छोटे परिवार का एक दुःख यह भी है की माँ बाप के पास बच्चो के लिए समय काफी कम रहता है , लेकिन कभी कभी बच्चे ऐसी जिद कर बैठते है की माँ बाप को न चाहते हुए भी वह जिद माननी पढ़ती है, ऐसा ही आजकल मेरे साथ हो रहा है, हुए यो की मेरी छोटी बेटी जो अभी दूसरी कक्षा मैं पढ़ती है , वो अचानक एक पेट पालने कि जिद करने लगी , क्योकि हमारे एक रिश्तेदार ने अभी एक बड़ा कुत्ता गोद लिया है, वह चाहती है की हम भी एक पप्पी पाले, परन्तु दिन मैं क्योकि ऑफिस जाना होता है तो उसका ख्याल कौन रखे, उसे यह समझ आ गया और वह मान गयी , लेकिन अगले ही मिनट उसने एक शर्त रख दी, की ठीक है हम पप्पी नहीं पाल सकते , परन्तु एक काम जरुर कर सकते है , हर सन्डे को एक दिन आप मेरा डोगी बनेंगे और एक सन्डे मम्मी, और यह शर्त आपको माननी पड़ेगी, अन्यथा डोगी लाओ,....और उसकी जिद के आगे हम लोगो को झुकना पड़ा , पिछले हफ्ते वाइफ डोगी बनी थी इस सप्ताह मेरा नंबर है, उसने अभी से वो कुत्ते वाला पट्टा निकाल कर प्रेस कर दिया है....इस बार सन्डे को तो पक्का जुतुन्गा मैं भी......इसलिए साथियों इस सन्डे के सामाजिक काम मैं नहीं पहुच पाया तो समझ लेना आज कुत्ता बनने की बारी मेरी थी....जय हो शादी शुदा लोगो की...!
उत्तराखंड में पंचायत चुनाव: गांव के विकास की धड़कन पंचायत चुनाव, या पंचायत चुनाव , भारत में ग्रामीण लोकतंत्र की नींव हैं, जो गांवों को उनके भविष्य को संवारने का अधिकार देते हैं। उत्तराखंड में, हिमालय की गोद में बसे गांवों के लिए ये चुनाव विशेष महत्व रखते हैं। जुलाई 2025 में होने वाले उत्तराखंड पंचायत चुनाव की सरगर्मी शुरू हो चुकी है। प्रधानों (ग्राम प्रमुख) से लेकर समग्र विकास तक, ये चुनाव ग्रामीण उत्तराखंड के लिए गेम-चेंजर हैं। आइए जानें कि पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं, ये गांवों के विकास को कैसे बढ़ावा देते हैं, और 2025 के चुनावों से जुड़े कुछ रोचक किस्से जो उत्तराखंड के गांवों की भावना को दर्शाते हैं। पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं पंचायत चुनाव भारत की विकेंद्रित शासन व्यवस्था की रीढ़ हैं, जो 1993 के 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) को संवैधानिक दर्जा देता है। उत्तराखंड, जहां 7,485 ग्राम पंचायतें, 95 ब्लॉक, और 13 जिला पंचायतें हैं, में ये चुनाव ग्रामीण समुदायों के लिए जीवन रेखा हैं। ये गांव वालों को प्रधान , उप-प्रधान और सदस्यों जैसे नेताओं ...
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