अभी -अभी जंतर मंतर से वापस पहुचा हू, जहा मुझे किरण नेगी के परिजनो के दुख ने मुझे झंझोड़ कर रख दिया, किरण की तस्वीर देखकर ऐसा लगा की वा बार- बार पूछ रही थी,,,भैया, क्या गलती थी मेरी, जो की मेरा ऐसा हश्र हुआ ? मैं एक साधारण सी लड़की , साधारण सपने लिये , अपने परिवार की सेवा करना चाहती थी, लेकिन उन दरिंदो ने मेरी इज्जत - आबरू और मेरी जान भी ले ली, आज मेरे मां, पिताजी और पूरा परिवार दर - दर की ठोकरे खा रहा है न्याय के लिये , प्रशासन , व्यवस्था सब मानो दुशमन हो गये है, ...पर आप तो मेरे अपने थे, ये समाज अपना था ..फिर क्यो आप नहीं है इस लड़ाई मैं मेरे परिजनो के साथ????.....क्या सचमुच हमारा समाज है किरण नेगी के साथ इस लड़ाई मैं??? पूछे अपने आप से हर उत्तराखंड वासी।...क्या यह लड़ाई हम सबकी नहीं है?? क्या हमे साथ नहीं ख्ड़े होना चाहिईए किरण नेगी के परिजनो के साथ???...आइये सब मिलकर इस अन्याय की इस लड़ाई को लदे और जल्दी से जल्द न्याय की गुहार लगाये सरकार से।.....इस लड़ाई से जुड़ने के लिये मिले १० बजे १६ फरवरी को द्वारका न्यायालय परिसर।.....आओ अब यह लड़ाई सब मिलकर लड़े..!
उत्तराखंड में पंचायत चुनाव: गांव के विकास की धड़कन पंचायत चुनाव, या पंचायत चुनाव , भारत में ग्रामीण लोकतंत्र की नींव हैं, जो गांवों को उनके भविष्य को संवारने का अधिकार देते हैं। उत्तराखंड में, हिमालय की गोद में बसे गांवों के लिए ये चुनाव विशेष महत्व रखते हैं। जुलाई 2025 में होने वाले उत्तराखंड पंचायत चुनाव की सरगर्मी शुरू हो चुकी है। प्रधानों (ग्राम प्रमुख) से लेकर समग्र विकास तक, ये चुनाव ग्रामीण उत्तराखंड के लिए गेम-चेंजर हैं। आइए जानें कि पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं, ये गांवों के विकास को कैसे बढ़ावा देते हैं, और 2025 के चुनावों से जुड़े कुछ रोचक किस्से जो उत्तराखंड के गांवों की भावना को दर्शाते हैं। पंचायत चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं पंचायत चुनाव भारत की विकेंद्रित शासन व्यवस्था की रीढ़ हैं, जो 1993 के 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) को संवैधानिक दर्जा देता है। उत्तराखंड, जहां 7,485 ग्राम पंचायतें, 95 ब्लॉक, और 13 जिला पंचायतें हैं, में ये चुनाव ग्रामीण समुदायों के लिए जीवन रेखा हैं। ये गांव वालों को प्रधान , उप-प्रधान और सदस्यों जैसे नेताओं ...
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें