अभी -अभी जंतर मंतर से वापस पहुचा हू, जहा मुझे किरण नेगी के परिजनो के दुख ने मुझे झंझोड़ कर रख दिया, किरण की तस्वीर देखकर ऐसा लगा की वा बार- बार पूछ रही थी,,,भैया, क्या गलती थी मेरी, जो की मेरा ऐसा हश्र हुआ ? मैं एक साधारण सी लड़की , साधारण सपने लिये , अपने परिवार की सेवा करना चाहती थी, लेकिन उन दरिंदो ने मेरी इज्जत - आबरू और मेरी जान भी ले ली, आज मेरे मां, पिताजी और पूरा परिवार दर - दर की ठोकरे खा रहा है न्याय के लिये , प्रशासन , व्यवस्था सब मानो दुशमन हो गये है, ...पर आप तो मेरे अपने थे, ये समाज अपना था ..फिर क्यो आप नहीं है इस लड़ाई मैं मेरे परिजनो के साथ????.....क्या सचमुच हमारा समाज है किरण नेगी के साथ इस लड़ाई मैं??? पूछे अपने आप से हर उत्तराखंड वासी।...क्या यह लड़ाई हम सबकी नहीं है?? क्या हमे साथ नहीं ख्ड़े होना चाहिईए किरण नेगी के परिजनो के साथ???...आइये सब मिलकर इस अन्याय की इस लड़ाई को लदे और जल्दी से जल्द न्याय की गुहार लगाये सरकार से।.....इस लड़ाई से जुड़ने के लिये मिले १० बजे १६ फरवरी को द्वारका न्यायालय परिसर।.....आओ अब यह लड़ाई सब मिलकर लड़े..!
पहाड़ के बच्चो का जीवन अकसर अपनी माता जी या दादी जी के आँचल मैं पलता और बड़ा होता है , क्योकि पुरुष अधिकतर समय गाव से बाहर रहकर रोटी कमाने की दौड़ मैं लगे होते है ! माना की आज पहाड़ बहुत बदल चुका है परन्तु पहाड़ मैं रहने वाले बच्चो के लिए अभी भी यही सच है ! समय काफी आगे निकल गया है आज मैं जिनके बारे मैं लिखने जा रहा हु वो अब हमारे बीच मैं नहीं है , पर उनकी याद सदा दिल मैं रहती है और उनके मेरे जीवन पर बहुत एहसान है , इतना बड़ा परिवार है तो उसका कारण सिर्फ वो है , उन्होंने एक पक्की नीव की तरह हम सब के जीवन को सहारा दिया है ! आज पिताजी की उम्र ७५ साल की हो गयी है और उनसे लगभग बीस साल पहले आमा जन्म कुमाऊ के द्वाराहट स्थित किरौला गाँव मैं हुआ था , मैंने यह गांव कभी नहीं देखा पर सुना जरुर है इस गाँव के बारे मैं ! लगभग १९२० के समय उनका जन्म इस गाँव मैं हुआ होगा ! उनके बचपन के बारे मैं कभी बात नहीं हुई , पर यह जरुर पता है की लगभग १२ वर्ष की उम्र मैं उनकी शादी मेरे दादा जी के साथ हो गयी थी ! १२ वर्ष आज के ज़मा...
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