उत्तराखंड समाज आज तक संगठित नहीं हो पाया, इस का दुख सबको है, और यही दुख हमे तब भी खा रहा था जब किरण नेगी को न्याय दिलवाने का संघर्ष चल रहा था , यह डर मन मैं बार -बार दस्तक दे रहा था ,कि हम लोग आपसी मतभेदो के कारण कही फिर भटक ना जाये, परंतु यह संघर्ष इतना मजबूत था कि हम न्याय ले कर ही रहे , जिसमे सभी लोगो का साथ था, चाहे वो नज़फगढ़ कि माताये-बहने और वहा के लोग, जो कि अंत तक इस लड़ाई मैं लगे रहे, मैं नहीं भुला नहीं सकता वह अंतिम सभा जब हम न्याय मिलने के बाद हनुमान chowk पर आये हुए वो लोग, काफी खुश नजर आ रहे थे न्याय से, और उस खुशी को देखकर लगा कि कॅम से कॅम इस आंदोलन मैं हमने मंजिल पायी है, और उसका श्रेय कि बात करे तो सबको जाता है, और उस आंदोलन मैं जुड़े हुए सभी लोग प्रशंसा के काबिल है , और कुछ नाम लेकर मैं बाकी लोगो पर अन्याय नहीं करना चाहता , क्योकि यह संघर्ष हम सबका था ,और सब को इसका श्रेय जाना चाहिये, चाहे वो किसी रूप मैं इस आंदोलन से जुड़ा हो, आंदोलन तो यहा खतम हो गया पर अब समाज के बहुत फ़लक होते है, और उनमे से कुछ लोगो को बहुत चीजे पसंद नहीं आई उनका सवाल पूछना स्वाभविक है , परंतु आप बिना सच जाने किसी को भी कटघरे मैं खड़ा कर दो , यह हमारे समाज कि खासियत सदा से रही है और वह यहा भी उजागर हुई है, सवाल पूछने वेल तथ्यो से सौ कोश कि दूरी बना के रखते है, और उनके लिये न्याय कभी मुद्दा नहीं था, उनके लिये उनका अहम सबसे बड़ा मुद्दा है, क्या हम अपने अहम को भूल कर नयाय कि जो विजय हुई है उसपर अगर ध्यान दे तो क्या अच्छा नहीं होगा, क्या यह एक अच्छी चीज नहीं हुए है कि वास्तविकता के विपरीत सभी सामाजिक संघटनो ने और आम लोगो ने इस आंदोलन को सफल बनाया है, मुझे सबसे बड़ी खुशी इस बात कि है कि यह आंदोलन सफल हुआ ....यह एक अच्छा संदेश इस आंदोलन से हम जरूर ले जा सकते है, और जिन लोगो को इसमे कुछ और नजर आ रहा है तो मैं उनसे गुजारिश करूंगा, कि उत्तराखंड मैं बहुत कुछ करने के लिये है, बहुत मुद्दे है , क्यो नहीं आप एक मुद्दे पर आंदोलन चलाते है, मुद्दे बहुत है, गेरसेन राजधानी का, पलायन का, जल जॅंगल जमीन का और भी बहुत कुछ janmans को एकत्रित करे और समाज कि सेवा करे।...खाली इस आंदोलन का पोस्ट मोर्टेम पर अपनी उर्जा लगाकर इसमे राजनीति ढुडने कि कोशिश ना करे। अगर राजनीति हुई भी है तो , आप अपने आंदोलन मैं राजनीति करके उसे सफल बनाये।..हमे कोई आपति नहीं होगी।
उत्तराखंड में पंचायत चुनाव: गांव के विकास की धड़कन पंचायत चुनाव, या पंचायत चुनाव , भारत में ग्रामीण लोकतंत्र की नींव हैं, जो गांवों को उनके भविष्य को संवारने का अधिकार देते हैं। उत्तराखंड में, हिमालय की गोद में बसे गांवों के लिए ये चुनाव विशेष महत्व रखते हैं। जुलाई 2025 में होने वाले उत्तराखंड पंचायत चुनाव की सरगर्मी शुरू हो चुकी है। प्रधानों (ग्राम प्रमुख) से लेकर समग्र विकास तक, ये चुनाव ग्रामीण उत्तराखंड के लिए गेम-चेंजर हैं। आइए जानें कि पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं, ये गांवों के विकास को कैसे बढ़ावा देते हैं, और 2025 के चुनावों से जुड़े कुछ रोचक किस्से जो उत्तराखंड के गांवों की भावना को दर्शाते हैं। पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं पंचायत चुनाव भारत की विकेंद्रित शासन व्यवस्था की रीढ़ हैं, जो 1993 के 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) को संवैधानिक दर्जा देता है। उत्तराखंड, जहां 7,485 ग्राम पंचायतें, 95 ब्लॉक, और 13 जिला पंचायतें हैं, में ये चुनाव ग्रामीण समुदायों के लिए जीवन रेखा हैं। ये गांव वालों को प्रधान , उप-प्रधान और सदस्यों जैसे नेताओं ...


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