फेसबुक पर मैं देश को बदलने की कोशिश कर रहा हू, रोज मैं किसी न किसी से बहस करता हु, क्योकि वो मेरी बहुत सी बातो से सहमती नहीं रखते, मैं अपनी बात मनवाने किसी हद तक जा सकता हु, चाहे उसमे उनके घर तक और उनके रिश्तो को भी नाम देने मैं एक सेकंड नहीं लगता, मैं अपनी बात सदा ऊपर रखना चाहता हु क्योकि वो मैंने कही है, यही मैं ही मेरा सबसे बड़ा हथियार है, बड़े से बड़े संघर्षकर्ताओ, समाजसेवको ko अपने बदतमीज सवालो से मैं धराशायी कर देता हु, जिस से मैं एक बार बहस मैं उलझ जाता हु मैं तब तक उसे परेशान करता हु जब तक वाज मुझे ब्लाक न कर दे ! मुझे उन मुद्दों पे सबसे अधिक बहस करने का महारथ हासिल है जिनके बारे मैं रत्ती भर भी नहीं जनता , और न कभी जान ने की कोशिश करूँगा, मेरा मुख्य उद्देश्य अपने सामने किसी भी विचार को खड़े न होने देने का है, मैं विचार की भाषा नहीं समझता हु सिर्फ स्वार्थ और अपनी बड़ाई के अलावा मुझे कुछ नजर नहीं आता है, देश के सवाल पर मेरी काफी अच्छी पकड़ है परन्तु किसी के जवाब सुन ने का मेरे अन्दर पेशेंस नहीं है,..मैंने धरातल पर कभी काम नहीं किया है....क्योकि मैं तो सिर्फ फैस्बूकिया समाजसुधारक हु.....जय हो..!
परिचय: जब प्रकृति ने अपना सब्र खो दिया 5 अगस्त 2025। यह तारीख उत्तराखंड के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है। इस दिन से पहले, उत्तरकाशी जिले में गंगा (भागीरथी) के किनारे बसा खूबसूरत गाँव 'धराली' अपनी सेब के बागानों, शांत वातावरण और हरियाली के लिए जाना जाता था। यह एक ऐसी जगह थी जहाँ लोग शहर के शोर से दूर सुकून के पल बिताने आते थे। लेकिन उस रात, प्रकृति ने अपना वो रौद्र रूप दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। कुछ ही घंटों में, हँसता-खेलता धराली गाँव जलमग्न हो गया, और अपने पीछे छोड़ गया सिर्फ तबाही, खामोशी और अनगिनत सवाल। आज हम उस विनाशलीला को याद करेंगे, उसके कारणों की गहराई में जाएँगे और समझने की कोशिश करेंगे कि धराली की इस जल समाधि से इंसान क्या सबक सीख सकता है। आपदा के पीछे के विस्तृत कारण: यह सिर्फ बादल फटना नहीं था अक्सर ऐसी घटनाओं को केवल "बादल फटने" ( Cloudburst ) का नाम देकर एक प्राकृतिक आपदा मान लिया जाता है। लेकिन धराली की त्रासदी कई वर्षों से की जा रही मानवीय गलतियों और प्रकृति की चेतावनियों को नजरअंदाज करने का एक भयानक परिणाम थी। इसक...
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