावरण गूंज रहा था, चाचा अचानक इतनी इज्जत पाकर फुले नहीं समां रहे थे, उनको भी पीने का न्योता दिया गया और उन्होंने सहर्ष उसे स्वीकारा, दो पेग उन्होंने भी गटके और उसके बाद डिनर हुआ, हमने डांस भी किया और डांस के बाद सब लोग एक कमरे मैं सो गए, शादी का घर था, इसलिए दिल्ली वालो को यह कमरा मिला और चाचा जी भी अपनी जगह बनाकर इसमें सो गए, रात मैं दारू अपना कमाल कर गयी और चाचा उलटी कर बैठे , बिस्तर और अपनी अंगडी ख़राब कर बैठे, नींद का जोर काफी था इसलिए उठ नहीं पाए, और वैसे ही सोये रहे !

सुबह जैसे ही नींद खुली सब को पता चला चाचा ने उलटी कर के बिस्तर ख़राब कर दिया, इस कमरे मैं चाचा रिश्ते मैं सबसे बड़े थे, उनकी बहु, भाभियों की तादात ज्यादा थी, और शुरू हो गयी बाते , नशीहत और दुत्कार, उनकी  बड़ी भाभी ने उन्हें खूब डाटा, अभी भी बिस्तर और उनकी अंगिया उलटी मैं लथपथ थी, चाचा को काटो तो खून नहीं बहुत शर्मिंदगी से सर झुकाये सब के सामने बैठे हुए थे , डाटने वालो ने न तो माहौल की परवाह की न बैठे लोगो की लगे लताड़ने चाचा को सब के सामने , यह उनकी वही भाभी थी जो उनसे बहुत चिढती थी आम जिंदगी मैं भी ,और उसे जैसे उनके डाटने का लाइसेंस मिल गया हो , काफी देर तक यह सब चलता रहा और अब बड़ो के साथ उनकी छोटी बहुए भी सुर मैं सुर मिलाने लगी ! 

उनकी  यह हालत  देख कर मुझे उनपर तरस आया, मैंने  शाले  ने और  उसकी एक बहन ने मिलकर   बिस्तर और उनकी अंगिया को  साफ़ कर धुप मैं सुखा दिया ,मैंने चाचा से कहा " आप बिलकुल भी शर्मिंदा न हो, ऐसा अक्सर होता रहता है , आप बिलकुल भी दुखी न हो "

 चाचा की आँखों मैं पश्ताप साफ़ नजर आ रहा था, मैं उनका जवाई लगता था और पहली मुलाकात थी मेरी  उनसे, इसलिए वो और शर्म महसूस कर रहे थे, लेकिन मेरे लिए वो बड़े थे, पूज्य थे  और मैं उनकी शादगी से बड़ा प्रसन्न था ,मैंने उनके लिए चाय और नाश्ता मंगवाया  लेकिन उन औरतो ने अपने बातो से उन्हें अभी भी  परेशान कर रखा था ! अब इस डांट का अंत नजर नहीं आ रहा था , तो मैंने अंत मैं चाचा की तरफ से मैदान संभाल  लिया 

"जीवन  मैं हम अक्सर  गलतिया करते है और उनका पछतावा भी हमें होता है, तो फिर क्यों उनकी इस गलती को हम इतना तूल दे रहे थे, क्या एक इंसान गलती नहीं कर सकता, चाहे उम्र कितनी क्यों न हो" मेरी बात सुन ने के बाद माहौल मैं शान्ति छा गयी ,आखिर मैं उनका जवाई लगता था , इसलिए वो सब चुप हो गई, पर मुझे इस वाकिये ने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया ,, ये वही औरते थी जब वो गाँव जाती थी तो चाचा अपना भंडार खोल देते है, उनके बच्चो के लिए उनके लिए, घर मैं अगर दूध दही है तो उसकी गंगा से बहा देते है , कोई अगर गाँव से दिल्ली आता था तो चाचा जी घी और सीजनल फल भी इन सबके के लिए भेजते थे , चाचा ने इनके ही सहारे अपने बेटे को दिल्ली नौकरी के लिए भेजा था , पर इनमे से किसी एक ने भी उसकी सहायता नहीं की 

 परन्तु आज उस चाचा ने  एक गलती कर दी तो लगे उन्हें शिष्टाचार का पाठ पढ़ाने !कमजोर को सब समझाने लगते है और अगर उनके किसी अपने ने यह कर्म किया होता तो बात होठो से बाहर भी नहीं निकलती  शायद यह सब उन्होंने इसलिए सुना क्योकि उनके पास दौलत नहीं है, लेकिन ऐसी दौलत का क्या जो सिर्फ अपने लिए हो, ! चाचा के पास दौलत न होते हुए भी वो सब का इतना ख्याल रखते है ..ऐसे तो बहुत दौलत वाले हमें रोज मिलते है...परन्तु मुझे इन चाचा से धनी कोई  नहीं मिला, जो बिना स्वार्थ और लालच के इतना सब कुछ हर समय अपने गाँव वालो के लिए करने के लिए तैयार रहते है, ,,,..समय रहते  अगर  इन रिश्तो की कद्र  न की गयी तो हमारा गाँव से रिश्ता सदा के लिए खत्म हो जायेगा , इसलिए अगर आप गाँव मैं खुशाली चाहते है तो अपने इन "जग चाचा " को गले लगाना पड़ेगा और उन्हें प्यार देना पड़ेगा तभी गाँव मैं असली ख़ुशी लौटेगी !!


टिप्पणियाँ

  1. एक ऐसे शक्शियत जिसको हमारा सदा इन्तजार है...!

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  2. maje aa gya, anayaas hi aapka blog dekha, yahi post mili aur padta chala gaya.. awesoem bro.. keep it up...

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  3. धन्यवाद बेनामी जी , आपके समय और हौसला अफजाही के लिए !

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