प्यार कब आपकी जिंदगी मैं दस्तक दे , इसका एहशाश हमें तब तक नहीं होता , जब तक एक मीठा दर्द हमारे दिल घर नहीं कर जाता , यह दर्द इतना मीठा होता है इसके सामने मीठी से मीठी चीज फीकी पड़जाती है, इसका अनुभव हमें जाने अनजाने मैं जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर जरुर होता है ! इस दर्द का एहशाश मुझे कहा हुआ , आज दिल कर रहा है उसके बारे मैं लिखने का , क्योकि यादे अक्सर जिंदगी जीने का भी बहाना बन जाती है , और आज मैं यादो की सतह मैं जाकर फिर एक बार उस दर्द को जीने की कोशिश करूँगा!
समय किशोर अवस्ता , दिल्ली से गाँव हर गर्मियों मैं जाना होता था, यही गर्मिया थी जिसका पुरे साल मुझे इन्तजार रहता था, यह साल का वक़्त होता था, जब मैं गाँव जाकर जिंदगी अपने ढंग से जीता था, बिना रोक-टोक के, पिता जी दिल्ली रहते थे गर्मियों की छुट्टी मैं अक्सर , और गाँव मैं आमा और इजा तो वैसे ही बहुत प्यार करती थी , क्योकि उनसे मिलने सिर्फ गर्मिया मिलती थी, गर्मियो की छुट्टी मेरी डिज्नीलैंड की तरह का ट्रिप होता था, गाँव मैं दिन भर रामगंगा मैं तैरना और मच्छी मारना सिर्फ यह काम था, और इनसे अच्छा काम था गाँव की हर शादी मैं बाराती बन कर जाना, और बारात जाने मैं सबसे ज्यादा मेहनत करता था मैं, काश अगर कोई अवार्ड होता सबसे मेहनती बाराती का तो शायद वह अवार्ड मुझे ही मिलता ! बारात मैं बैंड शुरू होने से जब तक बारात वापस न आ जाये तब तक बारात मैं डांस करने का ठेका मेरा होता था, अब चाहे रात को दो बजे बैंड बजे , किसी भी शादी मैं रात को सोना मेरी शान के खिलाफ था, मैं सदा जगा हुआ रहता था, क्योकि बैंड कभी भी बज सकता था, आप समझ सकते है , क्योकि कभी भी किसी को दारू चढ़ सकती थी, फिर पहाड़ मैं दारू के बाद सिर्फ दो चीजे बहार निकलती थी , डांस और अंग्रेजी ! मेरे गाँव मैं बैंड बजने वाला ही मेरा मित्र था क्योकि शादी पूरी उसके इर्द-गिर्द ही कटती थी !
ऐसी ही एक शादी मैं अपने गाँव से चौखुटिया के दिगौत गाँव मैं जाने का सौभाग्य मिला , ७-८ का स्टूडेंट रहा हूँगा, पहले सिर्फ रात की बारात होती थी जिसमे शाम को बारात दुल्हन के घर पहुचती थी और रात भर बाराती दुल्हन के घर रहते थे, फेरे होते थे और बिदाई अगले दिन सुबह होती थी, बारात दुल्हन के द्वार पहुची और जैसे ही दुल्हन के आंगन मैं प्रवेश की वह पर डांस करने का सबसे ज्यादा मजा आता है, और फिर दिल्ली से कोई गया हो तो बात और अलग होती है , क्योकि पहले फैशन दिल्ली से ही जाता था, खूब डांस किया , लोग खाना खाने भी पहुच गए , पर हम नाचते ही रहे, आखिर कर लगभग दो घंटे बैंड मैं नाचने के बाद खाना खाया और फिर लगे दोस्तों के साथ गप मारने ! कुछ समय बाद लगन का समय हो गया , हम नीचे बैठे थे ख्व मैं और सामने चाख को जाती हुए सीढियों मैं दुल्हन की तरफ के लोग बैठे थे, और कुछ लडकिया , चाख मैं बैठ कर लगन देख रही थी, पंडित जी मन्त्र पढ़ पढ़ कर शादी की रीति पूरी कर रहे थे, मेरी आंखे इधर उधर शादी के माहौल का जायजा ले रही थी, और इसी क्रम मैं मेरी आंखे सीढियों से ऊपर चाख तक पहुच गयी, और मुझे अचानक ऐसा महसूस हुआ की मेरी आंखे , दो आँखों मैं जाकर रुक सी गयी है, अचानक एक अपनेपन की अनुभूति हुई, ऐसा लगा जैसे मेरी आँखों कोई इन्तजार कर रहा था ,आंखे यहाँ आकर थम सी गयी है, एक घर सी कर गयी इन आँखों मैं वह आंखे ,टक टकी लगाये मुझे देख रही थी , यह अनभूति सबसे अनोखी थी और अब मेरी आंखे रह रह कर पुरे पंडाल का चक्कर लगा कर फिर वही चली जाती, ऐसा लगता की जैसे दो अनजाने अचानक बरसो की बिछोह के बाद मिले हो, मन काफी खुश था इस अपने पण के एह्साह से , चकित भी था, की अचानक इस भरी दुनिया क्यों कोई इतना प्यारा सा लगने लगा था, अब शादी की रस्मो की ओर ध्यान कहा जाता, हमारा ध्यान तो इन मदमस्त , चुलबुली आँखों ने चुरा लिया था, कब फेरे ख़तम हुए, कब सुबह हुए कुछ पता नहीं चला! अब बारात की बिदा होने की तयारी होने लगी , बैंड वाला भी आ गया डांस भी शुरू हो गया , पर मन तो कही खो सा गया था, बिलकुल बेसुध सा हो गया था मैं, आंखे सिर्फ उन आँखों को ढूढ़ रही थी, वो आई भी , और जमाना आज का नहीं था, सिर्फ आँखों को ही इजाजत होती थी बात करने की, वार करने की, जुबा को कतई इजाजत न थी क्योकि ज़माने का डर था, और समझ भी नहीं थी की ऐसे मौको पे क्या बोला जाता है, न मोबाइल का जमाना था, न फेसबुक का और न वी चाट का....सिर्फ पोस्ट कार्ड और अंतर्देशी का प्रयोग होता था सन्देश भेजने के लिए. हम बारात के साथ हो लिए, आँखों ने आँखों से खुदा हाफिज कहा और हम निकल लिए. रात भर आँखों मैं नींद न होने के कारण घर आके बारात के कपड़ो मैं ही बेसुध होकर सो गए , और जब दिन के तीन बजे नींद खुली तो दिल मैं अजीब सा एक दर्द पाया, जो इतना मीठा था की शब्द कम पड़ जायेंगे इस मिठास को व्यक्त करने, अपने आप से पूछ रहा था मैं , आखिर यह क्या हो रहा है, जब समझने की कोशिश की तो वो दो आंखे टक-टकी लगा कर अपनी और देखती नजर आई.....और फिर क्या था न जुबा कुछ समझ पाई न दिल.....उन आँखों के बारे मैं आज भी जब सोचता हु , तो उस मीठे दर्द का एह्साह होता है , समाज का डर था इसलिए यह दर्द सदा अपने तक ही रखा और कभी भी उन आँखों को ढूढ़ने की कोशिश नहीं कि बस अपने दिल के सबसे सुन्दर कोने मैं आज तक छिपा कर बैठे है क्योकि कुछ चीजे सिर्फ अपने तक सीमित रहती है ...उनमे सबसे ऊपर है ये आंखे.....! क्या था यह एहशाश ...शायद प्यार...और क्या...!
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