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राजनीति जो सिर्फ वोट की है अब !



राजनीति से सदा सभ्य लोग दूरी रखते है, शायद इसका कारण भी है, जब लोग अपने हित और फायदे के लिये राजनीति करते है तब सचमुच यह एक गाली बन कर रह जाती है ! आज ऐसे बहुत से उदाहरण है जिनके कारण यह सब सच सा लगता है, आप किसी भी दिन का अखबार या टेलीविजिन देख लीजिये ,यह सच आपके सामने आ जाता है, आप आजकल की ही घटना क्रम ले लीजिये, संसद मैं सांसद pepper स्प्रे, और छुरा लेकर तक पहुच rahe है , क्योकि वो नहीं चाहते की इनके विरोध वाला बिल ना पास हो, और उस विरोध को दिखाने के लिये वो कुछ भी कर सकते है, एक राज्य की असेंब्ली मैं दो सदस्य अपने कपड़े उतर कर खड़े हो गये, क्योकि उनकी मांग ना मानी गयी !

लेकिन हद तो तब पार हो गयी जब एक प्रदेश की मुख्यमंत्री साहिबा ने पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारो को रिहा करने का आदेश दे डाला, और वा भी बिना केन्द्र की राय लिये, आजकल इस प्रकार के कृत्य आपको हर अखबार, हर न्यूज़ चॅनेल पर नजर आयेंगे, क्योकि अब राजनीति मैं नैतिकता को कही दूर दफना दिया गया है , क्योकि नैतिकता कुछ समय की वाह-वाही तो दिला सकती है परंतु सत्ता नहीं, इसलिये अब सभी नेता लोग राजनीति नहीं मार्केटिंग एजेंट बन गये है, वह सिर्फ उन वादो और उन  बातो मैं विश्वास रखते है जो उनकी झोली मैं वोट डाल सकते है, नेता लोग उन नीतियो की वकालत करते नजर आते है जो उन्हो जल्दी से गद्दी पर विराजमान करवा सके, चाहे उसके लिये उन्हे देश को कितना पीछे धकेलना पड़े उसका उन्हे कोई गम नहीं है!

आज जो भी नीतिया या वादे सरकार करती है इनसे से ऐसा लगता है की वोट के लिये ये देश, अवाम को धर्म, जाती, छेत्र के हिसाब से बाटने मैं कटई भी नहीं कतराते, अभी Telengana के मुद्दे पर हम सबने देखा, इसका फायदा या नुकसान अवाम को  समझने मैं समय जरूर लगेगा परंतु नेताओ की तो जीत है हर हाल मैं, अगर नहीं बनता तो इधर वाले नेता जीत ते और अगर बन जाता तो उधर वाले बन जाते , धरम, मुसलमान, आरक्षण ये सदाबहार मुद्दे है जो चुनाव के वक़्त सबसे ज्यदा समाचारो मैं रहते है, और आरक्षण से आम आदि को फायदा तो काफी काम हुआ है परंतु आरक्षण के नाम पर बहनजी ने दिल्ली lucknow मैं कितने महल बना लिये है ये सब आप जानते ही है, और जिनके नाम पर इन महलो का निर्माण हुआ है उनका इन महलो मैं घुसना भी निषेद है !

कब होगा आम आदमी जागृत , कब समझ पायेगा इन नेताओ की चाल, और कब मांगेगा इन सबसे हिसाब, बस इंतज़ार है उस दिन का यह वह दिन है जिसका इंतज़ार बचपन से कर रहा हूँ पर अभी तक वह दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा है , सिर्फ नजर आ रहा है इन नेताओ की भूख का अम्बार और कुछ नहीं।

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