अभी -अभी जंतर मंतर से वापस पहुचा हू, जहा मुझे किरण नेगी के परिजनो के दुख ने मुझे झंझोड़ कर रख दिया, किरण की तस्वीर देखकर ऐसा लगा की वा बार- बार पूछ रही थी,,,भैया, क्या गलती थी मेरी, जो की मेरा ऐसा हश्र हुआ ? मैं एक साधारण सी लड़की , साधारण सपने लिये , अपने परिवार की सेवा करना चाहती थी, लेकिन उन दरिंदो ने मेरी इज्जत - आबरू और मेरी जान भी ले ली, आज मेरे मां, पिताजी और पूरा परिवार दर - दर की ठोकरे खा रहा है न्याय के लिये , प्रशासन , व्यवस्था सब मानो दुशमन हो गये है, ...पर आप तो मेरे अपने थे, ये समाज अपना था ..फिर क्यो आप नहीं है इस लड़ाई मैं मेरे परिजनो के साथ????.....क्या सचमुच हमारा समाज है किरण नेगी के साथ इस लड़ाई मैं??? पूछे अपने आप से हर उत्तराखंड वासी।...क्या यह लड़ाई हम सबकी नहीं है?? क्या हमे साथ नहीं ख्ड़े होना चाहिईए किरण नेगी के परिजनो के साथ???...आइये सब मिलकर इस अन्याय की इस लड़ाई को लदे और जल्दी से जल्द न्याय की गुहार लगाये सरकार से।.....इस लड़ाई से जुड़ने के लिये मिले १० बजे १६ फरवरी को द्वारका न्यायालय परिसर।.....आओ अब यह लड़ाई सब मिलकर लड़े..!
परिचय: जब प्रकृति ने अपना सब्र खो दिया 5 अगस्त 2025। यह तारीख उत्तराखंड के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है। इस दिन से पहले, उत्तरकाशी जिले में गंगा (भागीरथी) के किनारे बसा खूबसूरत गाँव 'धराली' अपनी सेब के बागानों, शांत वातावरण और हरियाली के लिए जाना जाता था। यह एक ऐसी जगह थी जहाँ लोग शहर के शोर से दूर सुकून के पल बिताने आते थे। लेकिन उस रात, प्रकृति ने अपना वो रौद्र रूप दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। कुछ ही घंटों में, हँसता-खेलता धराली गाँव जलमग्न हो गया, और अपने पीछे छोड़ गया सिर्फ तबाही, खामोशी और अनगिनत सवाल। आज हम उस विनाशलीला को याद करेंगे, उसके कारणों की गहराई में जाएँगे और समझने की कोशिश करेंगे कि धराली की इस जल समाधि से इंसान क्या सबक सीख सकता है। आपदा के पीछे के विस्तृत कारण: यह सिर्फ बादल फटना नहीं था अक्सर ऐसी घटनाओं को केवल "बादल फटने" ( Cloudburst ) का नाम देकर एक प्राकृतिक आपदा मान लिया जाता है। लेकिन धराली की त्रासदी कई वर्षों से की जा रही मानवीय गलतियों और प्रकृति की चेतावनियों को नजरअंदाज करने का एक भयानक परिणाम थी। इसक...
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