दिल्ली
मेरी कर्मभूमि रही है और कुछ समय से मेरा उत्तराखंड प्यार काफी हिलोरे खा
रहा है, इसलिये मैने सोचा चलो समाज मैं वास्तविक उत्तराखंड से मुलाकात की
जाय ! मैने फसेबूक के मध्यम से इस समाज को ढूढने की कोशिश की, मुझे कुछ
ग्रूप नजर आये जो काफी काम करने का दम भर रहे थे, और फिर मुलाकतो का दौर
सुरु हुआ, facebook पर दिखने वाली संख्या काफी छोटी नजर आई , लेकिन मैने
अपनी खोज जारी रक्खी! इसमे बहुत सारे ग्रूप संस्कृति को बढ़ावा देने वेल
थे, और कुछ सामाजिक स्तर पर काम कर रहे थे, जब भी पहाड़ सो दुखियारो लोग
आते टू समाज समय समय पर अपना फ़र्ज़ निभाता जरूर नजर आया। इस दौरान मुझे
कबूतरी देवी जी से मिलने का मौका मिला जब वो AIIMS मैं भर्ती थी, और ऐसे ही
हमारे पत्रकार भाई संजय रावत की पत्नी के भी इलाज मैं सहायता की, कुछ
संस्कृतिक कार्यक्रम के भी गवाह रहे हम, इस दौरान सार्थक प्रयास के उमेश
पंत जी भी संपर्क मैं आये, और मैं उनके कार्य से सचमुच प्रभावित हुआ, इस
पूरी द्ल-द्ल मैं एक सुनहरी हवा का झोका सा लगा, कुछ अच्छे लोग भी मिले
जिनमे मुख्य चँदेर्शेखर कर्गेटि जी, मुजीब नैथानी जी, धीरेनडेर अधिकारी जी,
मोहन बिष्ट जी , चारू तिवारी जी, हरीश रावत, सुदर्शन रावत, विनोद सिंग
शाही और अन्य लोग !
सफर इस प्रकार चलता रहा, खोज चलती रही, इस परिपेक्ष मैं सबसे उजागर एक सवाल नजर आया कि......
क्या उत्तराखंड के लोग एक जुट हो सकते है ?
क्या उत्तराखंड कि संस्थाये राजनीति से ग्रस्त है??
मैने
जब भी कोई मीटिंग बड़ी या छोटी का हिस्सा बना , उसमे मुख्य तौर से इन
सवालो का सदा जिक्र होता , और हर इंसान उस राजनीतिग्य को ढूढने कि कोशिश
करता जो राजनीति फैलता है , लेकिन आज तक कोई उसको ढूढ नहीं पाया है, हमारे
समाज मैं तो सीधे-साढ़े पहाड़ी मिलते है , मिलनसार और सामाजिक और राजनीति
से काफी दूर , तो फिर कहा से राजनीति आती है इस समाज मैं??? इसका मतलब यहा
राजनीतिग्य कोई नहीं है पर राजनीति जरूर पायी जाती है , जिसे कभी देखा ना
गया है, पर महसूस जरूर किया जाता है, यह कभी भूत कि तरह है, जिसको कभी किसी
ने देखा नहीं है ...पर सब उस से डरते जरूर है।....और लगता है यह भूत तभी
भागेगा जब इस पर भी बकरा चढ़ाया जायेगा।.....और यहा भी देवभूमि के देवता
हमे बचाएंगे।...जै हो।..!
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